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विज्ञान

नमूने इकट्टे करने के लिए बायोबैंक

म्युनिख के हेल्महोल्त्ज़ सेंटर में स्वास्थ्य और पर्यावरण के बीच रिश्तों पर शोध किए जाते हैं. यहां रक्त, मूत्र और कोशिकाओं के हज़ारों नमूने इकट्ठे किए गए हैं, ताकि बीमारियों पर पर्यावरण के प्रभाव की जांच की सके.

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मिसाल के तौर पर देखा जाता है कि कैंसर के कुछ रोगियों पर प्रचलित दवाइयों का असर नहीं होता. अक्सर आनुवंशिक तत्वों के कारण ऐसा होता है. इस बीच पर्यावरण का प्रभाव भी देखा जा रहा है. इनका अध्ययन रक्त, मूत्र या कोशिकाओं की जांच के ज़रिये ही संभव है. हेल्महोल्त्ज़ सेंटर में एक बायोबैंक में हज़ारों लोगों के ऐसे नमूने इकट्ठे किए गए हैं.

Doping, Urinproben

कई तरह के नमूने यहां इकट्ठे किए गए हैं.

बायोकेमिस्ट डॉक्टर गाब्रिएले मोएलर बताती हैं कि कैसे इन नमूनों को सुरक्षित ढंग से रखा जाता है."यहां डीपफ़्रीज़र मौजूद हैं, जिनमें इन्हें रखा जाता है. कुछ एक का तापमान है माइनस 80 डिग्री, कुछ के माइनस 20 डिग्री. और ये नाइट्रोजन के टैंक हैं."

नाइट्रोजन टैंक, यानी इस्पात के आदमकद टैंक, जिनका तापमान शून्य से 160 डिग्री नीचे है. इनमें तरल नाइट्रोजन भरी है. यहां बायो नमूने रखे जाते हैं, जिनमें से कुछ दसियों साल पुराने हैं. वैज्ञानिकों की नज़र में अमूल्य, इसलिए इन्हें तालाबंद करके रखा जाता है. हेल्महोल्त्ज़ सेंटर इस प्रकार का अकेला संस्थान नहीं है. माक्स प्लांक संस्थान, फ़्राउएनहोफ़र सोसाइटी जैसे संस्थानों और विश्वविद्यालयों में भी ऐसे बायोबैंक बनाए गए हैं. वैज्ञानिकों को इन नमूनों से पता नहीं चलता है कि ये किसके हैं, लेकिन उनकी उम्र, लिंग, उनकी बीमारियों के इतिहास और दूसरी जानकारियां दी जाती हैं. इनके बारे में येना विश्वविद्यालय के डॉक्टर मिषाएल कीनटोप्फ़ कहते हैं "एक तालिका होती है, जिसमें हर नमूने के लिए नंबरों का एक कोड होता है. नमूना देने वाले हर व्यक्ति का सिर्फ़ एक नंबर होता है. यह तालिका एक नोटारी के पास होती है, जहां नमूना देने वाले व्यक्ति को पता चल सकता है कि उसके नमूने का कौन सा नंबर है. यानी बायोबैंक में हम बता नहीं सकते कि कौन सा नमूना किस व्यक्ति का है."

इस प्रकार नमूना देने वाले व्यक्ति का परिचय छिपा रहता है, लेकिन दूसरी ओर, अगर वह चाहे, तो नोटारी की मदद से अपना नमूना वापस ले सकता है. ऐसा शायद ही होता है, लेकिन कानूनी तौर पर इसकी व्यवस्था ज़रूरी है.

रिपोर्टः उज्ज्वल भट्टाचार्य

संपादनः आभा एम

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