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विज्ञान

नाम बुरे हैं फिर भी नहीं बदलते

बीमारी या वायरसों के नाम कई बार अजीब सी उलझन पैदा कर देते हैं हालांकि इतिहास गवाह है कि नाम चाहे सोच समझ कर रखा गया हो या यूं ही एक बार पड़ जाए तो इसे बदलना आसान नहीं होता.

कुछ बीमारियों के नाम बहुत बुरे हैं. उनके प्रचलित नाम नाजी डॉक्टरों के गुणगान या कुछ जातीय समुदायों की बदनामी हैं फिर भी पुरानी आदत के कारण ये बदलते नहीं. बीमारी, वायरस, यहां तक कि व्यक्तित्व में अजीब तरह के गुणों के नाम जगह, मशहूर एथलीट, खोज करने वाले डॉक्टर और साहित्यिक दिग्गजों के नाम पर रखे जाते रहे हैं.

2009 में दुनिया भर में हड़कंप मचा देने वाले एच1एन1 एंफ्लुएंजा को पहले मेक्सिकन स्वाइन फ्लू कहा गया, ओबेसिटी हाइपोवेंटिलेशन सिंड्रोम का दूसरा नाम पिकविकियन सिंड्रोम भी है जो चार्ल्स डिकेंस के एक उपन्यास में मोटे चरित्र के नाम से लिया गया है. सबसे नया नाम जो सुर्खियों में रहा वह है मिडिल ईस्ट रिस्पायरेटरी सिंड्रोम कोरोनावायरस या एमईआएस- सीओवी. 2012 में इससे प्रभावित 130 में से 58 लोगों की जान चली गई. यह बीमारी सऊदी अरब, ट्यूनीशिया, जॉर्डन, कतर और संयुक्त अरब अमीरात में मिली. इसका नाम में पहले सऊदी अरब जोड़ा गया था क्योंकि मिस्र के वैज्ञानिक ने पहली बार इसकी पहचान एक सऊदी नागरिक में की थी.

नीदरलैंड्स के इरासमुस मेडिकल सेंटर में इस बीमारी का विश्लेषण किया गया. मेडिकल सेंटर के प्रमुख वैज्ञानिक रॉन फाउशियर का कहना है, "सऊदी अधिकारी खुश नहीं थे. तब हमने इसका नाम बदल कर केवल वायर को एचसीओवी- ईएमसी कर दिया यानी ह्यूमन करोनावायरस इरासमुस एमसी ताकि मामला संवेदनशील न बने." फाउशियर के मुताबिक सऊदी नेता नए नाम से भी खुश नहीं हुए इसलिए उन्होंने दूसरे लोगों के साथ चर्चा करने के बाद सर्वसम्मति से इसका नाम एमईआरएस-सीओवी कर दिया. विश्व स्वास्थ्य संगठन ने मई में इस नाम को मंजूरी दी लेकिन साथ ही यह भी कहा, "डब्ल्यूएचओ आमतौर पर किसी वायरस का नाम किसी इलाके या जगह के नाम से नहीं जुड़ा होना पसंद करता है."

नामों के लिए कोई केंद्रीय नियामक संस्था नहीं होने के कारण बीमारियां कई या विवादित नाम के चक्कर में फंस जाती हैं. अमेरिकन नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसीन से जुड़ी स्टेफनी मॉरिसन का कहना है, "जब भी कोई असहमति हो, अव्यवस्था हो जाती है." हालांकि अनुचित नाम जल्दी ही गायब हो जाते हैं. एचाआईवी एड्स को कभी 4एच डिजीज कहा जाता था. इसमें चार एच का मतलब था, हैतियन, होमोसेक्सुअल, हीमोफिलियक और हेरोइन. इसी तरह 1982 में इसे एक और नाम मिला जीआरडी यानी गे रिलेटेड इम्यूनोडिफिसिएंसी.

