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ब्लॉग

नेपाल भारत संबंधों में संयम जरूरी

नेपाल में नए संविधान के एलान के बाद तराई इलाकों में मधेसी, दलित और जनजातीय तबके के लोगों के आंदोलन के बाद भारत और नेपाल के आपसी संबंध कटुतापूर्ण हो गए हैं. इसके लिए नेपाल के साथ भारत भी काफी हद तक जिम्मेदार है.

दरअसल, नेपाल पर शुरू से ही भारत का दबदबा रहा है. इसलिए कई मामलों में भारतीय सरकारें उस पर दबाव बनाने का भी प्रयास करती हैं. ताजा मामले में भी तराई इलाकों में आंदोलन शुरू होने पर जब जरूरी सामानों से लदे भारतीय ट्रक नेपाल सीमा पर ही रुक गए तो वहां आम राय यह बनी कि भारत ने संविधान में संशोधन के लिए दबाव बनाने की खातिर ही जरूरी सामानों की सप्लाई रोक दी है. उसके बाद पूरे देश में भारत-विरोधी प्रदर्शन तो हुए ही, भारतीय चैनलों का प्रसारण भी रोक दिया गया. हालांकि भारत ने इस बात से इंकार किया है कि जरूरी सामानों की सप्लाई रोकने में सरकार का कोई हाथ था. लेकिन दो और दो जोड़ कर चार बनाने वाले राजनीतिक दलों ने इस मामले को देश के लोगों के समक्ष कुछ इस तरह पेश किया कि भारत-विरोधी भावनाएं नए सिरे से भड़क उठीं.

नेपाल की राजनीति में शुरू से ही पर्वतीय इलाके में रहने वाले ऊंचे तबके के लोगों का दबदबा रहा है. भारत में बिहार की सीमा से लगे तराई इलाकों में मधेसी, दलित और जनजातीय लोगों की बहुलता है. लेकिन नेपाल की मुख्यधारा की राजनीति में इनको कभी कोई खास जगह नहीं मिली है. ताजा संविधान में भी इस तबके की उपेक्षा की गई है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने पिछले नेपाल दौरे में नेपाली संसद को संबोधित करते हुए उम्मीद जताई थी कि नए संविधान में हर तबके की उम्मीदों और आकांक्षाओं का ध्यान रखा जाएगा. लेकिन हकीकत में ऐसा नहीं हुआ. दरअसल, तराई में रहने वाले मधेसियों का भारत से ऐतिहासिक रिश्ता रहा है और दोनों के बीच रोटी-बेटी का संबंध है. इसी वजह से पहाड़ी तबके के नेता मधेसियों को भारत समर्थक मानते हैं. इसलिए भारत ने जब तराई इलाकों में जारी हिंसा पर चिंता जताई तो नेपाल के नेताओं को लगा कि यह उनके आंतरिक मामलों में बेजा हस्तक्षेप है. इसके बाद ही भारत-विरोधी प्रदर्शनों का दौर शुरू हो गया.

अब भारत चाहे लाख सफाई दे, सच तो यह है कि नेपाली संविधान बनाने की प्रक्रिया में अपनी अनदेखी से वह नाराज है. मोदी के बार-बार अनुरोध के बावजूद संविधान बनाने में पहाड़ी नेताओं की ही चली है. इससे दिल्ली को लगता है कि ईंधन और दूसरी सहायता के लिए पूरी तरह भारत पर निर्भर यह छोटा-सा पहाड़ी देश उसकी इच्छा का कोई मान नहीं रख रहा है. इसके अलावा केंद्र में सत्तारुढ़ बीजेपी की दूसरी सबसे बड़ी चिंता यह थी कि बिहार से सटे नेपाली इलाकों में होने वाली हिंसा की आंच सीमा पार भी पहुंच सकती है. सीमा के दोनों ओर रहने वाले मधेसी लोगों में आपसी संबंध हैं. इसी महीने बिहार विधानसभा चुनाव होने हैं और उसमें बीजेपी और नरेंद्र मोदी की साख दांव पर लगी है. बीजेपी को डर है कि हिंसा की आंच इस पार पहुंची तो विरोधी दलों को इसका फायदा मिल सकता है. नेपाल ने संविधान तैयार करने की प्रक्रिया में भारत की सलाह की पूरी तरह उपेक्षा कर जता दिया है कि वह अपने मामलों में किसी बाहरी देश, भले ही वह भारत ही क्यों न हो, का हस्तक्षेप सहन नहीं करेगा. भारत को लगता है यही बात चुभ गई है. इसलिए जरूरी सामानों से लदे ट्रक नेपाल नहीं पहुंचने की ढकी-छिपी चेतावनी देकर उसने नेपाल पर दबाव बनाने का प्रयास किया.

भारत-नेपाल के आपसी संबंधों की मौजूदा स्थिति की तुलना वर्ष 1989 की परिस्थिति से की जा सकती है. उस समय नेपाल के राजा बीरेंद्र ने चीन से एंटी-एयरक्राफ्ट गन आयात करने का फैसला किया था. उन्होंने देश में चल रहे लोकतांत्रिक आंदोलन के बावजूद पंचायत व्यवस्था में सुधार करने से इंकार दिया था. संयोग से उसी समय भारत-नेपाल व्यापार समझौते की मियाद खत्म हो गई थी. तत्कालीन राजीव गांधी सरकार ने नेपाल पर दबाव बनाने के लिए दोनों देशों के बीच व्यापार के लिए खुले विशेष प्रवेश केंद्रों को बंद करने का फैसला किया. इससे नेपाल में जरूरी चीजों की भारी किल्लत हो गई थी.

अब ताजा मामले में मोदी सरकार भी दादागिरी ही दिखा रही है. नेपाल भारत पर पहले भी दादागिरी के आरोप लगाता रहा है. बीते साल मोदी के दो-दो बार दौरे और इस साल आए भूकंप के बाद भारतीय सहायता की वजह से दोनों देशों के आपसी संबंध काफी बेहतर हो गए थे. लेकिन अब ताजा मामले ने इसमें कड़वाहट घोल दी है. हालात को संभालने और पड़ोसियों से बेहतर संबंध बनाने की खातिर भारत को दादागिरी का रवैया त्याग कर संयम और कूटनीति का परिचय देना होगा. ऐसा नहीं हुआ तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी उसकी साख पर बट्टा लगने का अंदेशा है. यह तो जगजाहिर है कि दो लोगों या देशों के झगड़े में गलती चाहे किसी की भी हो, दोष हमेशा बड़े के सिर पर ही थोपा जाता है. इस बात को याद रखना जरूरी है. उम्मीद की जानी चाहिए अतीत की बातों और अपने अहं को भुला कर भारत एक बार फिर नेपाल की ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाएगा.

ब्लॉग: प्रभाकर

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