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दुनिया

नवाज पर सेना की टेढ़ी नजर

पाकिस्तान में चुनाव जीतने के बाद नवाज शरीफ ने भारत की तरफ दोस्ताना हाथ बढ़ाया है, जिस पर सेना जरा ध्यान से नजर रख रही है. कभी शरीफ की सत्ता पलटने वाली सेना भारत के साथ बहुत अच्छे रिश्तों के हक में नहीं है.

भले ही पाकिस्तान में पहली बार लोकतंत्र ने अपनी मियाद पूरी की हो लेकिन शरीफ के हाथों में एक जर्जर और मुश्किल राष्ट्र आ रहा है, जिसके हर कोने पर पैबंद लगाने की जरूरत है. एक तरफ तालिबान का आतंक, दूसरी तरफ जातीय हिंसा, रोज रोज कटने वाली बिजली और बढ़ती बेरोजगारी.

सेना के पूर्व अफसरों का मानना है कि इन समस्याओं से निपटने के लिए नए प्रधानमंत्री को सेना की भी जरूरत पड़ेगी. पूर्व एयर वाइस मार्शल शहजाद चौधरी का कहना है, "पाकिस्तान के पास इतनी सारी समस्याएं हैं कि उन्हें हर किसी की मदद की जरूरत होगी. सेना की भी."

सवाल अलग है, क्या सेना नवाज शरीफ को उनकी मर्जी का करने देगी. वह चाहते हैं कि पड़ोसी मुल्क भारत के साथ रिश्ते बेहतर किए जाएं. परमाणु संपन्न दोनों देशों के बीच तीन बार लड़ाई हो चुकी है, जिसमें से एक बार शरीफ के प्रधानमंत्री रहते हुए दोनों देश एक दूसरे के आमने सामने हुए थे.

वह भारत के प्रति जो भी नीति बनाएंगे, उस पर बारीकी से विचार किया जाएगा. पाकिस्तान की सेना का बजट बहुत भारी भरकम होता है और सेना भारत से खतरे के बल पर इस बजट को न्यायोचित ठहराती है. हालांकि अब संकेत मिल रहे हैं कि सेना थोड़ा नरम रवैया अपना सकती है. 1999 में नवाज शरीफ जब प्रधानंत्री रहते हुए भारत के साथ रिश्ते बेहतर बनाने की कोशिश कर रहे थे, तभी उस वक्त के सेना प्रमुख परवेज मुशर्रफ ने उनका तख्ता पलट दिया था. हालांकि इससे पहले शरीफ ने मुशर्रफ को हटाने का प्रयास किया था लेकिन उलटा हो गया.

शरीफ ने यह भी कहा था कि करगिल की घटना की जांच की जाएगी, जिससे सेना के ज्यादातर अधिकारी खुश नहीं थे. अब स्थिति उलटी है. मुशर्रफ पाकिस्तान के अंदर नजरबंद हैं और शरीफ एक बार फिर से सत्ता पर काबिज होने वाले हैं. हालांकि शरीफ सेना के साथ रिश्ते बेहतर करने की शुरुआत यह कह कर कर चुके हैं, "मुझे सेना के साथ कोई परेशानी नहीं है. सत्ता पलट सिर्फ एक व्यक्ति की साजिश थी. बाकी की सेना को भरोसे में नहीं लिया गया था. हमें मिल कर काम करना है."

अधिकारियों का कहना है कि वे लोग तीन चीजों को बारीकी से देख रहे हैं, करिगल संघर्ष की जांच, नवंबर में जनरल कियानी के रिटायरमेंट के बाद सेना का अगला प्रमुख और शरीफ आतंकवाद से निपटने के लिए क्या करते हैं. पाकिस्तान की सेना ने "अच्छे और बुरे तालिबान" की बात कहनी शुरू कर दी है. अच्छा वह जो पाकिस्तान पर हमला नहीं करता और अफगानिस्तान में कार्रवाई करता है, बुरा वह जो पाकिस्तान की सेना और नागरिकों को मारता है.

शरीफ का भी मानना है कि पाकिस्तानी तालिबान से बात करनी चाहिए. सेना के अंदर के भी कई लोग मानते हैं कि इससे तनाव कम हो सकता है लेकिन समस्या पूरी तरह हल नहीं हो सकती है. वे लोग किसी तरह के समझौते के हक में नहीं हैं. पाकिस्तान के सुरक्षा सलाहकार रह चुके मेजर जनरल महमूद दुर्रानी कहते हैं कि सेना यह भी जानना चाहती है कि क्या शरीफ देश के सभी प्रांतों को मिला कर काम कर पाएंगे क्योंकि इस बार के चुनाव में चारों राज्यों में अलग अलग पार्टियों की सरकार बनती नजर आ रही है.

पाकिस्तानी आतंकवादियों को पहले सेना का समर्थन मिला करता था. जानकारों का मानना है कि सेना उनके बल पर भारत में अपनी कार्रवाई किया करती थी लेकिन अब स्थिति बदल गई है. भारत का आरोप है कि 26/11 वाले मुंबई के आतंकवादी हमलों में सेना के सदस्य भी शामिल थे. दुर्रानी का कहना है कि भारत के प्रति रवैया धीरे धीरे बदल रहा है, "पाकिस्तान के आगे बढ़ने के लिए भारत के साथ शांति जरूरी है. लेकिन इसके लिए सेना चुपचाप बैरकों में नहीं बैठेगी, यह अभी भी विदेश नीति में अच्छा खासा दखल देगी. यह धीरे धीरे ही खत्म होगा."

मौजूदा सेना प्रमुख जनरल अशफाक कियानी कई बार भारत से बाहरी खतरे का जिक्र कर चुके हैं. लेकिन इन दिनों वह आतंकवाद को पाकिस्तान के अंदर का खतरा भी बता रहे हैं. सेना के एक उच्च पदस्थ अफसर का कहना है, "सेना को अब यह अहसास हो गया है कि भारत के साथ अमन कितना जरूरी है. हर कोई चाहता है कि कश्मीर समस्या का समाधान हो."

हालांकि दुर्रानी और चौधरी दोनों का कहना है कि बदलाव धीरे धीरे ही होगा और इसके लिए भारत को भी सही संकेत देना होगा. चौधरी का कहना है, "यह सिर्फ कल्पना ही हो सकती है कि विदेश नीति रातोंरात बदल जाए."

एजेए/एनआर (रॉयटर्स)

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