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दुनिया

नाकामी की कहानी बिन लादेन

नवाज शरीफ के सत्ता में आते ही ओसामा बिन लादेन से जुड़ी रिपोर्ट का लीक होना और सेना पर सवाल उठना कई और मुद्दों को जन्म देता है. डॉयचे वेले के दक्षिण पूर्व एशिया प्रमुख ग्रैहम लूकस की टिप्पणी.

दो साल पहले जब ओसामा बिन लादेन मारा गया, तो पाकिस्तान में इसकी जांच की गई. अब लीक हुई रिपोर्ट विदेशी मीडिया के हाथों में भी लग गई है. और इसमें कई चौंकाने वाली बातें सामने आईं.

हालांकि रिपोर्ट तैयार करने वालों के हिस्से में ईमानदारी और जिम्मेदारी दिखती है. इसमें पाकिस्तानी संस्थानों पर सवाल उठाने की हिम्मत भी की गई है. यहां तक कि सबसे ताकतवर पाकिस्तानी सेना को भी कठघरे में खड़ा किया गया है. रिपोर्ट में कहा गया है कि "हर स्तर पर मिली जुली नाकामी" रही. रिपोर्ट में कई सवालों के जवाब मिले हैं, तो कई नए सवाल खड़े हो गए हैं.

पहला सवाल जाहिर है टाइमिंग से जुड़ा है. जिस रिपोर्ट को तैयार करने के लिए पिछली सरकार ने टीम बनाई थी, उसकी रिपोर्ट सरकार बदलने के बाद क्यों लीक हुई. हालांकि सरकार इस बात को कभी स्वीकार नहीं कर सकती कि रिपोर्ट उसकी पहल पर लीक हुई है लेकिन अगर मौजूदा प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को ध्यान में रखें, तो सेना के साथ उनके रिश्तों को लेकर बहुत कुछ इशारा हो सकता है. सेना ने 1999 में शरीफ का तख्ता पलट दिया था.

अपने शुरुआती दिनों में ही शरीफ ने इशारा कर दिया है कि वह भारत के साथ रिश्ते बेहतर करना चाहते हैं. यह ऐसी बात है, जिसका पाकिस्तानी सेना दशकों से विरोध करती आई है. इसका कहना है कि पाकिस्तान को सबसे ज्यादा भारत से ही खतरा है. यहां तक कि इस पर आतंकवादियों के साथ मिल कर भारत में हमलों का भी इलजाम लगता आया है. और वह भी सिर्फ विवादित कश्मीर में नहीं, बल्कि 2008 के मुंबई वाले आतंकवादी हमले में भी.

इस तरह रिपोर्ट से शरीफ को एक मौका मिला है कि वह सेना के प्रभाव को कम कर सकें और विदेश और सुरक्षा नीतियों में अपनी बातों को ज्यादा तरजीह दे सकें, जिसपर परंपरागत रूप से सेना के जनरलों का दबदबा रहा है.

सेना के खिलाफ रिपोर्ट में जो चीजें हैं, वे हैरान करती हैं. इसमें आरोप लगाया गया है कि खुफिया एजेंसियों को ओसामा बिन लादेन की खोज का काम 2005 में ही रोकने को कहा गया. इसमें साफ तौर पर लिखा है कि पाकिस्तान को पता था कि 2002 में अफगान सीमा से भागने के बाद से बिन लादेन पाकिस्तानी सरहद में रह रहा था. इसके बाद वह पहले स्वात घाटी और बाद में सैनिक छावनी वाले शहर एबटाबाद पहुंच गया. अमेरिकी नेवी सील्स ने दो मई, 2011 को यहीं एक विशालकाय घर में धावा बोल कर ओसामा बिन लादेन को मार गिराया.

