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ब्लॉग

नैनीताल से निकली संवैधानिक नजीर

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने प्रदेश में राष्ट्रपति शासन को अवैध करार दिया है और महीने के अंत में विधान सभा में शक्ति परीक्षण का आदेश दिया है. कोर्ट का आदेश राज्य सरकारों को बर्खास्त करने के केंद्र सरकार के अधिकारों पर अंकुश.

‘बड़े बेआबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले' या ‘अपने ही हाथों अपने हाथ जला लिए'– आज ये कहना कठिन है कि उत्तराखंड के संदर्भ इनमें से कौन सा मुहावरा केंद्र के लिये अधिक सटीक बैठता है. उत्तराखंड में लोकतांत्रिक ढंग से चुनी सरकार को पांचवें साल में अस्थिर करने, बर्खास्त करने, प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगा देने और फिर वहां सरकार बनाने की केंद्र और बीजेपी की कोशिशों को तब बड़ा झटका लगा जब नैनीताल हाईकोर्ट ने राष्ट्रपति शासन को गैरकानूनी करार दिया. अदालत ने प्रदेश से राष्ट्रपति शासन हटाने के निर्देश दिए हैं और प्रदेश में 18 मार्च की राजनीतिक स्थिति को बहाल करते हुए 29 अप्रैल को सदन में बहुमत परीक्षण के आदेश दिए हैं. उधर एक दूसरे फैसले में हाई कोर्ट ने कांग्रेस के नौ बागी विधायकों की सदस्यता भी रद्द कर दी है और इस संबंध में विधानसभा अध्यक्ष के निर्णय को सही ठहराया है.

जिस तरह से चार दिनों से हाईकोर्ट लगातार इस मामले में केंद्र की खिंचाई कर रहा था उससे ये अंदाजा लग ही रहा था कि ऐसा ही कोई निर्णय आएगा. अदालत ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि रावत सरकार को बर्खास्त करके राष्ट्रपति शासन लगाने का फैसला लोकतंत्र की जड़ें काटने की तरह है. अदालत ने कहा कि राज्यपाल केंद्र का एजेंट नहीं है और ये भी कहा कि राष्ट्रपति से भी भूल हो सकती है और राष्ट्रपति के आदेश का न्यायिक पुनरीक्षण किया जा सकता है. नैनीताल हाईकोर्ट ने केंद्र के रवैये पर कई ऐसे सवाल भी पूछ डाले जिनसे भारत सरकार के महाधिवक्ता और अन्य वरिष्ठ वकीलों के लिये बगलें झांकने की नौबत आ गई. जैसे कि ये कहना कि आखिर बहुमत के लिये तय तारीख के एक दिन पहले राष्ट्रपति शासन लगाने की क्या हड़बड़ी थी.

उत्तराखंड में 27 मार्च को कांग्रेस की हरीश रावत सरकार को बर्खास्त कर राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया था. इससे पहले केंद्र ने राज्यपाल के उस आदेश की भी अनदेखी कर दी जो उन्होंने 28 मार्च को सरकार को सदन में बहुमत साबित करने के लिए दिया था.

एक तरह से अदालती गलियारे और कानूनी पेचीदगियों में फंसे इस मामले का तात्कालिक अंत तो हो गया है लेकिन अनुच्छेद 356 के इस्तेमाल से जुड़ी विसंगतियों और केंद्र राज्य संबंधों और अधिकारों के प्रश्नों का पटाक्षेप नहीं हुआ है. लेकिन इसमें कोई आश्चर्य इसलिये नहीं होना चाहिए क्योंकि केंद्र में सत्ताधारी बीजेपी वही कर रही है जो केंद्र में रहते हुए कांग्रेस अनेकों बार कर चुकी है. ये परिपाटी अनायास ही नहीं बनी कि केंद्र में सत्ताधारी पार्टी राज्यपाल की रिपोर्ट की आड़ में संवैधानिक संकट की स्थिति बताकर दूसरी पार्टी की सरकारों को बर्खास्त कर देती है.

1994 में एसआर बोम्मई बनाम संघ सरकार मामले के पहले तक ये प्रस्थापना थी कि अदालतें धारा 356 के इस्तेमाल का न्यायिक पुनरीक्षण नहीं कर सकती है. लेकिन 1994 के इस बहुचर्चित मामले में सुप्रीम कोर्ट ने असाधारण फैसला दिया कि केंद्र द्वारा राष्ट्रपति शासन लगाने के फैसले का न्यायिक पुनरीक्षण किया जा सकता है. नैनीताल हाइकोर्ट का आज का फैसला भी उसी फैसले की भावना के अनुरूप है जिसमें ये माना गया है कि अगर कुछ विधायक किसी सरकार से समर्थन वापस ले लेते हैं तो सरकार के भविष्य का फैसला सदन में बहुमत परीक्षण से ही हो सकता है.

गौरतलब है कि संविधान सभा में बहस के दौरान भी धारा 356 के संभावित दुरुपयोग की आशंकाएं जताई गई थीं. प्रारूप समिति के अध्यक्ष डॉ. अंबेडकर ने कहा था कि संविधान के इस प्रावधान को ठंडे बस्ते में ही रहने दिया जाना चाहिए. उन्होंने कहा था कि अगर कभी इसके इस्तेमाल की नौबत भी आए तो पहले पर्याप्त चेतावनी दिया जाना जरूरी होगा. लेकिन ऐसा नहीं हुआ और 70 और 80 के दशक में बड़े पैमाने पर इस प्रावधान का दुरूपयोग कर लोकतांत्रिक ढंग से चुनी सरकारें गिराई गईं. अब तक इस प्रावधान का सौ स ज्यादा बार इस्तेमाल हो चुका है.

इस बीच कई हलकों से ये भी शिकायत आ रही है कि ये न्यायालय की अति सक्रियता है और अदालत राजनीतिक मामलों में अनावश्यक हस्तक्षेप कर रही है. लेकिन इतना तय है कि ये मामला भविष्य के लिये एक नजीर बनेगा और भविष्य में केंद्र सरकारें धारा 356 के मनमाने इस्तेमाल से बाज आएंगी.

ब्लॉगः शिवप्रसाद जोशी

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