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ब्लॉग

नाउम्मीदी का कोई विकल्प नहीं

नारी को पूज्य बताने वाले संस्कारों से पोषित देश भारत में नारी सिर्फ हिंसा सहने की पर्याय बन गर्इ है. समय और संस्कार बदलने के साथ लोगों की सोच न बदल पाने के कारण महिलाओं के हक में बने कानून भी राहत का सबब नहीं बन पा रहे.

कानून में बदलाव और नए कानून की जरुरत भी पूरी करने की सरकारी कवायद नाकाफी साबित हो रही है. सरकार और समाज के स्तर पर इस दिशा में माकूल चिंतन से उपजे कानूनी उपाय किताबों में दर्ज तो हो जाते हैं लेकिन इनका सही ढंग से पालन न हो पाने की वजह से ये बेअसर साबित हो रहे हैं. विशाखा गाइडलाइन से लेकर उषा मेहरा कमेटी की सिफारिशों तक का हश्र बताता है कि इन्हें लागू करने के लिए किए गए प्रयास सिफर ही रहे हैं.

महिलाओं के खिलाफ हिंसा को रोकने के उपाय सुझाने के लिए हाल ही में गठित एक उच्च स्तरीय समिति की रिपोर्ट इस बात की ताकीद भी करती है. महिलाओं की स्थिति पर एक राष्ट्रीय नीति बनाने के लिए केन्द्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा मार्च 2012 में गठित इस समिति ने अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपते हुए ऑनर किलिंग पर अलग से कानून बनाने की सिफारिश की है. पंजाब विश्वविद्यालय की पूर्व प्रोफेसर पैम राजपूत की अध्यक्षता वाली कमेटी ने महिला हिंसा पर अब तक मौजूद सरकारी और गैरसरकारी आंकड़ों को भी हकीकत से दूर बताते हुए वैज्ञानिक तरीके से सर्वेक्षण कराने की जरुरत पर बल दिया है.

कमेटी ने 1989 के बाद अब तक महिलाओं की स्थिति पर रिपोर्ट तैयार की है. इसमें महिलाओं की हालत में समय के साथ लगातार गिरावट आने का जिक्र करते हुए तीन बड़ी चुनौतियों को इंगित किया गया है. महिलाओं के खिलाफ लगातार बढ़ती हिंसा, लैंगिक अनुपात में गिरावट और महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण की धीमी गति को अब तक के सरकारी और गैरसरकारी प्रयासों के गाल पर करारा तमाचा बताया गया है.

क्या है उपाय

कमेटी ने इसके लिए सबसे पहले एक स्वतंत्र एजेंसी से सिर्फ महिलाओं के खिलाफ हिंसा से जुड़े आंकड़े सालाना तौर पर जुटाने को जरुरी बताया है. राजपूत का कहना है कि नेशनल सैंपल सर्वे या अपराध रिकार्ड ब्यूरो इस दिशा में पर्याप्त आंकड़े दे पाने में सक्षम नहीं हैं. साथ ही सामाजिक सोच में अब तक माकूल बदलाव न होने के लिए कमेटी ने खाप पंचायतों जैसी परिपाटी के देश भर में अलग अलग रुप में अब तक जारी रहने को दोषी माना है. इसके लिए कमेटी ने ऑनर किलिंग पर पृथक कानून बनाने की भी सिफारिश की है. इसके अलावा समस्या के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी को जिम्मेदार बताते हुए कमेटी ने महिलाओं के हक में बने आयोग या अन्य संवैधानिक संस्थाओं में राजनीतिक नियुक्तियों को रोकने की सरकारों से गुजारिश की है.

जमीनी हकीकत

समिति की रिपोर्ट निसंदेह हकीकत को उजागर करती है और इसकी सिफारिशें भी मौजूं हैं. लेकिन बड़ा सवाल यह है कि इन्हें लागू करना सरकारों का काम है जो अपना रवैया बदलने को कतर्इ तैयार नहीं दिखती हैं. गेंद घूम-फिरकर फिर राजनीति के अखाड़े में आ गर्इ है. समिति ने भी हाल ही में दिल्ली सरकार की उस पहल का जिक्र किया है जिसमें दिल्ली महिला आयोग की अध्यक्ष बरखा शुक्ला को हटा कर इस पद पर गैर राजनीतिक नियुक्ति करने की बात कही गर्इ है. इसमें कोर्इ शक नहीं है कि राज्यपालों से लेकर तमाम राष्ट्रीय या राज्य आयोगों के संवैधानिक पदों पर विशुद्ध राजनीतिक नियुक्तियां हो रही हैं. सत्तारुढ़ दल अपने चहेतों को इन पदों पर तैनात कर संविधान की मूल भावना का मखौल उड़ा रहे हैं. महिला आयोग भी इससे अछूते नहीं हैं.

सुप्रीम कोर्ट की पूर्व जज रुमा पाल कहती है कि समस्या को जड़ से पकड़ना होगा. सिर्फ सरकार और सियासती लोगों की नीयत पर सवाल करने मात्र से काम नहीं चलेगा. उनकी दलील है कि सरकार, संसद और सियासत में जुटे लोग समाज की तस्वीर पेश करते हैं. सियासत में अयोग्य लोगों का आना यह साबित करता है कि योग्य लोग राजनीतिक प्रक्रिया से खुद को दूर कर रहे हैं. यह पहल समाज के शिक्षित तबके को करनी ही होगी. इसकी शुरुआत दिल्ली से हो रही है. दिल्ली में महिला आयोग सहित अन्य संवैधानिक संस्थाओं में गैर राजनीतिक नियुक्तियां करने की पहल भविष्य के लिए उम्मीद पैदा करती है.

कानून कितने कामयाब

दहेज प्रथा रोकने के लिए बने कानून का दो दशक का अनुभव बताता है कि महज कानून बना देने से हालात नहीं बदलेंगे. भारत में महिला अधिकारों की न्यायिक पहल की दिशा में कार्यरत अमेरिकी सामाजिक कार्यकर्ता मार्टा कार्सनेट का कहना है कि आज ऑनर किलिंग के लिए तो कल बलात्कार के लिए नए कानून की मांग उठेगी. लेकिन यह स्थायी समाधान नहीं है. दहेज कानून के दुरुपयोग की हकीकत किसी से छुपी नहीं है. इससे कानून की कमी नहीं बल्कि कानून लागू करने की नीयत पर सवाल खड़े होते हैं.

दशकों से महिलाओं के खिलाफ हिंसा की कानूनी लड़ाई लड़ रहे वरिष्ठ वकील अरविंद जैन कहते हैं कि अनगिनत कानूनों वाले इस देश में साफ सुथरी छवि और बेहतर सोच वाले मुट्ठी भर लोग दिल्ली में अगर बड़े बदलाव का संकेत दे सकते हैं तो देश में अभी उम्मीद की इस लौ को जलाना बाकी है. वह कहते हैं कि हिंसा के बढ़ते आंकड़े बताते हैं कि हिंसा में इजाफा नहीं हुआ है बल्कि इस तरह के मामलों की हर स्तर पर रिपोर्टिंग में इजाफा हुआ है. साफ है कि महिलाएं और मीडिया दोनों मुखर हो रहे हैं. ऐसे में कुछ भी हो नाउम्मीद होने का कोई विकल्प अभी हमारे लिए मौजूद नहीं है.

ब्लॉग: निर्मल यादव

संपादन: आभा मोंढे

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