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ब्लॉग

पंजाब हमले ने दिखाई आतंकवाद की चुनौती

पाकिस्तान सीमा से सटे पंजाब के गुरदासपुर जिले के दीनानगर कस्बे में सोमवार की सुबह हुए फिदायीन हमले ने एक बार फिर आतंकवाद की समस्या और भारतविरोधी आतंकवाद के प्रति पाकिस्तान के रुख को चर्चा के केंद्र में ला दिया है.

गुरदासपुर को लेकर यूं भी पाकिस्तान के दिल में हमेशा खलिश रही है क्योंकि विभाजन के समय इस पर उसने अपना अधिकार जताया था और यदि यह भारत को न मिलता तो उसका कश्मीर के साथ जमीन के रास्ते संपर्क ही टूट जाता. ऐसे में जम्मू-कश्मीर का भारत में विलय भी बेमानी होकर रह जाता. अब तक प्राप्त सूचना के आधार पर यह यकीन के साथ कहा जा सकता है कि आतंकवादी हमलावर पाकिस्तान की ओर से सीमा पार करके आए हैं. उन्होंने जिस तरह से हमले किए हैं, पुलिस थाने में घुसकर और बाकायदा पोजीशन लेकर पंजाब पुलिस और अन्य सुरक्षा बलों का मुकाबला किया है, उससे यह स्पष्ट है कि वे उच्च स्तर का प्रशिक्षण पाए हुए आतंकवादी थे जिनके पास आधुनिकतम हथियार और गोला-बारूद थे और वे उसका पेशेवर सैनिक की तरह इस्तेमाल करने में सक्षम थे. यानि यह हमला बेहद सुनियोजित था और इसके पीछे शहरी छापामार सैन्य युद्ध में विशेषज्ञता प्राप्त लोगों का दिमाग है.

इसी के साथ यह भी स्पष्ट हो गया है कि अभी भी पाकिस्तान के साथ लगी भारत की सीमा पूरी तरह से सील नहीं हो सकी है. उसमें अभी भी सेंध लगाकर घुसपैठिए भारत आ सकते हैं और तबाही मचा सकते हैं. खुफिया एजेंसियों ने इस प्रकार के हमलों की आशंका व्यक्त की थी, लेकिन ऐसी खबरें हर आतंकवादी हमले के बाद हमेशा आती हैं और उनका अब कोई अर्थ नहीं रह गया है. हमले में जैसा नुकसान हुआ है उसे देखते हुए सुरक्षाबलों को इस प्रकार की रणनीति और कार्यनीति बनानी होगी ताकि वे किसी तरह एक-दो हमलावरों को पकड़ सकें ताकि हमलों के पीछे की साजिश की तफसील पता चल सके.

लटका है लखवी का मामला

यूं पाकिस्तान का भारतविरोधी आतंकवाद के प्रति जिस तरह का रवैया है, उसे देखते हुए यह आश्वस्ति नहीं होती कि इस जानकारी को उसे सौंपने का कोई असर होगा. लेकिन कम-से-कम सुरक्षा एजेंसियां इससे लाभ उठा सकेंगी और अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने इसे पेश कर सकेंगी. पिछले दिनों रूस के उफा शहर में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के बीच मुलाकात हुई. इसके बाद दोनों देशों के विदेश सचिवों ने संयुक्त रूप से एक बयान जारी किया जिसमें स्पष्ट रूप से कहा गया था कि मुंबई हमलों की साजिश रचने वाले लश्कर-ए-तैयबा के प्रमुख नेता जकीउर्रहमान लखवी की आवाज का नमूना भारत को उपलब्ध कराया जाएगा.

इसका मकसद उस व्यक्ति की आवाज से मिलान कराना था जो टेलीफोन पर मुंबई के हमलावरों को निर्देश दे रहा था और जिसकी रिकॉर्डिंग भारत की खुफिया एजेंसियों के पास है. लेकिन अगले ही दिन पाकिस्तानी प्रधानमंत्री के राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति सलाहकार सरताज अजीज ने एक बयान देकर इस आश्वासन को खारिज कर दिया. इससे एक बार फिर साफ हो गया कि पाकिस्तान अपनी विदेशनीति के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए भारत के खिलाफ आतंकवाद को औजार की तरह इस्तेमाल करता रहेगा.

गलतफहमी से मुक्त हो भारत

भारत को आने वाले लंबे समय तक इस समस्या का सामना करना है और इसीलिए उसे इस संबंध में दीर्घकालिक कारगर नीति बनानी पड़ेगी. अभी तक ऐसा नहीं हो पाया है और आतंकवाद का सामना करने में तदर्थवादी यानि एड हॉक तरीका अपनाया गया है. इसी के साथ उसे पाकिस्तान के साथ कभी नर्म कभी गर्म वाली नीति छोड़कर एक स्थायी नीति तैयार करनी होगी जिसे केंद्र में सरकार बदलने के साथ न बदला जाए और जिस पर राष्ट्रीय सहमति हो. हालांकि पाकिस्तान लगातार यह राग अलापता रहता है कि वह तो खुद ही आतंकवाद का शिकार है, लेकिन दुनिया यह जानती है कि पाकिस्तान के भीतर और बाहर पनपने वाले आतंकवाद के पीछे उसकी कितनी बड़ी भूमिका रही है और आज भी है.

भारत को इस गलतफहमी से भी मुक्त हो जाना चाहिए कि अंतरराष्ट्रीय दबाव डलवा कर वह पाकिस्तान को आतंकवाद के प्रति नीति बदलने के लिए मजबूर कर सकता है. पहली बात तो यह कि अमेरिका और अन्य पश्चिमी देश पाकिस्तान की असलियत जानते हुए भी अपने तात्कालिक स्वार्थों के कारण उसके प्रति आंखे मूंदे रहने के अभ्यस्त हो चुके हैं, और दूसरी बात यह कि इस मामले में पाकिस्तान किसी की भी नहीं सुनता. भारत को अपने बलबूते पर ही आतंकवाद की चुनौती का सामना करना होगा.

ब्लॉग: कुलदीप कुमार

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