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मनोरंजन

नोबेल पुरस्कार विजेता गुंटर ग्रास का निधन

नोबेल पुरस्कार विजेता और वर्जनाओं को तोड़ने वाले जर्मन लेखक गुंटर ग्रास लोगों को ध्रुवों में बांटते और उकसाते थे. 87 की उम्र में उनका निधन हो गया है.

उतार चढ़ाव से भरी उनकी जिंदगी 16 अक्टूबर 1927 को शुरू हुई, जिसमें बहुत जादुई पल थे तो ढेर सारी खलबलियां भी. गुंटर ग्रास सामान्य परिस्थितियों में पैदा हुए. उनके माता-पिता की ग्दांस्क शहर में उपनिवेशी सामानों की दुकान थी. ग्राहक गरीब थे, अक्सर खाते पर लिखवा जाते, मकान छोटा था, आसपास का माहौल कैथोलिक था. ग्रास की जीवनी लिखने वाले मिषाएल युर्ग्स कहते हैं, "पवित्र आत्मा और हिटलर के बीच बीता बचपन." ग्रास ने 17 साल की उम्र तक विश्व युद्ध का आतंक देखा, 1944 में विमान रोधी टैंक दस्ते के सहायक के रूप में और बाद में कुख्यात नाजी संगठन एसएस के सदस्य के रूप में. लेकिन अपने इस अतीत को उन्होंने दशकों तक छुपाए रखा, जब बताया तो हंगामा मच गया. उस समय तो युद्ध के दिन काटने थे.

लेखन के शुरुआती दिन

1952 में संघीय जर्मनी युवा था और ग्रास भी. उन्होंने कला में दिलचस्पी लेनी शुरू की, मूर्तिकला और ग्राफिक सीखा, एक जैज मंडली में काम किया, घूमे फिरे और 1956 में कुछ समय के लिए पेरिस चले गए. वहां वे अपनी पत्नी के साथ साधारण सी जिंदगी बिताने लगे, लेकिन यह लेखन के एक बड़े करियर की शुरुआत थी. ग्रास ने अपना उपन्यास 'द टिन ड्रम' लिखा जो 1959 में छपा. उन दिनों के जर्मनी में इसके छपते ही हंगामा मच गया, लेकिन बाद में उसे अंतरराष्ट्रीय सफलता मिली, कई भाषाओं में उसका अनुवाद हुआ और उस पर फिल्म भी बनी. चार दशक बाद उन्हें इस उपन्यास और उपलब्धियों के लिए साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला.

Neueröffnung Günther Grass-Haus Lübeck

ग्रास की कृतियों का संग्रह

रचनात्मक लेखन

गुंटर ग्रास ने ड्रामा, काव्य और मुख्य रूप से उपन्यास लिखा. उनकी रचनाओं की सूची लंबी है. नामी उपन्यासों में कैट एंड माउस, डॉग इयर्स, द मीटिंग एट टेल्गटे, द रैट, माई सेंचुरी, क्रैबवॉक शामिल हैं. इन उपन्यासों में राजनीतिक परिस्थितियों और सामाजिक बदलाव का चित्रण है. मसलन जीडीआर में 1953 के विद्रोह में बुद्धिजीवियों का योगदान, 1968 का छात्र आंदोलन, संसदीय चुनाव प्रचार, भविष्य से जुड़े मुद्दे या बाल्टिक सागर में शरणार्थियों से भरे जहाज का डूबना.

हालांकि ग्रास के बाद के उपन्यासों को टिन का ढोल बजाते ऑस्कर मात्सेराठ की कहानी जैसी सफलता नहीं मिली, हालांकि वे सब बहुत ही सफल रहे. और उन पर चर्चाएं भी होती रहीं, किसी को वे अच्छे लगे तो किसी ने शिकायत की कि उनमें बहुत ज्यादा राजनीति है और बहुत कम कला.

