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फीडबैक

नौनिहाल: देश के कामगार या कर्णधार

कहां खो गया है बचपन और कैसे मासूम बच्चे जीवन की जटिलताओं, परेशानियों में उलझ गए हैं. इसी मुद्दे पर हमारे फेसबुक फैन माधव शर्मा ने अपने विचार रखे हैं.

आज के इस भौतिकवादी और महंगाई से त्रस्त जीवन में बचपन से ही बालकों को जिंदगी की ऊहापोह में उलझ जाना पड़ता है. बालकों की निश्छल-अल्हड़ और उन्मुक्त हंसी-खुशी छिन-सी गई है. विकसित, विकासशील या अविकसित सभी देशों में अब बच्चों का बचपन सच्चे मायने में देखने को नहीं मिलता. दर्जनों जिम्मेदारियां अथवा अपेक्षाएं बच्चों पर लाद दी जाती है. अब बच्चे चाहकर भी अपना जीवन नहीं जी पा रहे हैं.गांव-शहरों की गलियों में टोलियां बनाकर अठखेलियां करते बच्चे अब कहां दिखाई देते हैं.

अविकसित देशों में कुपोषण के शिकार बच्चे अपना और अपने परिवार का सहारा बनने के चक्कर में दुकानों, कारखानों या किसी अन्य जोखिम भरे कामों में अपना बचपन गंवा चुके होते हैं. वहीं विकासशील देशों में प्रतियोगिता के इस दौर में अभिभावक अपने बच्चों को समय से पहले ही कई तरह की कोचिंग क्लासेस और न जाने कितनी ही ट्यूशन की भेंट चढ़ा चुके होते हैं और अमीर देशों के अभिभावकों की उम्मीदें अपने बच्चों से अलग ही तरह की होती हैं. अगली पंक्ति की पोजीशन बनाए रखने के चक्कर में या तो पेरेंट्स अपने बच्चों के लिए समय ही नहीं निकाल पाते हैं या फिर अपने बच्चों के बूते से बाहर उम्मीदें रखकर उन्हें हरफनमौला बनना देखना चाहते हैं. टीवी-मीडिया के पर्दे की चकाचौंध में बचपन पीछे छूट चुका होता है. अपने देश का नाम रोशन करने के लिए ओलंपिक की कठिन तैयारी में दर्दनाक तरीके उनके बचपन को लील लेते हैं.

कहा जाता है कि बच्चे ही किसी भी देश के भावी कर्णधार होते हैं. दूसरी ओर यह भी कहा जाता है कि बाल मजदूरी करना या कराना अपराध है. तरीका चाहे जो भी हो पिसता तो इन नन्हें-मुन्नों का बचपन ही है. मेरा मानना है कि बच्चों पर अनावश्यक बोझ न थोपा जाए. इन नौनिहालों को कामगार न बनाकर उन्हें भरपूर उनका बचपन जीने दिया जाए. उनके बालमन को उन्मुक्त गगन में उड़ने दिया जाए. उनके बचपन के मस्त खिलंदड़ ही उनके भावी जीवन का आधार तैयार कर देते हैं. अनावश्यक हस्तक्षेप उनके लड़कपन को छीन लेता है.

निदा फाजली की पंक्तियां याद आ रही हैं- "नदियां सींचे खेत को,तोता कुतरे आम. सूरज ठेकेदार-सा सबको बांटे काम."

ब्लॉग: माधव शर्मा

संपादनः आभा मोंढे