नक्सली शिविरों में यौन शोषण की दास्तान | ताना बाना | DW | 14.05.2010
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ताना बाना

नक्सली शिविरों में यौन शोषण की दास्तान

क्या अब अपने महिला कैडरों के प्रति नक्सलियों का रवैया बदल रहा है? उड़ीसा में हाल में पुलिस के सामने हथियार डालने वाली नक्सली महिलाओं के आरोपों से तो यही सवाल पैदा होता है.

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नक्सली अभियानों में महिलाओं की बराबरी की भूमिका रही है

इन महिलाओं ने विभिन्न नक्सली शिविरों में बड़े नेताओं पर यौन शोषण के आरोप लगाए हैं. उड़ीसा के रायगढ़ जिले की लक्ष्मी पीड़ीकाका हो या क्योंझर जिले की सविता मुंडा,सबके आरोप एक जैसे हैं. नक्सली शिविरों में आए दिन होने वाले यौन शोषण के चलते नक्सली आदर्शों से इन महिलाओं का मोहभंग हो गया है.

17 साल की लक्ष्मी 14 साल की उम्र में संगठन में शामिल हुई थी. वह कहती है," मैं एक उड़िया व्यक्ति से शादी करना चाहती थी, लेकिन संगठन के लोग मेरी शादी जबरन छत्तीसगढ़ के एक हिंदी भाषी व्यक्ति से करना चाहते थे. हम दोनों एक-दूसरे की भाषा तक नहीं समझते थे. नेताओं को डर था कि शादी के बाद मैं संगठन छोड़ सकती हूं."

वह कहती है कि शिविरों में रात को बड़े नेता दुर्व्यव्हार करते थे. लक्ष्मी ने तीन साल के दौरान कई बड़े अभियानों में हिस्सा लिया था. रायगढ़ के के पुलिस अधीक्षक अनूप कृष्ण बताते हैं कि लक्ष्मी कई अभियानों में हिस्सा ले चुकी है. पूछताछ के बाद इस मामले में और खुलासा होने की उम्मीद है.

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उड़ीसा में कई महिला नक्सलियों ने हथियार डाले

झारखंड की सीमा से सटे क्योंझर जिले में हथियार डालने वाली सविता मुंडा की कहानी भी लक्ष्मी से मिलती है. वह बताती है कि शिविरों में हमारा शारीरिक शोषण होता था. "मैंने जब संगठन के बड़े नेताओं को इस बात की जानकारी दी तो उन्होंने मुझे मुंह बंद रखने की सलाह दी. उसके बाद ही मैंने सरेंडर करने का फैसला किया."

सविता की साथी अंजु मुर्मू को तो यौन शोषण की वजह से दो बार गर्भपात कराना पड़ा. क्योंझर की मालिनी होसा और बेला मुंडा की कहानी भी लगभग ऐसी ही है.

दो-तीन साल में ही नक्सली आदर्शों से इन सबका भरोसा उठ गया. नक्सली शिविरों में महिलाओं की ऐसी हालत तब है जब संगठन में उनकी तादाद सैकड़ों में हैं और वे पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिला कर खतरनाक अभियानों को अंजाम देती रही हैं.

अगर इन महिलाओं के आरोपों में जरा भी सच्चाई है तो यह खुलासा नक्सिलयों के लिए घातक साबित हो सकता है. इससे उनकी साख पर बट्टा तो लगेगा ही, ग्रामीण इलाकों में पिछले दिनों में उन्होंने जो जनाधार बनाया है वह भी ख़त्म हो सकता है.

  • तारीख 14.05.2010
  • रिपोर्ट रिपोर्टः प्रभाकर, उड़ीसा से (संपादनः आभा मोंढे)
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  • पर्मालिंक http://p.dw.com/p/NN7e

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