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दुनिया

नेताओं की लाठी बना गन्ना

उत्तर प्रदेश में गन्ने पर गजब की सियासत हो रही है. सियासी दल कभी किसानों का पक्ष लेते हैं तो कभी चीनी मिलों का. नेताओं के इस खेल में जनता का पैसा बर्बाद होता है.

गन्ने की फसल और कुछ किसानों की मौत, ये हर साल सर्दियों की आम बात है. गन्ने के समर्थन मूल्य पर जारी हंगामा करीब 35 हजार करोड़ रुपये के चीनी उद्योग पर खतरे सा मंडरा रहा है. किसानों का 23 हजार करोड़ रुपया चीनी मिलों पर बकाया है. यूपी के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने 30 दिसम्बर तक किसानों के इस बकाया का भुगतान कराने का आदेश दिया है. मामला इलाहाबाद हाई कोर्ट में भी लंबित है.

लाचार किसान

गन्ने की लहलहाती फसलों के लिए मशहूर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में इस बार मुजफ्फरनगर दंगे ने भी इस फसल को कम नुकसान नहीं पहुंचाया. लखीमपुर में एक किसान की आत्महत्या से हालात और गंभीर हो गए. यूपी की 124 चीनी मिलों ने अपनी कुछ मांगें मनवाने के बाद ही दिसम्बर से पेराई शुरू की जबकि इसे नवम्बर में शुरू होना था. करीब 50 लाख गन्ना किसान बेबस आंखों से अपने खेतों में खड़े गन्ने को तकते रहे. कई जगह फसल जला दी गई.

किसान गन्ने के लिए 350 रुपये प्रति क्विंटल के समर्थन मूल्य की मांग करते रहे पर सरकार ने इसे 280 रुपये प्रति क्विंटल ही घोषित किया. चीनी मिलों को 350 रुपये मंजूर नहीं था. सरकार और मिलों के बीच हुई बातचीत सफल होते होते करीब दो दर्जन चीनी मिलों के खिलाफ एफआईआर दर्ज हुई. करीब आधा दर्जन मिलों का चालान कटा. हर साल गन्ने के अलावा धान और गेहूं का समर्थन मूल्य भी सरकार तय करती है पर सियासत और सड़कों पर प्रदर्शन गन्ने के मूल्य पर ही होता है.

गन्ना या सियासी लाठी

गन्ने पर होने वाली सियासत पर लखनऊ विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर रहे यशवीर त्यागी कहते हैं, "रंगराजन समिति की सिफारिशें लागू न करना भी इस संकट की वजह है." समिति कहती है कि चीनी का जो बाजार मूल्य है उसके आधार पर 70 फीसदी और दूसरे उत्पाद के आधार पर 75 फीसदी गन्ना मूल्य निर्धारित होना चाहिए. जैसे चीनी का बाजार मूल्य यदि 30 रुपये किलो है तो वर्तमान में गन्ना मूल्य 225 रुपये प्रति क्विंटल होना चाहिए. लेकिन गन्ना किसान समितियों को रंगराजन समिति की सिफारिशें मंजूर नहीं, तो उन्होंने मुख्यमंत्री से वादा करा लिया कि यूपी में रंगराजन समिति की सिफारिशें लागू नहीं होंगी.

शाहजहांपुर की गन्ना शोध परिषद ने पिछले साल पेराई सत्र में गन्ना उत्पादन लागत 228 रुपये प्रति क्विंटल तय की. लेकिन सरकार ने 280 रुपये समर्थन मूल्य घोषित किया. चालू सत्र के लिए भी परिषद ने 252 रुपये प्रति क्विंटल उत्पादन लागत तय की, जिसके हिसाब से 325 रुपये प्रति क्विंटल समर्थन मूल्य होना चाहिए. सरकार ने दाम 280 रुपये ही रखा.

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सरकारी धन का इस्तेमाल

बीएसपी, कांग्रेस और बीजेपी का आरोप है कि सरकार ने चीनी मिलों से साठगांठ कर ली. बीजेपी अध्यक्ष राजनाथ सिंह का कहना है कि गन्ना किसानों को केंद्र और राज्य सरकार दोनों ने छला है. इसके जवाब में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कहा केंद्र सरकार ही मिलों से साठगांठ कर सकती है. उन्होंने विधानसभा में कहा कि गन्ना किसानों की दुर्दशा के लिए केंद्र सरकार जिम्मेदार है. उन्होंने दिल्ली में कृषि मंत्री शरद पवार के साथ हुई बैठक में इंटरेस्ट सबवेंशन स्कीम लागू करने की मांग की. उन्होंने मांग की कि इसके तहत कर्ज का आकलन किया जाए. साथ ही 2012-13 और 2013-14 की एक्साइज ड्यूटी में सेस व सरचार्ज को भी शामिल किया जाए. इससे यूपी को 2,000 करोड़ रुपये का ब्याज रहित कर्ज प्राप्त होगा जिससे मिलें किसानों का बकाया अदा करेंगी. लेकिन इसमें संदेह है. हालांकि केंद्र ने चार राज्यों के गन्ना किसानों के लिए 72 हजार करोड़ के पैकेज का एलान किया है.

लाचारी का फायदा

पश्चिमी यूपी में गन्ना किसानों की सियासत से पनपी पार्टी राष्ट्रीय लोक दल के महासचिव अनिल दुबे कहते हैं कि मिलों का जबरदस्त लाभ है, तभी तो बजाज और बिड़ला जैसे औद्योगिक समूहों की यूपी में चीनी मिलें हैं. उनके मुताबिक पेराई सत्र देर से शुरू करने के पीछे इन उद्योगपतियों की मंशा होती है कि किसान खेत खाली करने की जल्दी में औने पौने दामों पर गन्ना बेच दें क्योंकि गन्ने के बाद गेंहू बोने का समय आ जाता है. मुजफ्फरनगर के गन्ना किसान राकेश चौहान के मुताबिक इस सियासत और औद्योगिक चालबाजी का अंत नहीं.

रिपोर्ट: एस वहीद, लखनऊ

संपादन: ओंकार सिंह जनौटी

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