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विज्ञान

नींद में होती है दिमाग की धुलाई

ब्रेन वॉश वैसे तो एक मुहावरा है लेकिन हमारे मस्तिष्क को सच में साफ सफाई की जरूरत होती है. और वैज्ञानिकों का कहना है कि इससे दिमाग को बहुत आराम भी मिलता है.

हमारा दिमाग असल में एक बहुत जटिल कारखाने की तरह काम करता है. अलग अलग रिएक्टरों में हर पल कोई न कोई रासायनिक प्रक्रिया चल रही होती है. इस दौरान काफी कचरा भी पैदा होता है. इसलिए शरीर को एक लसिका तंत्र की जरूरत होती है, जो बीमारी पैदा करने वाले तत्वों को शरीर से बाहर करे. लेकिन यह तंत्र दिमाग के लिए काम नहीं करता, यह सिर्फ बाकी शरीर के लिए जिम्मेदार है. जबकि दिमाग को इसकी सबसे ज्यादा जरूरत है. हर मिनट दिमाग ऐसे प्रोटीन पैदा करता है, जो मस्तिष्क की कोशिकाओं को नुकसान पहुंचा सकते हैं.

दिमाग की सफाई

हमारा दिमाग अपने कचरे के साथ क्या करता है इस बारे में अमेरिका के रॉचेस्टर मेडिकल सेंटर यूनिवर्सिटी के रिसर्चरों ने पता लगाया है. लसिका तंत्र के जरिए दिमाग का कचरा फेंकने की बजाए, दिमाग के पास उसका खुदका क्लीनिंग सिस्टम होता है. इसे ग्लिम्फैटिक सिस्टम नाम दिया गया है. इसमें मुख्य भूमिका दिमाग की ग्लियल सेल की होती है. यही सेल दिमाग के द्रव्य और कचरे को बाहर निकालती हैं.

यह काम हालांकि तेजी से नहीं होता. वैज्ञानिकों का कहना है कि दिमाग की सफाई का काम कम से कम आठ घंटे लेता है, हर दिन. यह वही समय होता है जब हम सो रहे होते हैं. क्योंकि जब हम सो जाते हैं तो दिमाग की कोशिकाओं के बीच दूरी बढ़ जाती है और दिमाग में द्रव्य आसानी से सफाई के लिए इनके बीच से जा सकता है. अगर नींद कम होती है तो दिमाग की सफाई पूरी नहीं होती. वैज्ञानिक चेतावनी देते हैं कि कम नींद हमारे मस्तिष्क को लंबे समय के लिए नुकसान पहुंचा सकती है. इसका नतीजा अल्जाइमर और पार्किंसंस जैसी बीमारियां हो सकती हैं.

इसलिए वैज्ञानिक सलाह देते हैं कि सही समय पर सोएं और कम से कम आठ घंटे की नींद लें. दिमाग की सफाई के बाद कचरा इधर उधर कहीं नहीं जाता. गंदगी शरीर में ही फिल्टर हो कर फिर से इस्तेमाल हो जाती है.

रिपोर्टः मु चुई/ आभा मोंढे

संपादनः ईशा भाटिया

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