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ब्लॉग

नसबंदी नीति में बदलाव जरूरी

नसबंदी के ज्यादातर मामले महिलाओं के ही होते हैं और इसके लिए भारतीय समाज की मानसिकता जिम्मेदार है. लोगों में यह गलत धारणा है कि नसबंदी कराने से पौरुष खत्म हो जाएगा. इसलिए महिलाओं को ही बलि का बकरा बनाया जाता है.

देश के सबसे पिछड़े और आदिवासी-बहुल राज्य छत्तीसगढ़ में नसबंदी के बाद 13 महिलाओं की मौत ने एक बार फिर आबादी पर रोक लगाने की इस महत्वाकांक्षी सरकारी योजना की पोल खोल दी है. यह मौतें बिना सोचे-समझे लगाए जाने वाले शिविरों, वाहवाही लूटने और प्रमोशन पाने के लिए आंकड़ों को बढ़ा-चढ़ा कर दिखाने, चिकित्सीय लापरवाही और ऑपरेशन में इस्तेमाल होने वाले उपकरणों के घटिया स्तर का नतीजा है.

नसबंदी से पहले भी मौतें होती रहीं हैं. लेकिन बावजूद इसके कभी सरकार ने इस ऑपरेशन के लिए कोई ठोस दिशा-निर्देश नहीं बनाए हैं. जो पैमाने तय हैं उनकी भी जमकर अनदेखी की जाती है. हर बार ऐसी किसी बड़ी घटना की स्थिति में समस्या का ठोस समाधान तलाशने की बजाय एक-दूसरे पर दोषारोपण का दौर शुरू हो जाता है. समस्या की जड़ में कोई नहीं जाना चाहता.

पैसे के लालच में

भारत सरकार ने तेजी से बढ़ती आबादी पर अंकुश लगाने के लिए कुछ साल पहले ही बड़े पैमाने पर नसबंदी की महात्वाकांक्षी योजना तैयार की थी. वैसे इससे पहले संजय गांधी के जमाने में होने वाली जबरन नसबंदी के मामलों ने भी जमकर सुर्खियां बटोरी थीं. लेकिन तब और अब के हालात में काफी अंतर आया है. अब केंद्र सरकार की योजना के तहत विभिन्न राज्य सरकारों ने भी इन योजनाओं को बढ़ावा देने के लिए आर्थिक सहायता घोषित की है.

कहीं यह ऑपरेशन कराने वाली महिला को आठ सौ रुपये दिए जाते हैं तो कहीं 1400. कई बार इसी रकम की लालच में गरीब महिलाएं नसबंदी शिविरों में पहुंच जाती हैं. कई डाक्टरों का प्रमोशन भी पूरे साल होने वाले नसबंदी की तादाद से जुड़ा होता है. इसके अलावा इस सरकारी योजना में खुली लूट के लिए दवा कंपनियां भी सक्रिय रहती हैं. वह इसके लिए एक्सपायरी डेट की दवाओं से लेकर बेहद घटिया उपकरणों की सप्लाई करती रहती हैं.

एक दिन में 300 ऑपरेशन

जाहिर है यह सब स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों की मिलीभगत से ही होता है. आंकड़ों को बढ़ा-चढ़ा कर दिखाने के लिए नसबंदी शिविरों में एक दिन में सैकड़ों ऑपरेशन कर दिए जाते हैं. कम समय में जल्दबाजी में होने वाले इन ऑपरेशनों में साफ-सफाई का ध्यान रखना मुमकिन ही नहीं है. छत्तीसगढ़ के जिस डाक्टर आरपी गुप्ता को गिरफ्तार किया गया है उन्होंने तो साफ कहा कि एक दिन में दो से तीन सौ तक ऑपरेशन किए जाते हैं. अब गांव-देहात में लगने वाले शिविरों में न तो एक साथ इतने उपकरणों का इंतजाम संभव है और न ही उनको कीटाणुमुक्त यानि स्टर्लाइज करने का कोई माकूल इंतजाम. ऐसे में संक्रमण होना तय है.

छत्तीसगढ़ की घटना के बाद अब धीरे-धीरे इसमें शामिल तमाम पक्ष अपनी गर्दन बचाने के लिए एक-दूसरे की पोल खोलने लगे हैं. इसी से यह हकीकत भी सामने आई है कि ऐसे शिविरों में एक्सपायरी डेट की कई प्रतिबंधित दवाओं का इस्तेमाल किया जा रहा था. केंद्र और राज्य सरकारों ने नसबंदी की योजनाओं को तो लागू कर दिया है. लेकिन इस पर निगरानी के लिए कोई ठोस तंत्र विकसित नहीं हो सका है. यही वजह है कि इस मामूली ऑपरेशन से भी देश में हर साल सैकड़ों महिलाएं अपनी जान गंवा रही हैं.

उपाय

नसबंदी से होने वाली मौतों पर अंकुश लगाने के लिए सरकार को नसबंदी से जुड़ी नीतियों में बदलाव करना होगा. इसकी तादाद के साथ सरकारी डॉक्टरों का प्रमोशन जोड़ने की नीति बंद करनी होगी. इसके अलावा एक ऐसा तंत्र विकसित करना होगा जो ऐसे शिविरों में सुरक्षा से संबंधित पहलू का ध्यान रखे.

एक खास बात यह है कि ऐसे ज्यादातर शिविर पिछड़े ग्रामीण इलाकों में ही लगाए जाते हैं. उन इलाकों में जागरुकता अभियान चलाना जरूरी है ताकि महिलाओं के साथ पुरुष भी ऐसे ऑपरेशन के लिए आगे आएं. महज शिविर लगाने और आंकड़ों को बढ़ाने के लिए भेड़-बकरी की तरह ऑपरेशन करने की सूरत में ऐसी मौतों पर अंकुश लगाना संभव नहीं है.

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