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दुनिया

नगा विद्रोहियों से वार्ता से पहले गतिरोध

पूर्वोत्तर राज्य नगालैंड में शांति की बहाली के लिए हुए समझौते के प्रारूप पर केंद्र सरकार और उग्रवादी संगठन नेशनल लिबरेशन फ्रंट आफ नगालैंड (इसाक-मुइवा गुट) के बीच होने वाली बातचीत में फिर गतिरोध पैदा हो गया है.

बीते सप्ताह की बैठक में नगा संगठनों ने अलग संविधान का यह मुद्दा उठाया था. अब यह बातचीत मंगलवार (कल) को दोबारा होगी. दूसरी ओर, नगालैंड के मुख्यमंत्री टी.आर. जेलियांग ने कहा है कि नगा समस्या के स्थायी राजनीतिक समाधान के लिए तमाम नगा गुटों को भरोसे में लेना जरूरी है. जेलियांग कहते हैं, "नगा समस्या के स्थायी समाधान से पूरे पूर्वोत्तर इलाके में शांति बहाली का रास्ता साफ हो जाएगा."

गतिरोध

पिछली बैठक में बातचीत के दौरान नगाबहुल इलाकों के एकीकरण और अलग झंडे जैसे जटिल मुद्दों को तो सुलझा लिया गया था. लेकिन दिल्ली में ताजा दौर की बातचीत में नगा समूहों की ओर से अलग संविधान की मांग उठाने की वजह से शांति प्रक्रिया में गतिरोध पैदा हो गया है.एनएससीएन (आईएम) के एक वरिष्ठ नेता का कहना है कि नगाओं के लिए अलग संविधान की मांग पर दोनों पक्षों में गतिरोध पैदा हो गया है.

उक्त बैठक में संगठन की ओर से टी. मुइवा शामिल थे और केंद्र की ओर से पर्यवेक्षक आर.एन.रवि. रवि ने नगा प्रतिनिधियों से इस मुद्दे पर विस्तार से बातचीत की. अब अगली बैठक मंगलवार को होनी है. एक नगा नेता ने कहा कहते हैं कि अलग संविधान की मांग पर कोई समझौता नहीं हो सकता. नगा लोग कभी भारतीय संविधान स्वीकार नहीं करेंगे. उनका दावा है कि नगा हितों की सुरक्षा के लिए अलग संविधान जरूरी है.

एनएससीएन (आईएम) के सूत्रों ने बताया कि नगालिम यानी नगालैंड के लिए अलग झंडे का मुद्दा सुलझ गया है. नगा संगठन ने कहा है कि उसके कैडर अपने हथियार भी नहीं डालेंगे. अलग राज्य के गठन के बाद उनको सेना व सीमा सुरक्षा बल के तौर पर भर्ती किया जाएगा. सूत्रों ने बताया कि केंद्र के वार्ताकार आर.एन.रवि दूसरे नगा गुटों के भी संपर्क में हैं. इनमें एनएससीएन (एकीकरण) के अलावा नगा नेशनल काउंसिल शामिल हैं. जानकारों का कहना है कि केंद्र व एनएससीएन शांति प्रक्रिया को शीघ्र पूरा करने पर जोर दे रहे हैं. लेकिन कई नगा गुटों को इसकी कामयाबी पर संदेह है.

कोई समयसीमा नहीं

पहले कहा जा रहा था कि केंद्र व नगा संगठन के बीच स्थायी शांति समझौते को अंतिम स्वरूप देने के लिए अगले महीने यानी सितंबर तक की समयसीमा तय की गई है. लेकिन केंद्र और एनएससीएन (आई-एम) दोनों ने इन खबरों को निराधार करार दिया है. केंद्रीय वार्ताकार रवि कहते हैं, "नगा संगठन के शांति समझौते की प्रक्रिया सुचारू रूप से बढ़ रही है. लेकिन फिलहाल इसके लिए कोई समसीमा नहीं तय की गई है. मौजूदा हालात में यह संभव भी नहीं है." मौजूदा गतिरोध के बारे में उनका कहना था कि ऐसी कोई गंभीर समस्या नहीं है. बातचीत के दौरान कई मुद्दे सुलझाए जा सकते हैं. वह कहते हैं कि सरकार नगा समस्या के स्थायी समाधान के लिए इलाके के तमाम संगठनों को भरोसे में लेने पर विचार कर रही है. स्थायी समझौते पर हस्ताक्षर से पहले तमाम नगा संगठनों की राय पर विचार किया जाएगा.

