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दुनिया

नेपाल में शरणार्थियों की हालत बुरी

म्यांमार में सांप्रदायिक हिंसा से जान बचाकर नेपाल में शरण लेने वाले रोहिंग्या मुसलमानों की हालत बहुत खराब है. अच्छी जिंदगी की चाहत में नेपाल में आने वाले सैकड़ों रोहिंग्या मुसलमान ठगा सा महसूस कर रहे हैं.

म्यांमार में पिछले साल हुए दंगों में अमीर हुसैन के परिवार के दर्जनों लोग मारे गए. म्यांमार से जान बचाने के बाद अमीर नेपाल पहुंचे. लेकिन नेपाल की शरणार्थी नीति ने सैकड़ों फंसे लोगों की तरह उन्हें भी बेरोजगार बना दिया और नाक तक कर्ज में डुबो दिया. अमीर अपने परिवार के साथ एक कमरे में किसी तरह से गुजारा करते हैं. घर की दीवार टूट गई है, बरसात का पानी छत से टपकता है और खुली सीढ़ी हादसे को दावत देती है. अमीर अपना दर्द बयां करते हैं, "अगर मैं बर्मा जाता हूं तो मार दिया जाऊंगा. जब मैं नेपाल आया तो सुरक्षित महसूस कर रहा था. लेकिन हमें यहां बहुत समस्याओं का सामना करना पड़ता है."

नेपाल में सैकड़ों की संख्या में हताश शरणार्थी फंसे हुए हैं. उनका कहना है कि पश्चिम में शरण लेने के पहले नेपाल उनसे एक लाख डॉलर जुर्माना भरने को कहता है. इन शरणार्थियों को काम करने से रोक दिया गया है. कई लोग सालों से सरकार द्वारा देश छोड़ने की इजाजत का इंतजार कर रहे हैं. सबसे बड़ी समस्या ये है कि संयुक्त राष्ट्र की शरणार्थी एजेंसी द्वारा पश्चिम में नई जिंदगी के प्रस्ताव के बावजूद यहां लोग फंसे हुए हैं. सिर्फ काठमांडु में ही ऐसे लोगों की संख्या 400 के करीब है. नेपाल का कानून उन्हें देश छोड़ने की इजाजत नहीं देता. नागरिक अधिकार समूह इसकी आलोचना करते हैं. नेपाल ने न तो 1951 के संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं और न ही उसने शरण चाहने वाले या शरणार्थियों को संबोधित करने के लिए स्पष्ट कानूनी ढांचा तैयार किया है. टूरिस्ट वीजा के 30 दिन की अवधि के बाद रहने वाले शरणार्थियों पर रोजाना पांच डॉलर का जुर्माना लगाया जाता है. देश छोड़ने के पहले उन्हें यह कर्ज चुकाना पड़ता है. कई परिवारों के ऊपर लाखों डॉलर का कर्ज चढ़ चुका है.

कर्ज चुकाने का कोई तरीका नहीं

यूएनएचसीआर की तरफ से पुनर्वास कार्यक्रम के बावजूद नेपाल सरकार जुर्माना माफ नहीं करती. ना ही नेपाल सरकार उनके शरणार्थी होने को मान्यता देती है. कर्ज चुकाए बिना शरणार्थी नेपाल नहीं छोड़ सकते और न ही उन्हें काम करने की इजाजत है. पाकिस्तानी शहर लाहौर के रहने वाले 42 साल के नावेद अहमद और उनके परिवार पर एक लाख डॉलर का जुर्माना है. नावेद अहमदी संप्रदाय के सदस्य हैं. अहमदी संप्रदाय के लोग पाकिस्तानी कानून के तहत मुस्लिम नहीं हैं. न ही उन्हें परंपरागत इस्लामी अभिवादन सलाम कहने की इजाजत है. अपने ऊपर फायरिंग के बाद अहमद ने साल 2004 में पाकिस्तान छोड़ने का फैसला किया. नावेद कहते हैं, "मुझे सब चीजों की याद आती हैं. मेरा दिल और आत्मा तो पाकिस्तान में ही है लेकिन हम वहां नहीं रह सकते."

नावेद अपने पांच छोटे भाइयों के साथ नेपाल आए थे. समय बीतने के साथ भाइयों की शादी हो गई. ज्यादातर लोगों को अमेरिका में शरण भी मिल गई है. लेकिन नेपाल छो़ड़ने के पहले उन्हें पहाड़ जैसा जुर्माना चुकाना होगा, जो कि बहुत ही मुश्किल काम है. यूएनएचसीआर की तरफ से शरणार्थियों को बहुत ही कम भत्ता मिलता है. जिसके जरिए वे अपने परिवार का पेट पालते हैं. सरकार का कहना है कि उसने दो बार वीजा अवधि से अधिक ठहरने का जुर्माना माफ किया है. लेकिन इसका लाभ पाने वालों की संख्या चार दर्जन ही है. नेपाल सरकार की तरफ से शरणार्थियों के लिए समन्वय इकाई के प्रमुख शंकर प्रसाद कोइराला के मुताबिक, "हम इन लोगों को शरणार्थी नहीं मानते हैं, हम उन्हें अवैध प्रवासी मानते हैं. कानून के मुताबिक हम फीस माफ नहीं कर सकते." भूटान के हजारों शरणार्थियों की फीस नेपाल माफ कर चुका है. जो कि नेपाली मूल के लोग हैं. यूएनएचसीआर इन्हें पश्चिम में सफलतापू्र्वक दोबारा बसा भी चुका है.

एए/एमजे (एएफपी)

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