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दुनिया

नहीं माना कतर, जारी रहेगा बहिष्कार

सउदी अरब के नेतृत्व में खाड़ी देशों ने कतर पर आतंकवाद के पोषण के आरोप लगाते हुए सभी राजनयिक संबंध तो़ड़ लिए थे. कतर को 13 मांगों की सूची दी गयी थी, जिसे कतर ने स्वीकार करने से मना कर दिया है.

कतर से अपने राजनियक संबंध तोड़ लेने वाले अरब देशों ने कहा है कि कतर पर लगे प्रतिबंध जारी रहेंगे. उन्होंने कतर की आलोचना करते हुए कहा कि इस राजनयिक संकट का अंत करने वाली मांगो की सूची पर कतर ने कोई जवाब नहीं दिया है.

सऊदी अरब के नेतृत्व में खाड़ी देशों ने कतर के समक्ष 22 जून को 13 मांगों की सूची रखी थी और इन्हें पूरा होने पर ही कतर से संबंध बहाल करने की बात कही थी. इन मांगों में समाचार चैनल अल-जजीरा को बंद करना, ईरान के साथ राजनयिक संबंध तोड़ना और तुर्की का सैन्य अड्डा बंद करने समेत कई मांगें शामिल थीं. इन मांगो को स्वीकार न करने के बाद चारों देशों ने कतर पर प्रतिबंध जारी रहने की बात कही है.

क्या है विवाद?

सऊदी अरब और दूसरे सुन्नी देश कतर के शिया बहुल ईरान से नजदीकी बढ़ाने की कोशिशों से नाराज रहते हैं. ऐसा कहा जाता है कि कतर के सरकारी चैनल में चली किसी फर्जी रिपोर्ट ने इस विवाद को खड़ा किया है. इस कथित फर्जी रिपोर्ट के मुताबिक कतर के नेता तामिम बिन हमद अल थानी ने ईरान को इस्लामी शक्ति बताते हुये कहा था कि ईरान के साथ शत्रुतापूर्ण संबंधों का कोई मतलब नहीं है. जानकारों के मुताबिक यही बात सऊदी अरब को रास नहीं आई और उसने इतना बड़ा कदम उठाया.

इस खबर को बेशक फर्जी माना जा सकता है लेकिन ये भी सच है कि ईरान के राष्ट्रपति हसन रोहानी को राष्ट्रपति चुनाव में मिली जीत के बाद कतर के नेता ने उन्हें फोन किया था. इस फोन कॉल ने भी कतर को अपने अन्य सहयोगियों से अलग-थलग कर दिया था और अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के सहयोग के बाद सऊदी अरब ने ईरान के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था. ईरानी नेता के साथ बातचीत में कतर ने कहा था कि मौजूदा समस्याओं को सिर्फ बातचीत और समझौतों के जरिये ही सुलझाया जा सकता है. कतर का ये नरम रुख भी उसके लिये भारी पड़ा. शिया बहुल ईरान और सुन्नी बहुल सऊदी अरब एक दूसरे के विरोधी हैं. इसी साल 5 जून को सऊदी अरब के नेतृत्व में चारों देशों ने कतर से अपने सभी राजनयिक संबंध तोड़ लिये थे. इसके बाद कतर के लिए इन देशों ने सभी हवाई और समुद्री रास्ते बंद कर दिये हैं. चारों देशों ने अपने यहां रह रहे कतर के नागरिकों को पहले ही अपने देश लौट जाने के भी आदेश दिये थे.

अब आगे क्या?

संबंध बहाल करने के लिए सभी देशों ने कतर के समक्ष 22 जून को 13 मांगो की सूची जारी की थी जिसे स्वीकार करने की सीमा 5 जुलाई को खत्म हो गयी.

कतर ने इन मांगों को स्वीकार नहीं किया और समय सीमा समाप्त होने के बाद मिस्र, सउदी अरब, बहरीन और सुंयक्त अरब अमीरात के विदेश मंत्रियों ने काहिरा में बैठक के बाद एक साझा बयान में कहा कि उन्हें, "कतर की इस नकारात्मक जवाब पर अफसोस है और यह बहिष्कार जारी रहेगा."

मिस्र के विदेश मंत्री ने कहा कि, "प्रतिबंध की शर्तों पर कतर की प्रतिक्रिया का कोई अर्थ नहीं है और यह स्थिति की गंभीरता में समझ की कमी दिखाता है."

संयुक्त अरब अमीरात के विदेश मंत्री ने इस बात के संकेत दिए हैं कि आने वाले समय में कतर पर प्रतिबंध और बढ़ाए जा सकते हैं.

सऊदी अरब और उसके सहयोगियों ने यह नहीं कहा है कि वे आगे क्या कदम उठा सकते हैं, लेकिन इस बात का डर है कि आने वाले वक्त में कतर की अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाने वाले प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं.

कतर का रुख

इस मामले में कतर के विदेश मंत्री शेख मोहम्मद बिन अब्दुल रहमान अल थानी ने कहा था कि मांगों की सूची "गैरवाजिब हैं और कार्रवाई के लायक नहीं है".

हालांकि, इस मामले को सुलझाने के लिए कतर ने लगातार कोशिशें की. जब अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रम्प ने मिस्र के राष्ट्रपति अब्दुल फतह अल सिसी से इस संकट पर तर्कपूर्ण ढंग से समझौता करने की बात कही थी, तब भी कतर ने इस मामले को हल करने के लिए बातचीत करने की अपील की थी.

कतर की मुश्किलें
कतर और ईरान के बीच देश से बाहर प्राकृतिक गैस का एक बहुत बड़ा भंडार है, जो गैस पर निर्भर कतर जैसे छोटे देश के लिए बहुत अहम स्रोत है. कतर को 2022 में फीफा विश्व कप फुटबॉल का आयोजन भी करना है. इसके लिए भी उसे काफी धन की जरूरत होगी.

अगर कतर पड़ोसी देशों की इन शर्तों को मानने को तैयार हो जाता है तो भी पहले एक साल तक हर महीने इन सभी शर्तों की ऑडिट की जाएगी. उसके बाद भी अगले 10 साल हर तिमाही में कतर के प्रदर्शन का मूल्यांकन होगा.

एसएस/ (एएफपी)

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