1. Inhalt
  2. Navigation
  3. Weitere Inhalte
  4. Metanavigation
  5. Suche
  6. Choose from 30 Languages

दुनिया

नहीं थम रहा बाघों के मरने का सिलसिला

भारत में तमाम कोशिशों के बावजूद बाघों की मौत के मामलों पर अंकुश नहीं लगाया जा सका है. इस दौरान अवैध शिकार की घटनाएं भी तेजी से बढ़ी हैं.

इस साल की पहली छमाही में देश के विभिन्न राज्यों में 74 बाघों की मौत हो चुकी है. इनमें से 14 शिकारियों के हाथों मारे गए हैं. वाइल्डलाइफ प्रोटेक्शन सोसायटी ऑफ इंडिया की ओर से जारी ताजा आंकड़ों से इसका खुलासा हुआ है.

ताजा आंकड़े

वाइल्डलाइफ प्रोटेक्शन सोसायटी के अनुसार इस साल पहली जनवरी से 26 जून तक देश के विभिन्न राज्यों में अलग-अलग वजहं से 74 बाघ मारे जा चुके हैं. इनमें से 14 की मौत बिजली के तारों का झटका लगने या अवैध शिकार की वजह से हुई है. रिपोर्ट में कहा गया है कि 26 बाघों की मौत बीमारियों, बुढ़ापे या कई अनजान कारणों से हुई है. अठारह बाघ आपसी संघर्ष में मारे गए जबकि दो की मौत इंसानों के हाथों हुई.

इसके अलावा सड़क व रेल हादसों में भी कम से कम चार बाघ मारे गए. इससे पहले बीते साल 91 बाघों की मौत हुई थी. दूसरी ओर, सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, इस साल विभिन्न वजहों से 52 बाघ मारे गए हैं जबकि 15 बाघों के शव या शव के हिस्से बरामद हुए हैं. वर्ष 2014 में हुई गिनती के मुताबिक देश में 2,296 बाघ थे.

मध्य प्रदेश पहले नंबर पर

बाघों की मौतों के मामले में मध्य प्रदेश पहले स्थान पर है. वहां सबसे ज्यादा 19 बाघ मारे गए. उसके बाद महाराष्ट्र व उत्तराखंड संयुक्त रूप से दूसरे स्थान पर हैं. इन दोनों राज्यों में इस साल अब तक नौ-नौ बाघों की मौत हो चुकी है. अवैध शिकार के मामले में भी छह मौतों के साथ मध्यप्रदेश पहले स्थान पर है. इस दौरान देश के 15 राज्यों से बाघों के शिकार के मामले सामने आए हैं. बाघों की तादाद बढ़ने के साथ उनकी मौत की घटनाओं में तेजी पर पशुप्रेमियों ने गहरी चिंता जताई है.

वन्यजीव कार्यकर्ता रोहन सामंत कहते हैं, "देश में प्रोजेक्ट टाइगर के नाम पर हर साल करोड़ों की रकम खर्च की जाती है. बावजूद उसके बाघों की मौत के मामलों में वृद्धि चिंताजनक है." वन्यजीव कार्यकर्ताओं का कहना है कि बाघों की तादाद बढ़ने की वजह से इंसानों के साथ उनके संघर्ष की घटनाएं भी बढ़ी हैं. लेकिन केंद्र सरकार और प्राधिकरण ने अब तक इस मामले पर अंकुश लगाने की दिशा में कोई ठोस पहल नहीं की है.

संरक्षण के लिए धन की कमी

इस स्थिति के बावजूद राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण की ओर से संरक्षण के लिए समय पर धन जारी करने में होने वाली देरी से चिंता बढ़ गई है. देश के 48 टाइगर रिजर्वों में से प्राधिकरण ने प्रोजेक्ट टाइगर योजना के तहत अब तक महज छह रिजर्वों के लिए ही धन जारी किया है, जबकि अधिकारी अब तक 17 टाइगर रिजर्वों को धन जारी करने का दावा कर रहे हैं. उनका कहना है कि वेबसाइट पर अब तक महज छह का आंकड़ा ही दिया गया है. इनमें महाराष्ट्र का एक भी टाइगर रिजर्व शामिल नहीं है जबकि महाराष्ट्र वन्यजीव शाखा ने राज्य के छह टाइगर रिजर्वों के लिए 155 करोड़ रुपए की मांग की है.

प्राधिकरण की ओर से धन जारी करने में होने वाली देरी पर चिंता जताते हुए वन्यजीव अधिकारियों ने कहा है कि इससे वन मजदूरों और स्पेशल टाइगर प्रोटेक्शन फोर्स के कर्मचारियों को समय पर वेतन नहीं दिया जा सकेगा. नतीजतन मानसून के दौरान शिकार का खतरा बढ़ने के बावजूद बाघों की सुरक्षा में बाधा पहुंचेगी.

प्रभाकर

DW.COM

संबंधित सामग्री