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दुनिया

नाटो सैनिकों की वापसी समय पर

नाटो 2014 में अफगानिस्तान से सैनिकों को वापस करने के इरादे पर कायम है लेकिन अफगान सैनिकों को ट्रेनिंग जारी रहेगी. नाटो के महासचिव आंदर्स फो रासमुसेन ने डॉयचे वेले के साथ एक बातचीत में इस पर विस्तार से चर्चा की.

डॉयचे वेले: आप 2014 की गर्मियों तक नाटो महासचिव के पद पर रहेंगे, दो महीने बाद अंतिम सैनिक अफगानिस्तान से वापस लौट जाएगा. क्या आपको विश्वास है कि तब तक आपका व्यक्तिगत मिशन और नाटो का मिशन पूरा हो जाएगा?

रासमुसेन: हां, मुझे उम्मीद है कि अफगानिस्तान की सेना योजना के मुताबिक 2014 के अंत तक पूरे देश में पूरी जिम्मेदारी लेने की हालत में होगी.

इस साल ही 50 नाटो सैनिक अफगान पुलिसकर्मियों या सैनिकों के हाथों मारे गए हैं. तथाकथित इनसाइडर हमलों में मरने वालों की तादाद लगातार बढ़ रही है. ऐसी हालत में क्या नाटो अपनी वापसी की योजना पर कायम रह सकती है?

स्वाभाविक रूप से ये इनसाइडर हमले गंभीर समस्या हैं, क्योंकि वे अंतरराष्ट्रीय टुकड़ियों और अफगान सुरक्षा बलों के बीच भरोसा खत्म करते हैं, लेकिन दुश्मन की यह रणनीति कामयाब नहीं होगी, कोई हमारे और हमारे अफगान साथियों के बीच कील नहीं ठोंक सकता. इस वजह से हमने और इनसाइडर हमलों को रोकने के लिए कई कदम उठाए हैं, जिनमें नए सैनिकों की भर्ती के समय कड़ी जांच और काउंटर-इंटेलिजेंस को बढ़ाना भी शामिल है. जररूरत पड़ी तो हम और कदम उठाने से भी पीछे नहीं हटेंगे. इनसाइडर हमलों से स्थिति नहीं बदलेगी, हम अपनी रणनीति और समय सारिणी पर कायम रहेंगे. 2014 के अंत में हम आईसैफ का युद्धक मिशन समाप्त कर देंगे.

बहुत से विशेषज्ञों को आशंका है कि वारलॉर्ड और तालिबान उस पल का इंतजार कर रहे हैं जब नाटो के अंतिम सैनिक अफगानिस्तान छोड़ कर जा चुके होंगे. क्या वापसी की सही तारीख बताना सही रणनीति थी?

हां, यह सही था. अफगानिस्तान को जिम्मेदारी सौंपने का रोड मैप देना जरूरी था. एक तो इसलिए कि हम कब्जा करने नहीं आए हैं. पहला लक्ष्य स्थानीय जनता को जिम्मेदारी वापस सौंपना होना चाहिए. हम हमेशा अफगानिस्तान में नहीं रह सकते. दूसरे मैं कुछ खास डेडलाइनों को जरूरी मानता हूं. क्योंकि ऐसी तारीखों का उद्देश्य प्रक्रियाओं को तेज करना होता है. अफगानियों को पता है कि एक तारीख तक उन्हें खुद जिम्मेदारी उठाने की हालत में होना है. रोडमैप का काम है जोश दिलाना, और सचमुच हमने उसकी वजह से प्रगति देखी है.

लेकिन बहुत से गैर सरकारी संगठनों का कहना है कि अफगानिस्तान फिर से गृहयुद्ध का शिकार हो जाएगा. वे काबुल में केंद्रीय सरकार के विघटन की चेतावनी दे रहे हैं. ऐसी चेतावनियों की रोशनी में नाटो 2014 के बाद क्या करेगा?

