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दुनिया

नोटबंदी से शादियों में आती सादगी

भारत में पांच सौ और एक हजार रुपए के नोटों पर लगी पाबंदी से आम लोगों को चाहे कितनी भी मुसीबतें झेलनी पड़ रही हो, कम से कम एक मामले में उसने वह कर दिखाया जो 55 साल पुराना एक कानून कभी ना कर सका.

दक्षिण भारतीय राज्य कर्नाटक में बीजेपी से जुड़े एक नेता की पुत्री की पांच सौ करोड़ की शादी को छोड़ दें तो नोटबंदी ने शादी समारोहों में अचानक आई सादगी में अहम भूमिका निभाई है. इससे दहेज और महंगे उपहारों का लेन-देन कम हुआ है और खर्चे घटे हैं. भारत में पांच सौ और एक हजार रुपए के नोटों पर लगी पाबंदी से जहां एक ओर लोग तमाम मुसीबतें झेल रहे हैं लेकिन दूसरी ओर उसने वह कर दिखाया है जो 55 साल पुराने एक कानून के अलावा राजा राममोहन राय, महात्मा गांधी और स्वामी दयानंद सरस्वती जैसे दिग्गज तक नहीं कर सके थे.

देश में ठीक नोटबंदी के समय ही शादियों का सीजन शुरू हुआ है. सरकार ने शादी-ब्याह के लिए कुछ शर्तों के साथ वर-वधू पक्ष को ढाई लाख रुपए तक निकालने की छूट दी है. लेकिन जिस देश में शादी के मौके पर लाखों-करोड़ों खर्च करना शान की बात समझी जाती हो, वहां यह रकम ‘ऊंट के मुंह में जीरा' ही लगती है. नतीजा यह हुआ कि कई मामलों में न चाहने के बावजूद लोग बेहद सादगी से शादी करने पर मजबूर हो रहे हैं. हालांकि कर्नाटक के बीजेपी नेता जनार्दन रेड्डी की तरह कुछ अपवाद भी हैं जिन्होंने अपनी बेटी की शाही शादी में कम से कम पांच सौ करोड़ लुटा दिए. अब तो शादियां हजारों और कई मामलों में सैकड़ों तक में भी हो रही हैं. वर पक्ष ज्यादातर मामलों में बिना दहेज लिए बारात लाने पर मजबूर है. शादी समारोहों की भव्यता, पंडालों की सजावट और इस मौके पर परोसे जाने वाले सैकड़ों किस्म के लजीज व्यंजन भी बीते कल की बात बन चुके हैं.

नोटबंदी की वजह से देश के विभिन्न इलाकों में बिना तड़क-भड़क के होने वली शादियों की खबरें लगभग रोजाना छन कर सामने आ रही हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गृह राज्य गुजरात में एक व्यक्ति ने अपनी शादी में महज चार सौ रुपए खर्च किए. इसी तरह बिहार में एक व्यक्ति ने अपनी बेटी की शादी में मेहमानों को महज चाय पर आने का न्योता दिया. आईएस टॉपर टीना दाबी और दूसरे स्थान पर रहे आमिर-उल-सफी खान की सगाई भी सादगी के लिए चर्चा में रही.

सामाजिक बुराई

राजा राम मोहन राय, महात्मा गांधी और स्वामी दयानंद सरस्वती ने दहेज प्रथा के खिलाफ देशव्यापी जागरुकता अभियान चलाया था. उसके बाद दहेज प्रथा पर अंकुश लगाने के लिए दहेज निषेध अधिनियम, 1961 बनाया गया था. लेकिन यह सामाजिक बुराई कम होने की बजाय समय के साथ तेजी से बढ़ती ही रही है. अब तो खासकर हिंदीभाषी राज्यों में आईएस से लेकर डाक्टर, इंजीनियर और सरकारी नौकरी करने वाले लड़कों के दहेज की दर तय है और यह रकम लड़के की हैसियत के अनुसार कुछ लाख से लेकर करोड़ तक हो सकती है. दहेज निषेध अधिनियम के तहत दहेज मांगना और देना दोनों दंडनीय अपराध हैं. लेकिन इसके बावजूद दहेज प्रथा बेरोक-टोक जारी है और समाज के निचले पायदान पर रहने वाले लोगों से लेकर नीति निर्माताओं तक सबको यह बात पता है. लेकिन नोटबंदी ने एक झटके में इस सामाजिक बुराई की कमर लगभग तोड़ दी है. मध्य और उच्च-मध्य वर्ग के लोग शादी-ब्याह के मौके पर अपना रुतबा दिखाने या बनाए रखने के लिए दिल खोल कर काला धन खर्च करते थे. लेकिन अब बोरी में भरे नोट घर में रखे होने के बावजूद वह चाह कर भी ऐसा नहीं कर पा रहे हैं.