नगालैंड के मुख्यमंत्री टी. आर. जेलियांग कहते हैं, "सिर्फ समाधान के नारे से नगा समस्या का समाधान नहीं होगा. लेकिन इस जटिल समस्या को सुलझना के लिए एक फार्मूला बनाना जरूरी है." जेलियांग का कहना है कि केंद्र सरकार नगाओं के अनूठे इतिहास से अवगत है और एनएससीएन (आई-एम) भी सरकार की दिक्कतों व मजबूरियों को समझता है. उन्होंने कहा कि एनएससीएन (आईएम) को अच्छी तरह पता है कि इस समस्या के समाधान का असली रास्ता क्या है. जेलियांग भी मानते हैं कि इस समझौते को अंतिम स्वरूप देने से पहले तमाम प्रमुख नगा संगठनों की राय को तरजीह दी जानी चाहिए. इसके बिना कोई भी समाधान स्थायी नहीं हो सकता.

 पुराना है विवाद

नगा विवाद बेहद पुराना है. इलाके के नगा संगठन देश की आजादी के बाद से ही संप्रभुता की मांग में आंदोलन करते रहे हैं. नगा संगठन नगा नेशनल कांउसिल (एनएनसी) ने देश से अलग होकर अलग राष्ट्र के गठन के लिए आजादी के बाद से ही हिंसा का सहारा लिया था. हालांकि शांति बहाली के लिए बाद में इस संगठन ने केंद्र सरकार के साथ शिलांग समझौते पर हस्ताक्षर किए थे. बावजूद इसके कुछ साल बाद इस मांग ने फिर सिर उठाना शुरू किया.

शिलांग समझौते के विरोध में एनएनसी से जु इसाक चिशी स्वू, टी. मुइवा और एसएस खापलांग ने एनएनसी से नाता तोड़ कर होकर 1 जनवरी 1980 को एनएससीएन का गठन किया था. लेकिन बाद में एक बार फिर भारत सरकार से बातचीत के मुद्दे पर इस संगठन में दरार पड़ गई और खापलांग ने 30 अप्रैल 1988 को अपना अलग गुट बना लिया. यह दोनों संगठन पूर्वोत्तर में असम, मणिपुर व अरुणाचल प्रदेश के नगाबहुल इलाकों को लेकर ग्रेटर नगालैंड या नगालिम के गठन की मांग करते रहे हैं.

नब्बे के दशक के आखिर में केंद्र ने एनएससीएन के इसाक-मुइवा गुट के साथ युद्धविराम पर हस्ताक्षर किए थे. उसी समय से जारी शांति प्रक्रिया अब तक अपने मुकाम पर नहीं पहुंची है. बाद में वर्ष 2001 में कापलांग गुटे के साथ भी युद्धविराम पर हस्ताक्षर किए गए. लेकिन यह गुट बार-बार इसका उल्लंघन करता रहा है.

राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि एनएससीएन (आईएम) पर भी शांति समझौते को अंतिम स्वरूप देने को लेकर भारी दबाव है. संप्रभुता समेत दूसरे मुद्दों पर समझौते की स्थिति में इलाके में शांति बहाली की दो दशक पुरानी कवायद के खतरे में पड़ने का अंदेशा है. यही वजह है कि दोनों पक्ष काफी फूंक-फूंक कर कदम बढ़ा रहे हैं. शायद इसीलिए दोनों पक्ष बातचीत के जरिए तमाम गतिरोधों को दूर करने का दावा कर रहे हैं. इसके साथ ही बातचीत के नतीजों को भी गोपनीय रखा जा रहा है. पर्यवेक्षकों का कहना है कि इस प्रक्रिया को लंबा खींचने की बजाय शीघ्र किसी ठोस नतीजे पर पहुंचना ही इलाके में शांति की बहाली के हित में होगा.

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