नैतिकता और राजनीति

सफलता के बावजूद गुंटर ग्रास अत्यंत रचनाशील और बहुत सारी कलाओं को समर्पित बहुविध क्षमता वाले कलाकार थे. लेकिन राजनीतिक मामलों में हस्तक्षेप के जरिए भी वे बहस पैदा करते रहे. लंबे समय तक उन्हें जर्मनी में नैतिकता का पैमाना माना जाता रहा. 1961 से वे सोशल डेमोक्रैटिक पार्टी के लिए सक्रिय हुए, 1969 चांसलर बने विली ब्रांट के लिए चुनाव प्रचार किया, कुछ साल बाद पार्टी के सदस्य बने लेकिन शरणार्थी कानून में संशोधन के मुद्दे पर पार्टी के रुख से नाराज होकर पार्टी छोड़ दी.

लेकिन वे समाज पर आलोचक निगाह रखने वाले कार्यकर्ता बने रहे. एक स्वतंत्र वामपंथी जो अपनी ख्याति का इस्तेमाल मुद्दों को उठाने में करता, कुर्दों को वापस भेजने का विरोध हो या नाजीकाल के बंधुआ मजदूरों का समर्थन हो, सताए गए लेखकों का समर्थन या युद्ध का विरोध. फिर 2006 में उन्हें मानना पड़ा कि उन्होंने स्वयं युद्ध में हिस्सा लिया और वह भी नाजी एसएस के सदस्य के रूप में. जीवन कथा में 17 साल की उम्र में एसएस की सदस्यता के रहस्योद्घाटन पर देस विदेश में बड़ा हंगामा हुआ. नैतिक अखंडता की छवि छुपाए गए अपराध से धूमिल हो गई. अचानक उन्हें पाखंडी समझा जाने लगा.

Grass und Taiwan Ausstellung PK

ग्रास की विश्व ख्याति

कविता से उकसावा

बुजुर्ग लेखक और जनमत के बीच इस बीच खाई पैदा हो गई है. जर्मनी को आईना दिखाने वाले नैतिक पैमाने की जरूरत नहीं रह गई. ऐसे में 2012 में ग्रास की एक कविता "जो कहा जाना चाहिए" आई और फिर से हंगामा कर गई. यह कविता इस्राएल की राजनीति पर कड़ी चोट थी. ग्रास ने ईरान पर इस्राएली परमाणु हमले के खिलाफ चेतावनी दी और इस्राएल की परमाणु क्षमता, और उसके कब्जे की नीति को विश्व शांति के लिए खतरा बताया.

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान यहूदियों के नरसंहार के कारण इस्राएल और जर्मनी के बीच विशेष संबंध हैं. गुंटर ग्रास को आलोचना के बाद इस्राएल में अवांछित घोषित कर दिया गया. उनके खिलाफ यहूदी विरोध के आरोप भी लगे. लेकिन इसके बावजूद वे युवा लेखकों के लिए आदर्श बने रहे.

खाने के शौकीन

एक विख्यात लेखक होने के अलावा गुंटर ग्रास एक मजाकिया, चुटकुलेबाज और संवेदनशील इंसान भी थे, यह बात उन्हीं को पता है जो उन्हें नजदीक से जानते थे या उनसे खास परिस्थितियों में मिले थे. मसलन 87 की उम्र में भी जैज संगीत उनकी रगों में बहता था. पांच साल पहले फ्रैंकफर्ट पुस्तक मेले में उन्होंने अपने संगीतकार दोस्त गुंटर बेबी समर के साथ साहित्यिक संगीत प्रदर्शन किया था.

उन्हें जानने वाले यह भी जानते हैं कि वे अच्छा खाना पकाते थे और रेड वाइन से उन्हें प्यार था. इसके अलावा 87 का हो जाने के बावजूद वे उन्होंने पाइप पीना नहीं छोड़ा थआ. उन्हें अपने बड़े भरे पूरे परिवार का मुखिया होना पसंद था और इसका वे प्रदर्शन भी करते थे. महान जर्मन लेखक गोएथे के शब्दों में वे खुद को कुछ यूं प्रस्तुत करते थे, "यहां मैं इंसान हूं, यहां मैं हो सकता हूं."

रिपोर्ट: कॉर्नेलिया राबिट्स/एमजे

संपादन: ईशा भाटिया

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