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अब बीमारियों के नाम उनके खोजकर्ताओं के नाम पर नहीं रखे जाते लेकिन पहले चले आ रहे कुछ नाम अब भी जारी हैं. जैसे अल्जाइमर का नाम जर्मन मनोचिकित्सक के नाम पर है जबकि टॉरेट सिंड्रोम का नाम फ्रेंच न्यूरॉलॉजिस्ट के नाम पर.

किसी जगह के नाम पर बीमारी का नाम रखने से यादगार वर्णन तो हो जाता है लेकिन अक्सर इससे अपमान की गंध आती है. 2009 में दवा प्रतिरोधी सुपरबग का नाम नई दिल्ली के नाम पर रखने पर भारत में हंगामा हुआ. मेडिकल एक्सपर्ट और सांसदों का कहना था कि इससे ऐसा लगता है जैसे दिल्ली एक बहुत गंदी जगह है. एन्जाइम का नाम न्यू डेल्ही मेटालो लैक्टामेज-1 या एनडीएम1 रखा गया था और इससे जुड़े जीन का नाम ब्लाएनडीएम-1. इस नाम के पीछे वजह यह थी कि स्वीडन में बसा एक भारतीय 2007 में जब भारत आया तो बीमार हो गया. उसके बाद से वह कीटाणु पूरी दुनिया में पाया जाने लगा. मुंबई के मशहूर डॉक्टर अजय सिंह ने मेडिकल नामों के लिए एक अंतरराष्ट्रीय आयोग बनाने का प्रस्ताव रखा लेकिन वह अभी बन नहीं पाया. वो कहते हैं, "एनडीएम-1 नाम बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होता जा रहा है. आदतें नहीं मिटती, यहां तक कि वैज्ञानिकों की भी."

नाजी नाम बचे रहे

वैज्ञानिकों का समुदाय इस बात पर सहमत है कि नाम बदला जाना चाहिए. एक दुर्लभ न्यूरोलॉजिकल कमी है हालेरफोर्डेन स्पात्स, ये नाम उस नाजी डॉक्टर के नाम पर दिया गया जिसने इसे पहली बार खोजा. इसे बदलने की कोशिश जा रही है लेकिन यह प्रक्रिया कई दशक का समय ले सकती है. पैटी वुड की बेटी अब 27 साल की हो चुकी है जब वह 3 साल की थी तब धीरे धीरे उसका बोलना और चलना बंद हो गया. जब वुड को पता चला कि जूलियस हालेरफोर्डेन और उनके बॉस ह्यूगो स्पात्स ने दिमाग नष्ट हो जाने वाले बच्चों पर रिसर्च की है तो उन्होंने अपने संगठन का नाम बदल दिया और डॉक्टरों से भी अपनी आदत बदलने का कहा. यह 10 साल पुरानी बात है. वुड दक्षिणी अमेरिका और भारत में रहने वाले परिवारों की ओर इशारा करते हुए वुड कहती हैं, "अमेरिका से बाहर अब भी कुछ कुछ जॉक्टर हैं जो इस बीमारी को हालेरफोर्डेन स्पात्स कहते है." पिछले साल हालेरफोर्डेन स्पात्स का इस्तेमाल करने वाली एक रिसर्च ने बताया कि 1990 के बाद नाम का इस्तेमाल घट कर आधा रह गया.

शेक्सपीयर भी हैं!

कुछ और नाम हैं जो उतने विवादित स्रोतों से नहीं जुड़े. उदाहरण के लिए आयरिश डॉक्टरों ने हाल ही में एक बीमारी का नाम 'हेनरी पंचम साइन' रख दिया. इसका ब्योरा शेक्सपीयर के हेनरी पंचम से मिलता है. यूनिवर्सिटी कॉलेज कॉर्क में मेडिसिन के प्रोफेसर फर्गुसन शानहान कहते हैं कि यह नाम चल गया क्योंकि ज्यादातर लोग थोड़ा बहुत शेक्सपीयर के बारे में जानते ही हैं.

एनआर/ओएसजे (एएफपी)

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