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दुनिया

नौकरी के बावजूद सरकारी मदद की जरूरत

जर्मनी में पूरा समय काम करने के बावजूद बहुत से लोग इतना नहीं कमा पा रहे हैं कि उससे गुजारा कर सकें. ऐसे लोगों की तादाद लगातार बढ़ रही है जो फुलटाइम नौकरी के बावजूद सरकारी मदद पर निर्भर होते जा रहे हैं.

यह बात जर्मनी के रोजगार दफ्तर से नए आंकड़ों से पता चलती है जिसे देश के प्रमुख दैनिक ज्युड डॉयचे साइटुंग ने प्रकाशित किया है. इस रिपोर्ट का कहना है कि ऐसे कामगारों की तादाद पिछले चार सालों में लगातार बढ़ती गई है जो 800 यूरो मासिक कमाने के बावजूद सरकार द्वारा दी जाने वाली मदद पर निर्भर हैं. पिछले साल तक 800 यूरो प्रति माह की कमाई को टैक्स और बीमा कटौतियों के लिए नियमित नौकरी माना जात था. इस साल इसे बढ़ाकर 850 यूरो कर दिया गया है.

रोजगार कार्यालय के आंकड़ों के अनुसार 2012 में जर्मनी में सवा तीन लाख परिवार ऐसे थे, जिनकी मासिक कमाई 800 यूरो से ज्यादा थी, लेकिन यह राशि परिवार का खर्च चलाने के लिए जरूरी न्यूनतम राशि से कम थी. इसलिए उन्हें परिवार का खर्च चलाने के लिए हार्त्स 4 नियमों के तहत अतिरिक्त भत्ता लेना पड़ रहा था. 2009 में ऐसे परिवारों की संख्या करीब 3 लाख थी. गैर शादीशुदा लोगों के मामले में नौकरी के बावजूद सरकारी मदद पर निर्भर लोगों की संख्या और बढ़ी है. 2009 से 2012 के बीच उनकी संख्या 38 प्रतिशत बढ़कर 75,600 हो गई है.

जिन कामगारों को गुजारे के लिए जरूरी आमदनी से कम वेतन मिल रहा है, वे आम तौर पर दुकानों, रेस्तरां और स्वास्थ्य सेवाओं में काम करते हैं. इसके अलावा उनमें लोन वर्कर भी हैं, जिनसे उद्यम जरूरत पड़ने पर काम लेते हैं. जर्मनी में सामाजिक कल्याण भत्ते पर गुजर करने वाले लोगों की सूची के अनुसार करीब 13 लाख लोग कहीं न कहीं काम भी कर रहे थे. जर्मनी में इस साल से महीने में 450 यूरो की कमाई को मिनी जॉब कहा जाता है और उस पर तय राशि देनी पड़ती है जबकि 450 से 850 यूरो की कमाई मिडी जॉब की श्रेणी में आती है और उस पर नियमित नौकरी से कम कर देना पड़ता है.

लंबे समय से जर्मनी में न्यूनतम मजदूरी लागू करने की मांग कर रही विपक्षी पार्टी एसपीडी की श्रम मामलों की प्रवक्ता अनेट क्रामे ने कहा है कि यह आंकड़े दिखाते हैं कि देश भर में कानूनी न्यूनतम मजदूरी तय करना जरूरी है. एसपीडी और ग्रीन पार्टियों के अलावा ट्रेड यूनियन भी साढ़े 8 यूरो प्रति घंटे की न्यूनतम मजदूरी तय करने की मांग कर रहे हैं. वामपंथी पार्टी डी लिंके और ज्यादा चाहती है जबकि चांसलर अंगेला मैर्केल का सत्ताधारी मोर्चा खास उद्योगों और इलाकों में ही न्यूनतम वेतन को स्वीकार करने को तैयार है.

एमजे/एएम (डीपीए, एएफपी)

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