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ब्लॉग

नयी स्वास्थ्य नीति में आम नागरिकों की होगी कितनी जगह

करीब 15 साल के इंतजार के बाद भारत की नई राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति कैबिनेट में पेश कर दी गई है. लेकिन क्या ये नीति देश की एक बड़ी आबादी को जरूरी स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया करा पाएगी, ये सवाल कायम है.

भारत में बड़ी आबादी को जरूरी स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया कराना और स्वास्थ्य के क्षेत्र में उपचार, देखरेख और स्वस्थ आहार का एक सक्रिय ढांचा खड़ा करना एक बड़ी चुनौती है. बेशक इस स्वास्थ्य नीति में इस बात की शिनाख्त की गई है कि किया क्या जाना है, लेकिन कौन और कैसे के सवाल पर नीति एक कदम आगे दो कदम पीछे हो जाती है. यानी एक ठोस व्यवहारिक कार्ययोजना का अभाव नजर आता है जो नीति के बुनियादी उद्देश्य को पूरा कर सके.

इससे पहले 1983 और 2002 की स्वास्थ्य नीतियां तत्कालीन सरकारों की पंचवर्षीय योजना का ही हिस्सा हुआ करती थीं. इस नीति में यूं तो बताया गया है कि भारत में स्वास्थ्य सेवा प्रदाता प्रणाली की बदहाली को दुरुस्त किया जाना है. इसके लिए एक मजबूत हेल्थ केयर इंडस्ट्री की जरूरत है. लेकिन सवाल यही है कि अगर इस बुनियादी सेवा को इंडस्ट्री के तौर पर विकसित करने के रूप में देखा जा रहा है, तो इसमें देश के गरीब, वंचित तबकों और दुर्गम इलाकों के निवासियों की क्या जगह होगी.

केंद्र सरकार की ओर से बजट की कमी, राज्यों के अपने वित्तीय संकट और वित्तीय कुप्रबंधन, मानव संसाधन की किल्लत और उपलब्ध संसाधनों की शिथिलता और निष्क्रियता, उपकरणों की कमी या देखरेख में कोताही, प्रबंधकीय अयोग्यताओं, प्रशिक्षण और सामर्थ्य विकास की सुस्त कोशिशों के चलते सार्वजनिक स्वास्थ्य की मशीनरी एक तरह से चरमराई हुई हालत में हैं. जिसका असर देश के नागरिकों के कुल स्वास्थ्य पर पड़ रहा है. खासकर महिलाओं और बच्चों की स्थिति चिंताजनक है. पब्लिक-प्राइवेट भागीदारी से कुछ आपात सेवाएं राज्यों में जरूर संचालित की जा रही हैं लेकिन इनकी सघन व्याप्ति नहीं है और इन तक पहुंचना साधारण लोगों के लिए आसान नहीं रहता. भारी भरकम खर्च के बावजूद लोग पांच सितारा निजी अस्पतालों में जाते हैं, अपनी विवशता से और सरकारी अस्पतालों के प्रति अविश्वास की वजह से भी.

इस सिलसिले में क्यूबा जैसे छोटे से देश का उल्लेख प्रासंगिक होगा जिसने अपनी चिकित्सा और स्वास्थ्य सुविधाओं को दुनिया की अग्रिम पंक्ति में ला खड़ा किया है. क्यूबा ने स्वास्थ्य सेवा को जनभागीदारी, जनचेतना और नागरिक अधिकार के साथ पिरोया है. आज दुनिया में उसके डॉक्टरों और नर्सिंग स्टाफ की धूम है तो उसकी वजह यही है कि वो इंडस्ट्री के तौर पर भी सफल होने के बावजूद मुनाफे की मशीन में तब्दील नहीं हुआ. ये जवाबदेही वहां सुनिश्चित की गई है. जिसका हम भारत जैसे देशों में अभाव देखते हैं.

राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति के पॉलिसी डॉक्युमेंट में महिलाओं की स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच से जुड़े मुद्दों का सतही तौर पर उल्लेख किया गया है. अस्पतालों में लिंग आधारित हिंसा, आपात सेवा और आपदा की तैयारियां, उपचार की स्थानिक पद्धतियों का निर्धारण, मनोरोग संबंधी मामलों पर विचार, जीवन प्रत्याशा लक्ष्य को 67.5 से बढ़ाकर 2025 तक 70 तक पहुंचाने का रास्ता, और राज्यों के स्वास्थ्य बजट में बढ़ोत्तरी - सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़े और भी कई ऐसे मुद्दे हैं जो नई स्वास्थ्य नीति में लगभग अनछुए ही हैं. उन पर चर्चा तो है लेकिन वो नाकाफी है.

दिसंबर 2016 में जारी, भारत के रजिस्ट्रार जनरल के आंकड़े दिखाते हैं कि देश में शिशु मृत्यु दर (आईएमआर) 2015 में घट कर 37 हो गई है, ग्रामीण क्षेत्रों में 41 और शहरी क्षेत्रों में 25. लेकिन ये नाकाफी है. सहस्त्राब्दी लक्ष्य 27 का था लेकिन उसमें भी नाकाम रह गए. मजे की बात ये है कि उपरोक्त आंकड़ा तो सिर्फ 21 बड़े राज्यों का है. बाकी छोटे राज्य और केंद्र शासित प्रदेश तो इसमें हैं ही नहीं. विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों के मुताबिक भारत में जिन स्वास्थ्य कारणों से लोगों की मौत होती है, उनमें दिल की बीमारियों से मरने वाले करीब साढ़े 12 फीसदी हैं. इसके बाद डायरिया, सांस की तकलीफ और टीबी जैसी बीमारियों से होने वाली मौतें हैं. इस तरह के बहुत से गैरसरकारी और सरकारी आंकड़े हैं जो कुछ मामलों में अगर तस्वीर का उजला पहलू दिखाते हैं, तो कई मामले ऐसे हैं जो उन्हें स्याह बनाते हैं.

हाल के कुछ स्वैच्छिक अध्ययन बताते हैं कि बेशक प्राइमरी हेल्थ सेंटर ग्रामीण इलाकों में बने हैं लेकिन ये सेंटर, नागरिकों की स्वास्थ्य गुणवत्ता की हिफाजत की गारंटी नहीं हैं. इसी तरह डिग्रीधारी डॉक्टर हैं लेकिन उनकी योग्यता का कितना संबंध व्यवहारिक ज्ञान और रोजमर्रा के अभ्यास से है, ये भी देखने की जरूरत है. भारत एंटीबॉयोटिक की खपत का एक विशाल उपभोक्ता बाजार यूं ही नहीं बना है. हर मर्ज के लिए एंटीबॉयोटिक दवाओं को एक आसान और कारगर नुस्खे के रूप में मरीजों को देने की परिपाटी जारी है. दूसरी बात ये है कि स्वास्थ्य को लेकर नागरिकों के बीच जो भी अध्ययन हो रहे हैं उनके नतीजे बिखरे हुए हैं, कोई एक केंद्रीकृत व्यवस्था बनानी चाहिए जहां स्वास्थ्य और पोषण से जुड़ा हर डाटा उपलब्ध हो, और फिर इसके विश्लेषण से आगामी तैयारियां की जाएं.

बेहतर स्वास्थ्य की गारंटी कोई नारा नहीं है, ये जरूरत भी है और अधिकार भी. अगर भारत को एक उन्नत देश के रूप में खड़ा करने का सपना आज का निजाम देखता है तो ये भी देखना चाहिए कि उन्नति के रास्ते को सुगम बनाने में क्या चीजें रोड़ा अटका रही हैं. स्वास्थ्य को उद्योग का दर्जा बेशक दीजिए लेकिन इसके अजेंडे में नागरिक जवाबदेही को सबसे ऊपर रखिए.

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