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विज्ञान

नेपाल में घास-घास से पात-पात परेशान

राजधानी काठमांडू से सैकड़ों किलोमीटर दूर वीरान इलाके में घास की एक नस्ल पनपती जा रही है और इस विदेशी घास के मैदान के सामने घरेलू वनस्पति पीछे हटती जा रही है, सुबह की धूप के सामने कुहासे की तरह.

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घास की यह नई प्रजाति दक्षिण अमेरिका से आई है और इसे स्थानीय भाषा में बनमारा या मिनट में मील कहा जाता है. नेपाल में 1975 में इसका पता चला. घास का यह मैदान हर दिन ढाई सेंटीमीटर की तेजी के साथ आगे बढ़ रहा है और इस बीच चितवन नेशनल पार्क के व्यापक हिस्से में यह फैल चुका है.

पर्यावरण के लिए खतरा बन चुकी इस घास के बारे में एक फिल्म बनी है, जिसका नाम है हर मिनट एक मील. इस फिल्म के निर्माता चंदा राणा कहते हैं कि हर रोज घास के 40 हजार तक नए बीज पैदा हो रहे हैं, अगर अभी से सामूहिक रूप से कदम न उठाए जाएं, क्षेत्र की 50 फीसदी वनस्पति पांच सालों के अंदर मिट जाएगी. वन संरक्षणकर्ताओं का कहना है कि अवैध शिकार के साथ साथ यह घास भी जंगली जानवरों के लिए सबसे बड़ा खतरा बन चुका है.

यह क्षेत्र एक सींग वाले गैंडों और रॉयल बंगाल टाइगर का घर है. इनके अवैध शिकार से नेपाल परेशान है. खासकर चीन में गैंडों की सींग की बेहद मांग है, इसे पौरुष वर्धक माना जाता है. अब नेपाल में सिर्फ 400 गैंडे रह गए हैं. सन 2008 से 2010 के बीच 25 गैंडों का अवैध शिकार किया गया, जबकि माओवादी विद्रोह के शिखर के दौरान 2001-02 में लगभग 100 गैंडें मारे गए थे.

दो साल पहले सरकार की ओर से इस घास के विस्तार के खिलाफ एक जैविक नियंत्रण अभियान शुरू किया गया था. नेपाल एग्रीकल्चर रिसर्च कौंसिल के वरिष्ठ वैज्ञानिक राम बाबू पनेरू का कहना है कि वे इस सिलसिले में एक खास मक्खी का इस्तेमाल कर रहे थे, जो घास की बीजों को खा डालती है. किसी हद तक इसमें सफलता मिली, लेकिन घास के पौधों की शाखाएं बढ़ने लगीं. इसलिए इस अभियान को त्यागना पड़ा.

इस घास के नीचे दूसरे पौधे दब जाते हैं, उन्हें धूप नहीं मिलती और इस प्रकार वे मर जाते हैं. गैंडे और दूसरे जानवर इसे खाते हैं, उन्हें यह बहुत अधिक पसंद है. साथ ही यह भी नहीं पता है कि लंबे समय तक इन्हें खाने का उनके ऊपर कैसा प्रभाव पड़ेगा.

इस क्षेत्र के गाइड दुर्गा प्रसाद तिवारी का कहना है कि अगर गैंडों को बचाना हो, तो सबसे पहले इस घास के विस्तार को रोकने के लिए कारगर कदम उठाने होंगे.

रिपोर्ट: एजेंसियां/उ भट्टाचार्य

संपादन: ओ सिंह

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