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ताना बाना

नेपाल में फिर पीएम चुनने की कवायद

नेपाल की संसद सोमवार को फिर प्रधानमंत्री चुनने की कोशिश करेगी. यह तीसरा मौका है जब वहां प्रधानमंत्री का चुनाव हो रहा है. 2006 से अस्थिरता का शिकार नेपाल में टिकाऊ नेता चुनना एक समस्या बनती जा रही है.

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प्रचंड के नेता चुने जाने की संभावना

601 सदस्यों वाली संसद में सोमवार को प्रधानमंत्री का चुनाव होना है. मुख्य मुकाबला माओवादी नेता पुष्प कमल दहल उर्फ प्रचंड और नेपाली कांग्रेस के नेता राम चंद्र पौदल में है लेकिन प्रचंड के जीतने की संभावना ज्यादा है क्योंकि संसद में उनके सदस्यों की सबसे ज्यादा है. लेकिन पूर्व प्रधानमंत्री प्रचंड को सरकार बनाने के लिए जरूरी आंकड़ा जुटाने के लिए छोटी पार्टियों के समर्थन की जरूरत होगी.

हालांकि जानकारों का मानना है कि छोटी पार्टियों का समर्थन मिलने के बाद भी यह कहना मुश्किल है कि एक देश को एक टिकाऊ सरकार मिल पाएगी. पत्रकार आदित्य अधिकारी का कहना है कि छोटी मधेसी पार्टियों के समर्थन के बाद भी प्रचंड के नेतृत्व में माओवादी सरकार काफी कमजोर होगी और किसी भी तरह के दबाव का सामना नहीं कर पाएगी. मधेसी नेपाल के तराई क्षेत्र में रहने वाले अल्पसंख्यक लोग है. उनका मानना है कि उन्हें अब तक मुख्य धारा की नेपाली राजनीति से दूर रखा गया है.

मधेसी पार्टियों के पास 82 सांसद और प्रधानमंत्री बनने के लिए प्रचंड या पौदल के लिए उनका समर्थन बेहद जरूरी है. नेपाल मार्क्सवादी पार्टी (एकीकृत मार्क्सवादी लेनिनवादी) और मधेसी मोर्चे के बीच अभी तक किसी एक उम्मीदवार का समर्थन करने पर सहमति नहीं बन पाई है. इन दोनों पार्टियों के पास संसद में 200 सीटें हैं.

30 जून को प्रधानमंत्री माधव कुमार नेपाल ने यह कहते हुए इस्तीफा दे दिया कि वह एक राष्ट्रीय एकता वाली सरकार के लिए रास्ता साफ करना चाहते हैं. तब से देश में एक कार्यवाहक सरकार काम कर रही है. विश्लेषकों का कहना है कि माधव नेपाल को सरकार से अलग कर माओवादी पूर्ण बहुमत के साथ देश पर शासन करना चाहते हैं क्योंकि एक सकारात्मक विपक्ष बन कर रहने में वे संतुष्ट नहीं रह सकते.

रिपोर्टः एजेंसियां/एम गोपालकृष्णन

संपादनः ए कुमार

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