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मनोरंजन

नेपाल में हिंदी नहीं चीनी

सदियों से हिंदी बोलने में खुशी महसूस करता रहा नेपाल अब चीनी भाषा सीख रहा है. आर्थिक मजबूरियां और उपेक्षा ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रिश्तों पर भारी पड़ गई हैं.

पहले अखबार के रिपोर्टर रहे बाबू कृष्ण महार्जन अब चीनी सैलानियों के लिए काठमांडू में गाइड बन गए हैं और साथ में फ्रीलांसर के तौर पर लिखते भी हैं. वो पहले से ज्यादा कमा रहे हैं. नेपाल में चीनी भाषा के जरिए पैसा कमाना आसान हो गया है. महार्जन बताते हैं, "अगर आप चीनी भाषा जानते हैं तो टीचर या अनुवादक के रूप में भी काम कर सकते हैं. यहां कई बड़े प्रोजेक्ट चल रहे हैं जैसे कि पनबिजली परियोजनाएं और इन सब के ठेके चीनी कंपनियों के पास हैं ऐसे में अनुवादकों की काफी मांग है."

नेपाल के सबसे बड़े भाषा कॉलेज, बिस्व भाषा कैम्पस में छात्र सबसे ज्यादा मंदारिन सीखने की ही मांग कर रहे है. कॉलेज के प्रिंसिपल बाम देव अधिकारी ने चीनी भाषा की लोकप्रियता के बारे में बताया, "इस साल 600 छात्रों ने आवेदन किया लेकिन सीटों की कमी के कारण जब हमें 200 आवेदन खारिज करने पड़े तो वो विरोध में मेरे दफ्तर का दरवाजा तोड़ने पर उतारू हो गए." बहुत से निजी स्कूलों में भी भाषा पढ़ाई जा रही है और इसके लिए सैकड़ों चीनी स्वयंसेवक भाषा सिखाने के लिए नेपाल में रह रहे हैं. फिलहाल कम से कम नेपाल के 90 स्कूलों में मंदारिन सिखाई जा रही है.

नेपाल और चीन के बीच 1950 के दशक से ही कूटनीतिक संबंध हैं. नेपाल के उत्तरी पड़ोसी ने हाल ही में अपनी संस्कृति और भाषा के प्रचार के लिए एक नया कार्यक्रम भी शुरू किया है. नेपाल में पहले अंग्रेजी और नेपाली ही अनिवार्य भाषा के रूप में पढ़ाई जाती थी लेकिन अब नई भाषा छात्रों और स्कूलों को लुभा रही है.

एक निजी स्कूल के वाइस प्रिंसिपल राजेंद्र शर्मा ने बताया, "हम तीसरी से सातवीं कक्षा के छात्रों को मंदारिन अनिवार्य भाषा के रूप में पढ़ने का मौका दे रहे हैं." स्कूल में चीनी भाषा का यह छठा साल है और इसके लिए चीन शिक्षक भेजता है. शर्मा बताते हैं, "विदेशी भाषा पढ़ाने का मतलब है कि हम अपने स्कूल की ओर छात्रों और उनके अभिभावकों का ध्यान खींचने के लिए कुछ नया दे रहे हैं. हिंदी और चीनी दोनों भाषाएं हमारे लिए अहम हैं क्योंकि यह हमारे सबसे करीबी पड़ोसी हैं."

हिंदी और नेपाली दोनों की जड़े संस्कृत भाषा में हैं. भारत और नेपाल के बीच सांस्कृतिक और धार्मिक समानता भी नेपाली लोगों को हिंदी की ओर ले जाती है. हिंदी और नेपाली दोनों की लिपी देवनागरी है. इसके अलावा नेपाल में बॉलीवुड की फिल्मों के क्रेज के कारण भी वहां के लोग हिंदी को आसानी से समझ लेते हैं. भारत और नेपाल के नागरिक बिना पासपोर्ट और वीजा के एक दूसरे के यहां आ जा सकते हैं, नौकरी कर सकते हैं. लेकिन ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रूप से मजबूत संबंध होने के बावजूद भारत और नेपाल के बीच रिश्तों में वैसी गर्माहट नहीं रही. नेपाल अपने विकास में भारत से जिस भूमिका की उम्मीद रखता है, उसमें उसे निराशा मिली है.

नेपाल के लोगों के लिए चीनी भाषा तो "ग्रीक" जैसी है फिर भी आर्थिक वजहों से लोग इसे सीख रहे हैं. चीनी भाषा अक्षरों से नहीं बल्कि तस्वीरों से लिखी जाती है और इस लिहाज से यह काफी कठिन भी है. चीनी सीखने वाली एक छात्रा दीपासना मैनाली ने कहा, "मैं इन तस्वीरों से लिखना पसंद करती हूं क्योंकि इसमें बड़ा मजा आता है. यह कला जैसी है और इसमें सीखने के लिए नई चीजें हैं."

यहां चीनी सैलानियों की बढ़ती तादाद भी चीनी भाषा सीखने वालों के लिए मौका बन रही है. नेपाल टूरिज्म एसोसिएशन से जुड़े गंगा सागर पंत कहते हैं, "भाषा की ताकत आमतौर पर अर्थव्यवस्था की ताकत के पीछे चलती है." अर्थव्यवस्था के बढ़ने का मतलब है ज्यादा नौकरियां. नेपाल में रोजगार एक मुद्दा है और चीनी भाषा सीखने का मतलब है नौकरी. नेपाल में इस वक्त कुल सैलानियों के एक चौथाई चीन से आते हैं.

बीते सालों में चीन ने नेपाल की ओर कदम बढ़ाए हैं. नेपाल में चीन का असर बढ़ रहा है, तिब्बती शरणार्थियों के हाथों चीन विरोधी गतिविधियों को रोकने के लिए यह नेपाल को ज्यादा सैन्य सहायता दे रहा है. इसके बदले नेपाल ने भी अपनी "वन चाइना" नीति पर प्रतिबद्धता दोहराई है. दोनों देशों के बीच आपसी कारोबार पिछले साल 1.2 अरब डॉलर तक जा पहुंची है क्योंकि चीनी सामानों पर नेपाल की निर्भरता काफी ज्यादा है. नेपाल के पर्यटन और संस्कृति मंत्री राम कुमार श्रेष्ठ का कहना है, "चीन हमारा अच्छा पड़ोसी है और हर क्षेत्र में विकास कर रहा है तो यह हमारे लिए जरूरी है कि हम उनकी भाषा सीखें."

एनआर/ओएसजे (डीपीए)

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