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दुनिया

नेपाल में महामारी का खतरा: जर्मन राहतकर्मी

बहुत से देशों और संगठनों ने अपने राहतकर्मियों को नेपाल भेजा है. फेलिक्स नॉयहाउस जर्मन राहत संस्था एडब्ल्यूओ के नेपाल संयोजक हैं. जर्मनी के राष्ट्रीय रेडियो की सांड्रा शुल्त्स ने उनसे काठमांडू में बातचीत की.

सांड्रा शुल्त्स: पिछले दिनों में आपका अनुभव कैसा रहा है?

फेलिक्स नॉयहाउस: बहुत बहुत हेक्टिक. यहां दो बहुत गहरे झटके आए, पिछला कल दोपहर में. यहां सड़कों पर अव्यवस्था है, कुछ लोग सड़कों पर या पार्क में रह रहे हैं हालांकि यहां बहुत कम पार्क हैं. बहुत लोगों को अपने घरों में रहना पड़ रहा है क्योंकि सुरक्षित रिहायश नहीं है. रात में भारी बरसात हुई है. मैंने भी अपने परिवार के साथ रात घर के बाहर तंबू में गुजारी और हम सब भीग गए. खासकर गोरखा और दूसरे 9 प्रभावित जिले के गांवों की हालत बहुत खराब है जहां घर पूरी तरह ध्वस्त हो गए हैं और लोगों को बिना किसी छत के रात गुजारनी पड़ रही है. यहां देख सकते हैं कि ललितपुर में जहां मैं रहता हूं, कोई सरकारी मदद नहीं मिल रही है. सेना नहीं है, पुलिस वाले भी नहीं दिखते, लोग अपने ऊपर निर्भर हैं, कोई सूचना नहीं है.

घायलों की चिकित्सीय देखभाल की क्या हालत है?

अस्पताल पूरी तरह भरे हैं. हेल्थ वर्क्स रास्तों पर जाकर लोगों की मदद कर रहे हैं. उनके बक्सों में पारासिटोमोल और फर्स्ट एड के लिए जरूरी चीजें तो हैं लेकिन एंटीबायटिक दवाएं नहीं हैं. हमें डर है कि अब पानी की वजह से होने वाली बीमारियां हो सकती हैं. पीने के पानी की सप्लाई ठीक से नहीं हो रही जिसकी वजह से महामारियों का खतरा है.

ऐसी हालत में बचाव का काम और सहायता कैसे हो रही है?

मैं कहूंगा कि बिना किसी समन्वय के. हम नियमित हवाई परिवहन देख रहे हैं. भारतीय वायुसेना और दूसरे एक के बाद एक सैनिक विमान ला रहे हैं. हमें भी साफ नहीं है कि राहत सामग्रियों का बंटवारा कैसे होगा. पिछले दो दिनों में हमने यह पता करने की कोशिश की है कि हमारे कर्मचारियों की क्या हालत है. वे सब ठीक हैं, हम उन्हें दफ्तर मे लाने की कोशिश कर रहे हैं. उसके बाद हम मदद का काम शुरू करेंगे. हम सरकारी अधिकारियों के साथ संपर्क स्थापित कर रहे हैं. सात जिलों में हमारी सहयोगी संस्थाएं हैं. पिछले दो दिनों में मैंने उनके साथ संपर्क किया है.

आपका काम इन दिनों कैसा है? आप ठीक ठीक क्या कर रहे हैं?

इस समय हमने अपने कर्मचारियों को फिर से इकट्ठा करने की कोशिश की है. हमारा सोलर पैनल काम नहीं कर रहा है, हम अपने जनरेटर को ठीक करने की कोशिश कर रहे हैं. इंटरनेट भी काम नहीं कर रहा है. हमें अक्सर दूसरे इलाकों में जाना पड़ता है ताकि हमारा मोबाइल फोन काम कर सके ताकि हम जर्मनी के साथ कॉर्डिनेट कर सकें, नई सूचनाएं पा सकें. अपने सहयोगियों के साथ हम रिस्क मैनेजमेंट की कोशिश कर रहे हैं. हमारे पार्टनर परियोजना वाले गांवों में पूछ रहे हैं कि उन्हें क्या चाहिए, क्या नुकसान हुआ है, कितने लोग हताहत हुए हैं और हम किस तरह से मदद कर सकते हैं. हम निश्चित रूप से आने वाले दिनों में खाद्य पदार्थों और टेंटों की मदद करेंगे. इसके अलावा हम छोटे बच्चों और मांओं पर ध्यान देंगे, उन्हें कोई मदद नहीं मिलती. दो दिन से दूध नहीं मिल रहा है. हमारे सहयोगियों का बड़ा नेटवर्क है, उनकी मदद से हम सहायता सीधे प्रभावित लोगों तक पहुंचाएंगे.

नेपाल को किस तरह की अंतरराष्ट्रीय सहायता की जरूरत है?

ये अच्छा सवाल है. हमें जर्मन दस्तों के बारे में भी पता है जिंहोंने सहयोग के बारे में पूछा है. हमारे पास यूं तो छोटी सी टीम है लेकिन इन संगठनों को जितना हो सके मदद करने की कोशिश करेंगे. हम गृह मंत्रालय के साथ इसके बारे में बात करेंगे, वे राहत के समन्वय के लिए जिम्मेदार हैं. उनसे हम विस्तार में बात करेंगे, और संयुक्त राष्ट्र के प्रतिनिधियों के साथ भी, जो यहां राहतकार्य में लगे हुए हैं, जैसे कि वर्क फॉर फूड प्रोग्राम. उन्होंने तो भूकंप से पहले ट्रेनिंग भी आयोजित किए थे.

क्या पिछले दो दिनों में कुछ ऐसा हुआ है जिससे आपकी उम्मीद बंधी हो?

जी हां, मेरी इस बात से उम्मीद बंधी कि मेरा परिवार नहीं बिखरा. यह दोहरी भूमिका निभाना काफी मुश्किल है. एक तरफ तो आपको राहतकार्य को संभालना है. दूसरी तरफ आपका अपना परिवार है जिसके लिए आपके पास कोई समय ही नहीं है क्योंकि हर वक्त फोन बजता रहता है और आप कॉर्डिनेट करते रहते हैं. लेकिन मेरे परिवार ने इसे इतनी अच्छी तरह संभाला है कि भविष्य के लिए मेरी उम्मीद बंध गयी है.

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