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दुनिया

पटरियों पर धड़कती जिंदगी

नई दिल्ली के प्लेटफॉर्म पर पटरियों के बीच कुछ बच्चों ने आग जलाई है, वो चाय बनाना चाहते हैं. ये जिंदगी है पटरियों के आस पास जीवन बिताने वाले कई सौ बच्चों की.

एक गंदी सी कैप को बड़े स्टाइल में सिर पर डाले एक बच्चे ने बताया कि मां के मरने के बाद वह घर से भाग आया, पिता शराब पी कर रोज मारता था. हरियाणा से आए नौ साल के बच्चे ने बताया कि वह अक्सर प्लेटफॉर्म या वेटिंग रूम में सो जाता है. खाने के लिए भीख मांगता है और प्लास्टिक की थैलियां और बोतलें बेच कर कुछ पैसे कमा लेता है. वह स्कूल तो जाता था लेकिन मां की मौत के बाद सब बिगड़ गया.

ये रेल की पटरियों के आस पास रहने वाले कुछ बच्चों की कहानी है. इन बच्चों की संख्या बढ़ कर एक लाख बीस हजार हो गई है. हर साल शहरों की ओर भाग कर आते हैं, स्टेशन और पटरियों को ही घर बना लेते हैं.

या तो ये बच्चे गरीबी, हिंसा और मार पीट से भाग कर आते हैं या फिर सिर्फ रोमांच की तलाश में, चमकीली रोशनी का पीछा करते दिल्ली, मुंबई, कोलकाता जैसे बड़े शहरों की ओर आ जाते हैं. ये बच्चे बार बार याद दिलाते हैं कि भले ही भारत में अरबपतियों और मध्यवर्ग की संख्या बढ़ रही हो लेकिन पुरानी समस्याएं जस की तस हैं.

कमाई की लालच

पैसे कमाने का लालच इन बच्चों को बड़े शहरों में खींच लाता है. 2020 तक भारत में दुनिया की सबसे ज्यादा जनसंख्या युवा होगी और ऐसे में अगर इस तरह की मुश्किलों का कोई हल नहीं निकलता तो देश अधिकतम आर्थिक फायदा नहीं उठा पाएगा.

Pendler in Indien

रेल को भारत की लाइफलाइन भी कहते हैं

नई दिल्ली में 2007 में कुछ धर्मार्थ संस्थाओं के सर्वे के मुताबिक 35 से 40 बच्चे हर रोज नई दिल्ली आते हैं. सलाम बालक ट्रस्ट के प्रमोद सिंह का कहना है, "यह संख्या और बढ़ रही है." यह संगठन सब बच्चों को अपने संगठन के सुरक्षा नेटवर्क में ले आते हैं. उनकी संस्था हर रोज रेल्वे प्लेटफार्म पर जाती है.

ब्रिटेन से चलने वाले संगठन रेल्वे चिल्ड्रेन इंडिया के भारत के निदेशक नवीन सेलाराजू कहते हैं कि दुनिया के बच्चों का पांचवां हिस्सा जिस देश में रहता है, उसकी ये एक बड़ी समस्या है. "इनमें से अधिकतर लोग गरीब इलाकों से भाग कर आते हैं. नई दिल्ली और मुंबई में अधिकतर उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल से आए हैं." कई ऐसे हिस्से हैं, जो बड़े शहरों के साथ बस से नहीं जुड़े लेकिन ट्रेन से जुड़े हैं और बच्चे अक्सर बिना टिकट आ जाते हैं.

कैसे कैसे खतरे

स्टेशन पर शरण के बावजूद खतरा तो है ही. उन्हें बड़े बच्चों से पिटने का डर बढ़ जाता है, उनके यौन शोषण की आशंका बढ़ जाती है और अलग अलग गैंग के बीच दुश्मनी का भी. लड़कियों को ज्यादा खतरा है. सिंह ने बताया, "आने के एक दिन बाद ही हम उन्हें ढूंढ लेने की कोशिश करते हैं, नहीं तो मुश्किल हो जाती है. वो आसानी से पकड़ आ जाती हैं."

कई बच्चों का ध्यान सलाम बालक रखता है. वहीं रेल्वे चिल्ड्रेन संगठन स्टेशन कंपाउंड में इन बच्चों को सुरक्षित रखते हैं. नौ लड़के, नंगे पांव आहाते में बैठे चेकर्स खेल रहे हैं. कुछ उसी सुबह शहर आए हैं. इनमें सबसे बड़ा लड़का 14 साल का है.

एक ने बताया कि वह बिहार के किशनगंज से तीन साल पहले दिल्ली आया लेकिन सामाजिक कार्यकर्ताओं से मुलाकात कुछ महीने पहले ही हुई है. वह कहता है, "मैं घर नहीं लौटना चाहता, यह जगह मुझे अब अच्छी लगती है." रेल्वे चिल्ड्रेन की किरण ज्योति का कहना था कि बच्चे अक्सर घर नहीं लौटना चाहते, "नए आए बच्चे ज्यादा बताते नहीं. कहां से आए हैं, ये बताने में ही उन्हें कुछ महीने लग जाते हैं. अगर वो परिवार में नहीं जा सकते तो फिर उन्हें लंबे समय देख रेख की जरूरत रहेगी."

कुछ बच्चे मार पीट वाले घरों में नहीं लौटना चाहते, वो आजाद रहना चाहते हैं. हर दिन के सिर्फ 250 रुपये भी उनके लिए काफी होते हैं. कुछ नशा करने लगते हैं तो कुछ चोरी चकारी. बच्चों को पुलिस भी धमकाती और पीटती है लेकिन इन दिनों हालात सुधरे हैं. खास जुवेनाइल पुलिस यूनिट के थानेश्वर अडिगार बताते हैं, "पहले क्रूरता थी लेकिन अब कोई डांट और हथकड़ी नहीं. हम बच्चों की सुरक्षा करने वाले इको फ्रेंडली पुलिस स्टेशन बनाना चाहते हैं. और बच्चों की रक्षा करना भी पुलिस की ड्यूटी में शामिल हो."

रेल्वे कंपनियां भी इस कोशिश में जुटी हैं कि ऐसे थाने बनाएं और स्टाफ में जागरूरता बढ़ाएं. सेलाराजू कहते हैं, "सरकार और रेल्वे के इरादे तो सकारात्मक हैं लेकिन कई चुनौतियां हैं."

एएम/एजेए (रॉयटर्स)

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