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दुनिया

नसबंदी के अलावा राहें और भी

भारत का परिवार नियोजन कार्यक्रम मुख्य रूप से महिलाओं की नसबंदी कराने पर केंद्रित है. पीएफआई की पूनम मुटरेजा कहती हैं कि इस कार्यक्रम को आज भी प्रजनन अधिकारों और विकल्प के ढांचे में नहीं देखा जा रहा है.

डॉयचे वेले: भारत में प्रचलित महिला नसबंदी पर केंद्रित जनसंख्या नियंत्रण कार्यक्रम के बारे में आपकी क्या राय है?

पूनम मुटरेजा: भारतीय परिवार नियोजन कार्यक्रम ने अपनी स्थापना के समय से एक लंबा सफर तय किया है. देश धीरे-धीरे जनसंख्या को स्थिर बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है. 2011 की जनगणना से हमें जनसंख्या वृद्धि के संबंध में कई सकारात्मक रुझान मिले हैं. नए आंकड़ों से पता चलता है कि भारत को घबराने की जरूरत नहीं है. हाल के वर्षों में परिवार नियोजन पर दिए जा रहे बल के कारण ही आजकल सबसे गरीब और हाशिए पर मौजूद महिलाएं भी दो से अधिक बच्चें नहीं पैदा करना चाहतीं. दुर्भाग्य से आज भी जनसंख्या वृद्धि से जुड़ी कई मिथक और गलतफहमियां हैं. परिवार नियोजन कार्यक्रम को आज भी प्रजनन अधिकारों और विकल्प के ढांचे में न देख कर जनसंख्या नियंत्रण के नजरिए से देखा जा रहा है. नतीजतन, महिलाओं की जरूरतों और सेवाओं की गुणवत्ता की कीमत पर परिवार नियोजन कार्यक्रम में संख्या और लक्ष्यों पर ध्यान दिया जा रहा है. इस बात के प्रत्यक्ष प्रमाण मिले हैं कि देश में युवाओं की बड़ी आबादी ही देश में तेजी से बढ़ती जनसंख्या के सबसे बड़े कारणों में शामिल है, इसके बावजूद प्रोग्राम अब भी परिवार नियोजन के स्थाई तरीकों, खासकर महिला नसबंदी जैसे तरीकों को बढ़ावा देता है.

फिलहाल चल रहे तरीके को आगे जारी रखने में क्या नुकसान है?

स्वास्थ्य कर्मचारियों को प्रोत्साहन के रुप में दिए जाने वाले नकद और पुरस्कार उनकी सेवाओं की गुणवत्ता के बजाय नसबंदियों की संख्या पर निर्भर करते हैं. ये नकद और पुरस्कार महिला नसबंदी करने वाले डॉक्टरों को निर्धारित मानदंड से कहीं अधिक सर्जरी करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं. पीएफआई की सिफारिश है कि प्रोत्साहन पर खर्च होने वाली धनराशि को सरकारी सेवाओं में सुधार लाने के लिए निवेश किया जाना चाहिए. स्वास्थ्य कर्मचारियों और लाभार्थियों को दिए जाने वाले नकद और पुरस्कार पर रोक लगाई जानी चाहिए क्योंकि वे मानव अधिकारों का उल्लंघन करते हैं और गरीबों की कमजोरी का फायदा उठाते हैं. कई बार गरीबों पर ऐसे कैंपों में जाने के लिए दबाव डाला जाता है. ऐसे में वे बेहद गंदी स्थिति में सर्जरी करवा कर अपने जीवन को खतरे में डालते हैं.

जनसंख्या वृद्धि को रोकने का आदर्श तरीका क्या है? क्या दूसरे देशों से इस बारे में कुछ सीखा जा सकता है?

हर कोई इस बात पर सहमत होगा कि देश में जनसंख्या वृद्धि को स्थिर करने की जरूरत है, जनसंख्या 'समस्या' की प्रकृति को समझना पहले जरूरी है. परिवार नियोजन के बारे में सोच बदलने की जरूरत है. यह केवल गर्भनिरोध से जुड़ा नहीं है बल्कि यह भी जरूरी है कि परिवार नियोजन को एक आधारभूत मानव अधिकार के तौर पर देखा जाए. फैमिली प्लैनिंग को अलग तरह से देखे जाने के लिए किशोरों और युवाओं की सेहत संबंधी जरूरतों में और ज्यादा निवेश की जरूरत होगी. साथ ही साथ शादी की उम्र भी बढ़नी चाहिए, पहले बच्चे के जन्म के समय मां की उम्र और बच्चों के बीच अंतर रखने से जुड़ी जानकारी मिलनी चाहिए. इसके अलावा अजन्मे बच्चे के लिंग निर्धारण को रोकने के लिए भी प्रयास करने चाहिए. इसे शिक्षा, सामाजिक-आर्थिक स्तर, महिला सशक्तिकरण, बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं और दूसरे मानव विकास सूचकों के साथ जोड़कर देखने से ही देश की इतनी बड़ी युवा आबादी की जरूरत पूरी की जा सकेगी.

जनसंख्या वृद्धि को रोकने में लोगों की मानसिकता की कितनी भूमिका है?

जनसंख्या बढ़ने के बारे में कई तरह के मिथक और गलत धारणाएं फैली हुई हैं. यह सेवाप्रदाताओं से लेकर समुदाय के सदस्यों तक के स्तर पर व्याप्त हैं. लोगों की पहुंच परिवार नियोजन की सेवाओं और जानकारियों तक नहीं है. इस कारण वे सही चुनाव नहीं कर पाते. देश में राष्ट्रीय जनसंख्या नीति को 2000 में ही लागू कर दिया गया था. इस नीति में जनसंख्या स्थिरता के लिए व्यापक दृष्टिकोण विकसित करने का आह्वान किया गया है. इसके अलावा सेहत, महिला सशक्तिकरण, शिक्षा, नियोजन का टारगेट-फ्री रवैया और सामुदायिक स्तर पर सेवाएं उपलब्ध कराने जैसे सामाजिक निर्धारकों पर ध्यान देने का सुझाव है.

शादी की उम्र, पहले बच्चे के जन्म के समय आयु, मां और बच्चे की सेहत के लिए महिलाओं को शिक्षित करने जैसे सामाजिक और सांस्कृतिक कारक इस नीति में प्रमुखता से शामिल किए गए हैं. साथ ही साथ कई तरह के गर्भनिरोधक उपायों के बारे में बताया गया है. फिर भी, जमीनी स्तर पर नीतियों और उनके क्रियान्वन में काफी अंतर है. सेवा दाताओं के पास ही कई बार सही क्षमता और कौशल नहीं होते. जनसंख्या नियंत्रण की मानसिकता से निकल कर जनसंख्या स्थिरता की ओर बढ़ने की जरूरत है और पूरी स्थिति को समग्र रूप में देखे जाने की भी.

पूनम मुटरेजा गैर-सरकारी संगठन पॉपुलेशन फाउंडेशन ऑफ इंडिया की कार्यकारी निदेशक हैं.

इंटरव्यू: आशुतोष पांडेय

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