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दुनिया

"नक्सलियों ने ग्रामीणों को ढाल बनाकर हमला किया"

नक्सलियों ने गांव के लोगों को ढाल बनाकर सीआरपीएफ के जवानों पर हमला किया. छत्तीसगढ़ के सुकमा में हुए नक्सली हमले के लिए एक सुरक्षा विशेषज्ञ ने खुफिया तंत्र की नाकामी को जिम्मेदार ठहराया है.

नक्सली हमले में घायल हुए सीआरपीएफ के जवान शेर मोहम्मद के मुताबिक, "नक्सलियों ने पहले गांव वालों को हमारी लोकेशन की टोह लेने के लिए भेजा. फिर हमने देखा कि 100 से 150 ग्रामीण हमारी तरफ आ रहे हैं. उनके पास हथियार नहीं थे. उन पर हम गोली कैसे चलाते?” शेर मोहम्मद का दावा है कि नक्सलियों के पास रॉकेट लॉन्चर और एके-47 जैसे हथियार थे.

मोहम्मद सीआरपीएफ की 74वीं बटालियन के जवान हैं. सोमवार दोपहर छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले में हुए नक्सली हमले में उनके 25 साथी जवान मारे गए. मंगलवार को केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह भी छत्तीसगढ़ पहुंचे. रायपुर में उन्होंने घायलों व राज्य के मुख्यमंत्री से मुलाकात की. राजनाथ सिंह ने सख्त लहजे में कहा कि इस हमले के दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा.

इतना बड़ा हमला आखिर हुआ कैसे, यह सवाल सबके मन में है. इस तरह के मामलों पर नजर रखने वाले सिक्योरिटी एक्सपर्ट अजीत कुमार सिंह ने इस हमले को खुफिया एजेंसियों की नाकामी करार दिया है. सिंह के मुताबिक मार्च में भी ठीक इसी जगह पर माओवादियों ने घात लगाकर हमला किया था. सिंह ने कहा, "घने जंगल वाले इलाके में भारी पैमाने पर हथियारों से लैस करीब 300 लोगों की हलचल कैसे किसी की नजर में नहीं आयी? इंटेलिजेंस ऑपरेटिव्स क्या कर रहे थे.” दिल्ली स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ कॉन्फ्लिक्ट मैनेजमेंट के रिसर्च फेलो अजीत सिंह ने इसे बेहद बुनियादी चूक करार देते हुए कहा, "हर कोई जानता है कि वहां हर समय खतरा रहता है लेकिन फिर भी खास जानकारी गायब रही.”

Indien Maoisten Guerrilla (Getty Images/AFP/N. Seelam)

बिहार, ओडिशा, झारखंड, छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र में सक्रिय हैं नक्सली

भारत के माओवादी खुद को आदिवासियों और हाशिये पर जा चुके समाज के लिए लड़ने वाले योद्धा कहते हैं. 1960 के दशक से ही भारत में उन्होंने सशस्त्र संघर्ष छेड़ रखा है. इस संघर्ष में अब तक 10,000 से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं. नक्सलियों को भारत की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा माना जाता है.

जंगलों में अपने कैंप चलाने वाले माओवादी आम तौर पर गांव वालों से सुरक्षा के नाम पर पैसा भी मांगते हैं. वे गांव के युवा लड़के लड़कियों को भी अपनी रैंक में शामिल करते हैं. कथित तौर पर माओवादी पिछड़े इलाकों में सड़कें और आधारभूत ढांचे के विकास के काम का भी विरोध करते हैं.

2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से माओवादी ज्यादा बेचैन हुए हैं. मोदी हिंसाग्रस्त इलाकों में विकास की परियोजनाओं को तेज कर और पुलिस को बेहतर करने पर जोर दे रहे हैं. सरकार को लगता है कि पिछड़े इलाकों को विकास की मुख्यधारा में जोड़ने से हिंसा में कमी आएगी. बीते दो साल में माओवादियों ने बड़ी संख्या में आत्मसमर्पण भी किया है.

अजीत सिंह के मुताबिक, "वे खुद को अलग थलग महसूस करने लगे हैं. जब भी कोई उग्रवादी संगठन बेचैन होता है, तो वह सुर्खियों में आने के लिए इस तरह के बड़े हमले करने की कोशिश करता है. और, माओवादियों ने इस बार बिल्कुल यही किया है.”

(सबसे घातक आतंकवादी संगठन​​​​​​​)

 

ओएसजे/आरपी (पीटीआई, एएफपी)

 

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