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दुनिया

नेताओं के इशारों पर न नाचें अफसर

भारत के सुप्रीम कोर्ट ने एक फैसले में कहा है कि अधिकारियों को नेताओं के जुबानी आदेशों पर काम नहीं करना चाहिए. एक जनहित याचिका पर सुनवाई में सर्वोच्च अदालत ने ट्रांसफर संबंधी सुधार और पारदर्शिता बढ़ाने के सुझाव भी दिए.

अदालत ने कहा कि अधिकारियों के जब तब होने वाले ट्रांसफर बंद होने चाहिए. केंद्र और राज्य सरकारों को सुझाव देते हुए जस्टिस केएस राधाकृष्णन की अगुवाई वाली बेंच ने कहा कि पोस्टिंग की एक तय अवधि होनी चाहिए. बेंच ने कहा कि संसद को पोस्टिंग, ट्रांसफर और अनुशासन के तहत अफसरों पर कार्रवाई के लिए एक कानून बनाना चाहिए. अदालत ने केंद्र और राज्य स्तर पर सिविल सर्विस बोर्ड बनाने की भी बात कही.

हालांकि अदालत के फैसले पर सरकारें कब अमल करेंगी यह कहना मुश्किल है. सितंबर 2006 में प्रकाश सिंह बनाम भारत सरकार केस का फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकारों को पुलिस सुधार करने का निर्देश दिया था. इसमें पुलिस को स्वतंत्र संस्था बनाए जाने का भी निर्देश था. इस पर आज तक कुछ नहीं हुआ क्योंकि सुधार के लिए कानून बनाना विधायिका का विशेषाधिकार है.

भारत में समय समय पर नेताओं और अफसरों के बीच टकराव के मामले सामने आते रहे. 1990 के दशक में चुनाव सुधारों के मामले में मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन शेषन और केंद्र सरकार का टकराव किसी से छुपा नहीं है. हाल के समय में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा की जमीन के मामले में आईएएस अधिकारी अशोक खेमका और हरियाणा सरकार में ठन गई. हरियाणा सरकार पर खेमका को परेशान करने के आरोप लगे. उत्तर प्रदेश में राज्य के ही कैडर की आईएएस अधिकारी दुर्गा शक्ति नागपाल को निलंबित कर दिया. नागपाल ने अतिक्रमण के खिलाफ कदम उठा रही थीं.

इन मामलों को संज्ञान में लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने ये फैसला सुनाया. जनहित याचिका पूर्व कैबिनेट सचिव टीएसआर सुब्रमण्यम समेत 83 सेवानिवृत्त अधिकारियों ने दायर की थी. याचिका के जरिए अफसरशाही को राजनीतिक दखल से निकालने के लिए निर्देश मांगे गए. अमेरिका में भारत के पूर्व राजदूत आबिद हुसैन, पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एन गोपालास्वामी, पूर्व चुनाव आयुक्त टीएस कृष्णा मूर्ति, पूर्व आईपीएस अधिकारी वेद प्रकाश मारवाह, सीबीआई के पूर्व निदेशक जोगिंदर सिंह और डीआर कार्तिकेयन याचिकाकर्ताओं में शामिल हैं.

भारत में अक्सर नेताओं पर राजनीतिक प्रभाव का इस्तेमाल कर अफसरों पर दबाव बनाने के आरोप लगते हैं. कई बार तो बात न मानने वाले अधिकारियों का दुर्गम इलाकों में तबादला कर दिया जाता है. इसे प्रक्रिया को आम तौर पर 'पनिशमेंट पोस्टिंग' कहा जाता है यानी दंड के रूप किया गया तबादला. भारतीय राजनीति में कई सालों से सरकारों पर जांच एजेंसी सीबीआई और पुलिस का अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करने के आरोप भी लगते आए हैं.

ओएसजे/एनआर(पीटीआई)

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