वजह

आखिर नोटबंदी का शादी समारोहों पर इतना भारी प्रभाव क्यों नजर आ रहा है ? शादी-ब्याह कराने वाले पोर्टल बैंडबाजा डाट काम के सह-संस्थापक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी सचिन सिंघल कहते हैं, "शादियों में नकदी का चलन ही ज्यादा है. इस आयोजन में 60 से 70 फीसदी भुगतान नकद ही होता है. ऐसे समारोहों में फूलों और पंडालों की सजावट के अलावा बैंड-बाजे वाले और केटरर नकद भुगतान को ही तरजीह देते हैं. वह चेक या डिजिटल वॉलेट के जरिए भुगतान लेने से हिचकते हैं." वह कहते हैं कि करेंसी नोटों के संकट ने लोगों को सादगी अपनाने पर मजबूर कर दिया है. एक अन्य ऐसी कंपनी ‘डोली सजा के रखना' की निकिता डोगरा बताती हैं,"शादी के खर्चों को घटाने के लिए लोग अब भव्य हॉलों या होटलों की बजाय अपने घर से ही शादियां कर रहे हैं. इससे काफी खर्च बच जाता है. इसके साथ ही अब ऐसे सामरोहों को तीन दिनों की बजाय एक दिन ही सीमित रखा जा रहा है." वह बताती हैं कि नोटबंदी के चलते ऐसे समारोहों में मेहमानों की सूची में भी जमकर कटौती हो रही है.

मानसिकता में बदलाव जरूरी

भारत में शादियों में दहेज के अलावा वधू पक्ष की ओर से वर पक्ष को हैसियत के मुताबिक उपहारों का भी बड़े पैमाने पर प्रचलन था. वह चाहे आभूषण हों या फिर टीवी, फ्रिज, एसी, मोटर साइकिल या कार जैसी चीजें. अब इस परंपरा भी भारी गिरावट आई है.

समाजशास्त्रियों का कहना है कि नोटबंदी के बाद उपजे नकदी संकट की वजह से शादी या इसके स्वागत समारोह के दौरान धन के भौंडे प्रदर्शन पर रोक लगी है. लोग चाह कर भी ऐसा नहीं कर सकते. एक समाजशास्त्री दिनेश महंत कहते हैं, "नोटबंदी से आम लोगों को परेशानी जरूरी हो रही है. लेकिन कम से कम शादियों को सादगी भरा बनाना इसका एक सकारात्मक पहलू है." वह मानते हैं कि इससे समाज में गहरी जड़ें जमा चुकी दहेज प्रथा को एकदम खत्म करना भले संभव नहीं हो. लेकिन इसके साथ ही अगर सरकार सामाजिक संगठनों के साथ मिल कर देशव्यापी जागरुकता अभियान शुरू करें तो लोगों की मानसिकता में कुछ बदलाव जरूर आएगा. समाजशास्त्र के प्रोफेसर रघुवीर गांगुली कहते हैं, "समाज में लोगों के पास जमा होने वाले बेहिसाबी धन ने शादी को दो दिलों और परिवारों के मेल की बजाय धन के प्रदर्शन का मेला बना दिया था. कम से कम इस साल तो इस प्रवृत्ति पर अंकुश लगा ही है."

विशेषज्ञों का कहना है कि काले धन पर सरकार के रुख में लगातार आती कड़ाई से आगे भी लोग शादियों में अनाप-शनाप खर्च करने से पहले कई बार सोचेंगे. वह कहते हैं कि दहेज प्रथा को जड़ से खत्म करने के लिए समाज की मानसिकता में बदलाव जरूरी है. लेकिन अब इसमें नोटबंदी और प्रस्तावित आय कर कानूनों की भी अहम भूमिका रहेगी.

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