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ब्लॉग

निर्वाचन आयोग पर सवाल

भारतीय चुनाव को देखकर पूरी दुनिया चकित होती है. इतने विशाल देश में इतने विराट पैमाने पर होने वाले ये चुनाव विश्व के सबसे बड़े चुनाव हैं. लेकिन चुनावी हिंसा और बूथ पर कब्जों की खबरों के कारण आयोग की आलोचना हो रही है.

इस बार के लोकसभा चुनाव के लिए मतदान की प्रक्रिया पांच हफ्तों और नौ चरणों में पूरी हुई और इसके दौरान कुल मतदाताओं में से 66.38 प्रतिशत यानी 54 करोड़ से भी अधिक ने वोट डाले. यह अपने आप में एक रिकॉर्ड है क्योंकि इसके पहले केवल 1984 में 63.56 प्रतिशत मतदान हुआ था. भारतीय चुनाव कमोबेश स्वतंत्र एवं निष्पक्ष माने जाते हैं यानि चुनाव की प्रक्रिया के दौरान इतने व्यापक पैमाने पर गड़बड़ी और धांधली नहीं होती कि पूरे चुनाव के परिणाम उसके कारण प्रभावित हो जाएं. लेकिन गड़बड़ियां और धांधली तो होती ही हैं, अनेक स्थानों पर हिंसा भी होती है और कुछ उम्मीदवार जोर-जबर्दस्ती या प्रलोभन के बल पर चुनाव जीतने की कोशिश भी करते हैं. इस सबके कारण निर्वाचन आयोग की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है.

1990 के दशक में जब टीएन सेषन भारत के मुख्य निर्वाचन आयुक्त नियुक्त हुए, तब उन्होंने ही सबसे पहले आयोग के अधिकारों का न केवल इस्तेमाल करना शुरू किया, बल्कि कानून और नियमों के कल्पनाशील प्रयोग द्वारा उसके अधिकार क्षेत्र के दायरे का भी विस्तार किया. उन्होंने ही चुनाव की घोषणा होते ही आदर्श आचार संहिता का पालन अनिवार्य बना दिया और चुनाव खर्च पर निगरानी रखने और हिंसा, मतदान केन्द्रों पर जबर्दस्ती कब्जा करने की घटनाओं आदि को रोकने के लिए सख्त कदम उठाए. चुनाव की घोषणा होते ही चुनाव संबंधी कार्य के लिए पूरे देश की प्रशासनिक मशीनरी आयोग के निर्देशों का पालन करने के लिए बाध्य होती है. सेषन ने पहली बार अधिकारियों के तबादले करने के आयोग के अधिकार का प्रयोग किया. इसी प्रक्रिया को जे एम लिंगदोह ने और मजबूती के साथ आगे बढ़ाया. इस कारण देशवासियों के मन में और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी आयोग की प्रतिष्ठा और गरिमा बढ़ी.

Wahlen in Indien 17.04.2014

मतदान बढ़ा और मुश्किलें भी

लेकिन इस बार के लोकसभा चुनाव के दौरान निर्वाचन आयोग ने जिस तरह के ढुलमुलपन का परिचय दिया और जैसी शिथिलता दिखाई, उसके कारण उस पर अनेक तरह के आरोप लग रहे हैं. दिलचस्प बात यह है कि तीन निर्वाचन आयुक्तों में से एक एच एस ब्रहमा ने तो यह बयान तक दे दिया कि आयोग का नेतृत्व कमजोर है. स्पष्ट रूप से उनका इशारा मुख्य निर्वाचन आयुक्त वी एस सम्पत की ओर था. उनका यह बयान वाराणसी में जिलाधिकारी द्वारा प्रधानमंत्री पद के लिए भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी को, जो वहां से चुनाव लड़ रहे हैं, को मुसलिम बहुल इलाके बेनियाबाग में रैली करने की इजाजत न देने के संदर्भ में आया था. सम्पत ने इस कदम को सही बताया था. लेकिन बाद में निर्वाचन आयोग ने वाराणसी के लिए एक विशेष पर्यवेक्षक की नियुक्ति करके जिलाधिकारी को उसके अधीन कर दिया. इससे साफ हो गया कि जिलाधिकारी पर आयोग को पूरा भरोसा नहीं है और वह अपने पहले के रुख से पलट गया है.

अखबारों और टीवी चैनलों ने लगातार पश्चिम बंगाल में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ताओं द्वारा चुनावी हिंसा करने, मतदान केन्द्रों पर कब्जा करने और लोगों को वोट डालने से रोककर फर्जी वोट डालने के बारे में खबरें दीं. लेकिन निर्वाचन आयोग ने न वहां किसी विशेष पर्यवेक्षक की नियुक्ति करने की जरूरत महसूस की और न ही कोई और कदम उठाया जबकि हिंसा और धांधलियों के बारे में कांग्रेस, बीजेपी और वाम दलों, सभी ने उसके पास शिकायतें दर्ज की. इसी तरह उसने राहुल गांधी और नरेंद्र मोदी के मामले में भी अजीब रवैया अख्तियार किया. राहुल गांधी मतदान के दौरान एक बूथ में चले गए और वहां रखी इलेक्ट्रोनिक वोटिंग मशीन का निरीक्षण करने लगे. मतदान के दौरान कोई भी उम्मीदवार मतदान बूथ में नहीं जा सकता. इस बारे में अखबार में चित्र प्रकाशित हुए. निर्वाचन आयुक्त ब्रह्मा ने सार्वजनिक रूप से कहा कि इसमें संदेह की गुंजाइश ही नहीं है कि यह कानून का उल्लंघन है. लेकिन आयोग ने यह दलील मान ली कि जिस समय राहुल गांधी बूथ में गए उस समय मतदान रुका हुआ था. इसी तरह नरेंद्र मोदी द्वारा मतदान केंद्र के अंदर चुनाव चिह्न दिखाने को भी आयोग ने गंभीरता से नहीं लिया जबकि इसी आरोप में वाराणसी में कांग्रेस के प्रत्याशी अजय राय के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर ली गई है.

निर्वाचन आयोग की गरिमा इस बात से भी कम हुई है कि आयुक्तों के आपसी मतभेद खुलकर सामने आ गए और आयोग की एकता पर सवालिया निशान लग गए. हालांकि वी एस सम्पत मुख्य निर्वाचन आयुक्त हैं, लेकिन अन्य दो निर्वाचन आयुक्तों के अधिकार उनके समान ही हैं. इसलिए आयोग के सभी फैसले सर्वसम्मति से लिए जाते हैं. पर इस बार महत्वपूर्ण सवालों पर आयोग बंटा हुआ नजर आया. इस सबके कारण एक बार फिर यह बहस छिड़ रही है कि क्या निर्वाचन आयोग को और अधिक अधिकार दिये जाने की जरूरत है और क्या जिले के स्तर तक उसकी अपनी प्रशासनिक मशीनरी नहीं होनी चाहिए जो हमेशा उसी के अधीन काम करे. अभी तो उसे सरकारी मशीनरी से ही काम चलाना पड़ता है और यह सब जानते हैं कि उस पर कितना राजनीतिक दबाव रहता है.

ब्लॉग: कुलदीप कुमार

संपादन: महेश झा

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