सबसे पहले तो मैं यह कहना चाहता हूं कि मैं इन विचारों से सहमत नहीं हूं. मैं मानता हूं कि हमें अभी भी बहुत कुछ करना है, बहुत सी चुनौतियां भी हैं. लेकिन कुल मिलाकर प्रगति हुई है. सुरक्षा के मामले में दुश्मनों के हमले में कमी हुई है. देश के विकास के मोर्चे पर अपेक्षाकृत बड़ी आर्थिक प्रगति और शिक्षा व्यवस्था में सुधार देखा जा सकता है. 80 लाख बच्चे स्कूल जाते हैं, उनमें से एक तिहाई लड़कियां हैं. स्वास्थ्य सेवा में सुधार हुआ है. बच्चों की मृत्युदर गिरी है, जीवनदर बढ़ रही है. वहां बहुत क्षेत्रों में प्रगति हो रही है. हम अफगानिस्तान को अकेला नहीं छोड़ेंगे. हम 2014 तक अपना युद्धक मिशन पूरा करेंगे, लेकिन उसके बाद नाटो के नेतृत्व में एक ट्रेनिंग मिशन के सैनिक अफगानिस्तान में रहेंगे. हम अफगान सुरक्षा बलों की मदद करते रहेंगे और यह सुनिश्चित करेंगे कि देश की पूरी सुरक्षा की जिम्मेदारी लेने की उनकी क्षमता बनी रहे.

आईए एक नजर अफगानिस्तान में नाटो के नए मिशन पर डालते हैं. आईटीएएएम (इताम) पूरी तरह से ट्रेनिंग और सपोर्ट मिशन होगा या युद्धक सैनिकों की तैनाती भी जरूरी होगी?
यह कोई युद्धक मिशन नहीं होगा. इस समय के युद्धक मिशन और नए ट्रेनिंग मिशन में स्पष्ट विभाजन है. लड़ाई अफगान सैनिक करेंगे, हम ट्रेनर, समर्थक और सलाहकार के रूप में अफगान सैनिकों की मदद करेंगे. हम स्वाभाविक रूप से इसकी व्यवस्था करेंगे कि हमारे ट्रेनर सुरक्षित माहौल में काम कर सकें. हम उन्हें प्रभावी सुरक्षा देंगे. कितनी, यह अभी तय नहीं है. हम अभी योजना बनाने के आरंभिक चरण में हैं. लेकिन यह तय है कि यह कोई युद्धक मिशन नहीं होगा.

योजना के इस दौर में क्या नए मिशन के लिए संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव की जरूरत पर भी विचार हो रहा है ?

नहीं, अब तक हम वहां नहीं पहुंचे.

क्या आप संयुक्त राष्ट्र का प्रस्ताव चाहते हैं?

संयुक्त राष्ट्र का प्रस्ताव अच्छा रहेगा, लेकिन अंतरराष्ट्रीय कानून के मुताबिक अफगान सरकार का निमंत्रण काफी होगा. यदि उसके अलावा हमें यूएन का प्रस्ताव भी मिले, जैसा कि इस समय है, तो यह बहुत ही अच्छा होगा.

अफगान सरकार 2014 के बाद नाटो के सैनिकों को अफगान कानून के तहत मुकदमे से छूट देने में आनाकानी कर रही है. लेकिन नाटो के देश इसकी मांग कर रहे हैं. क्या यह विवाद नए मिशन को खतरे में डाल सकता है?

इस कानूनी मसले का हल होना चाहिए. अब तक हम किसी नतीजे पर नहीं पहुंचे हैं. इस पर हमारे और अफगान अधिकारियों के बीच बातचीत होगी और हमें कानूनी समस्या का हल करना होगा. अन्यथा ट्रेनरों को अफगानिस्तान में तैनात करने में समस्याएं पैदा होंगी.

भौगोलिक राजनीति पर एक नजर डालते हैं. अमेरिका अधिक से अधिक प्रशांत की ओर रुख कर रहा है. क्या इससे नाटो कमजोर हो रहा है?

नहीं, कतई नहीं. इसके विपरीत मैं समझता हूं कि अमेरिका का एशिया प्रशांत इलाके पर ध्यान देना और चीन जैसे क्षेत्रीय ताकतों के विकास पर निगाह डालना यूरोप के भी हित में है. यह निश्चित तौर पर महत्वपूर्ण है कि यह परंपारगत ट्रांस अटलांटिक संबंधों की कीमत पर न हो. हमने देखा है कि अमेरिकियों ने यूरोपीय सुरक्षा का समर्थन किया है. एक मिसाल रॉकेट रोधी पद्धति है. नाटो की रॉकेट रोधी पद्धति में अमेरिकियों ने बड़ा हिस्सा लिया है. यूरोपीय साथी में उसमें शामिल हैं, इसलिए यह एक साझा प्रयास है. यह इसका उदाहरण है कि अमेरिका अभी भी यूरोपीय सुरक्षा और ट्रांस अटलांटिक संबंधों का पक्षधर है. इसलिए मेरा मानना है कि नई अमेरिकी सुरक्षा नीति ट्रांस अटलांटिक रिश्तों की कीमत पर नहीं होगी.

इंटरव्यूः क्रिस्टियान ट्रिप्पे/एमजे

संपादनः एन रंजन

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