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दुनिया

नाबालिग आदिवासी छात्राओं से दुष्कर्म का चक्र

देश में जहां सभी बच्चों को शिक्षा से जोड़ने की कोशिश हो रही है वहीं शिक्षा के मंदिरों से छात्रों के शोषण की खबरें भी आ रही हैं. खासतौर पर आदिवासी और दलित बच्चे शोषण का अधिक शिकार हो रहे हैं.

भारत के स्कूलों में बच्चों के साथ बुरे बर्ताव की घटनाएं पहले यदा कदा ही सामने आती थीं लेकिन पिछले कुछ सालों में इसमें हुई वृद्धि ने समाज को चिंता में डाल दिया है. स्कूलों और छात्रावासों में बच्चों के यौन शोषण की बढ़ती घटनाओं पर सभी स्तब्ध हैं. ऐसा ही एक मामला महाराष्ट्र के बुलढाणा स्थित एक आदिवासी आश्रम स्कूल से सामने आया है जहाँ कई बच्चियों के यौन शोषण की खबरें हैं. लगातार सामने आ रही ऐसी घटनाओं से स्कूल प्रशासन और शिक्षकों पर लोगों का भरोसा कम हुआ है.

स्कूलों में असुरक्षित छात्राएं

बुलढाणा के खामगांव स्थित निनाधि आश्रम स्कूल में नाबालिग छात्राओं से बलात्कार के मामले में शिक्षकों पर आरोप लगे हैं. यह मामला तब सामने आया जब एक 13 साल की छात्रा के गर्भवती होने का खुलासा हुआ. इसके बाद मचे हड़कंप के बीच पुलिस की जांच में कई और लड़कियों ने यौन शोषण की शिकायत की. दुष्कर्म की शिकार छात्राओं की उम्र 12 से 14 साल के बीच है. पुलिस ने 15 लोगों को 12 नाबालिग आदिवासी छात्राओं से बलात्कार के आरोप में गिरफ्तार किया है. ये सभी आरोपी आश्रम स्कूल से ही जुड़े हैं. इनमें से सात आरोपी इसी स्कूल के शिक्षक हैं जबकि अन्य चार आरोपी स्कूल के कर्मचारी हैं. ऐसे कई और मामले सामने आये हैं जहां शिक्षक ही आरोपी हैं.

भेदभाव रहित शिक्षा पर जोर

आदिवासी आवासीय स्कूलों की वर्तमान स्थिति की जांच करने के लिए डॉक्टर सुभाष सालुंखे की अध्यक्षता में बनी समिति ने बिना किसी मानसिक या शारीरिक कष्ट के शिक्षा मुहैया कराये जाने पर जोर दिया है. समिति ने बिना किसी लैंगिक भेदभाव के छात्राओं के स्वास्थ्य का ध्यान रखे जाने की अनुशंसा की है. इन स्कूलों में यूरिन प्रेग्नेंसी टेस्ट किए जाने पर सवाल उठाते हुए इस रिपोर्ट में कहा गया है कि आदिवासी छात्राओं का ना केवल माहवारी चक्र का रिकॉर्ड रखा जा रहा है बल्कि माहवारी की तारीख निकल जाने पर उनका यूरिन प्रेग्नेंसी टेस्ट भी किया जा रहा है. इन स्कूलों को बेहतर शिक्षा केंद्र बनाने के लिए जनजातीय विकास विभाग सालुंखे समिति रिपोर्ट का अध्ययन कर रहा है.

बाल सुरक्षा नीति

बुलढाणा के आदिवासी आश्रम में हुए इस घटना के बाद महाराष्ट्र के अन्य आश्रम स्कूलों में भी बच्चों के शोषण होने की आशंका जतायी जा रही है. सरकार को डर है कि ऐसी घटनाओं के कारण बीच में ही स्कूल छोड़ने वालों की संख्या बढ़ सकती है. इसे देखते हुए सरकार आदिवासी आश्रम स्कूलों में पढने वाले बच्चों के लिए बाल सुरक्षा नीति पर काम कर रही है. बुलढाणा की घटना को सबक के रूप में लेते हुए राज्य के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने महिला बाल कल्याण और सामाजिक न्याय विभाग को राज्य के सभी आश्रमशालाओं की जांच करने का आदेश दिया है. उनका कहना है कि गड़बड़ी पाए जाने पर स्कूलों की मान्यता रद्द कर दी जाएगी.

आदिवासी समाज में आक्रोश

आदिवासी और दलित बच्चों के शोषण को लेकर आदिवासी समाज में रोष व्याप्त है. महाराष्ट्र अकेला राज्य नहीं है जहाँ में आदिवासी बच्चों को स्कूल में शोषण का शिकार होना पड़ता है. जागृत आदिवासी दलित संगठन का कहना है कि पूरे देश में बुलढाणा जैसी घटनाओं में हुई वृद्धि हुई है. यौन शोषण के मामले भले कम हों लेकिन बच्चों के साथ दुर्व्यवहार और उनसे काम लिए जाने की घटनाएं आम हैं. हाल के समय में कुछ संदिग्ध मौतों के मामले भी सामने आए हैं. एक अनुमान के मुताबिक पिछले 10 सालों में केवल महाराष्ट्र में ही एक हजार से अधिक आदिवासी स्कूली बच्चों की मौत हो चुकी है. ऐसी घटनाएं आदिवासी समाज को चिंता में डालने और बच्चों को स्कूल से दूर रखने के लिए काफी हैं.

कैसे हों उपाय

स्कूलों में बच्चों के यौन शोषण को रोकने के लिए कई स्तरों पर प्रभावी कदम उठाये जाने की आवश्यकता महसूस की जा रही है. जानकारों के अनुसार आदिवासी कन्या छात्रावासों में आदिवासी महिलाओं की नियुक्ति से लेकर वहां सीसीटीवी की व्यवस्था को अनिवार्य बनाये जाने की आवश्यकता है. शिक्षा शास्त्री प्रोफेसर अरुण कुमार कहते हैं कि नियुक्ति के पहले शिक्षकों के व्यवहार का मनोवैज्ञानिक परीक्षण किया जाना चाहिए. वहीं, बाल अधिकार कार्यकर्ता और अधिवक्ता आरती चंदा जागरूकता पर जोर देती हैं. उनका कहना है कि ‘अच्छे और बुरे स्पर्श' के अंतर के बारे में बच्चों को, खासतौर पर छात्राओं को, समझाया जाना चाहिए. ऐसा होने पर ही गलत व्यवहार करने वालों पर कड़ी कार्रवाई की जा सकेगी.

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