इस मुद्दे पर कोई चर्चा नहीं की गई है कि इस बात का खुलासा अब क्यों किया गया और पहले इस पर कार्रवाई क्यों नहीं की गई. 2012 तक आईएसआई के प्रमुख रहे लेफ्टिनेंट जनरल अहमद शुजा पाशा ने बार बार अपनी संस्था को इसकी आंच से बचाने की कोशिश की. उनके हवाले से कहा गया है कि तालिबान से निपटने का काम असैनिक सुरक्षा एजेंसियों के जिम्मे नहीं छोड़ा जा सकता है.

जो बात पहले लुकी छिपी हो रही थी, रिपोर्ट ने उसे साफ तौर पर लिख दिया है. इसमें लिखा गया है कि हो सकता है खुफिया अफसरों ने बिन लादेन की मदद की हो. हालांकि इस बारे में किसी की तरफ अंगुली नहीं उठाई गई है.

पर इस रिपोर्ट के बहाने शरीफ के पास मौका है कि वह इन नाकामियों का राजनीतिक जवाब खोजें. व्यवस्था में बदलाव करें, सेना और आईएसआई की जवाबदेही तय करें. अगर पाकिस्तान में लोकतंत्र की बहाली करनी है, तो ऐसा करना जरूरी भी होगा.

जहां तक पाकिस्तानी सेना की बात है, रिपोर्ट में उन पर भी सवाल उठाया गया है. इसमें कहा गया है कि लंबे वक्त तक आतंकवादी संगठनों और सेना की मिलीभगत को नजरअंदाज किया जाता रहा. वायु सेना को अमेरिकी हेलिकॉप्टरों के बारे में पता ही नहीं चला क्योंकि उनका सिस्टम काम नहीं कर रहा था. उन्हें इस बात का पता तब चला, जब अमेरिकी सैनिकों ने अपना काम पूरा कर लिया और जब इसकी पहली तस्वीरें पाकिस्तान के टेलीविजन चैनलों पर चलने लगीं.

इन बातों में नया आयाम तब उभरता है, जब देखा जाए कि पाकिस्तान को किस कदर अमेरिकी सहायता मिलती है. लेकिन पाकिस्तान का रिकॉर्ड खराब रहा है और कहते हैं कि अगर वह "खिलाने वाले हाथ को काटे न, तो फिर कैसा पाकिस्तान." रिपोर्ट में पाशा के हवाले से कहा गया है कि पाकिस्तानी सरहद में ड्रोन हमलों से पहले अमेरिका के साथ उसकी सहमति बन चुकी थी. हालांकि पाकिस्तान बार बार इससे इनकार करता आया है. इसके अलावा इस बात का भी खुलासा हुआ है कि अमेरिका ने ही आईएसआई को ओसामा बिन लादेन के एक करीबी का टेलीफोन नंबर दिया. लेकिन इसके बाद भी आईएसआई कुछ कर पाने में नाकाम रही.

बाद में इसी संपर्क के सहारे सीआईए एबटाबाद में बिन लादेन के गढ़ तक पहुंच पाई. पिछले दिनों में अपने "सहयोगी" के रवैये और नाकामी की वजह से ही अमेरिका ने इस ऑपरेशन को अपने दम पर करने का फैसला किया. यहां तक कि इससे पाकिस्तान की संप्रभुता को लेकर भी सवाल उठे.

हालांकि रिपोर्ट में पाकिस्तान की नाकामियों के जिक्र के बाद भी अमेरिका की बातों पर तवज्जो नहीं दिया गया, बल्कि ओसामा बिन लादेन को मार गिराने के उसके हमले की निंदा की गई. उसके ड्रोन हमलों पर भी सवाल उठाए गए.

रिपोर्ट का यह हिस्सा नवाज शरीफ को खुश कर सकता है क्योंकि यह पाकिस्तान की आम जनता की भावनाओं से मेल खाता है. इस मौके को वह दोनों हाथों से पकड़ना चाहेंगे. वह चाहेंगे कि आईएसआई और पाकिस्तानी सेना पर लगाम लग सके लेकिन सवाल है कि क्या वह इस चाहत में कामयाब हो पाएंगे.

ब्लॉगः ग्रैहम लूकस/एजेए

संपादनः महेश झा

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