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दुनिया

नए संविधान पर जनमत संग्रह

चार साल की खींचतान के बाद तैयार जिम्बाब्वे ने नए संविधान पर शनिवार को जनमत संग्रह हो रहा है. संविधान पारित होने पर अलग थलग पड़े इस अफ्रीकी देश में बड़े परिवर्तनों की उम्मीद की जा रही है.

नए संविधान में नागरिकों के मौलिक अधिकारों में संशोधन का प्रस्ताव है, लेकिन 33 साल से शासन कर रहे रॉबर्ट मुगाबे को और चुनाव लड़ने से रोका नहीं जाएगा. दक्षिणवर्ती अफ्रीका के इस देश में एक दशक की अशांति के बाद स्थिरता की उम्मीद कर रही विदेशी ताकतें चाहती हैं कि इस साल जिम्बाब्वे में होने वाले संसदीय और राष्ट्रपति चुनाव से पहले नया संविधान लागू हो जाए.

इस समय जिम्बाब्वे भारी आर्थिक तंगी से गुजर रहा है. जिम्बाब्वे के पास खुद जनमत संग्रह करवाने के भी पैसे नहीं थे. संविधान तैयार करने का खर्च संयुक्त राष्ट्र के नेतृत्व अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने उठाया है, लेकिन आम चुनाव के खर्च का फैसला नहीं हुआ है. नए संविधान को बनाने में की प्रक्रिया में पांच करोड़ डॉलर की धनराशि खर्च होने की बात की जा रही है.

समर्थन और विरोध

देश की तीनों बड़ी पार्टियों प्रस्तावित संविधान का समर्थन कर रही हैं. उम्मीद की जा रही है कि यह बड़ी आसानी से पास हो जाएगा. राष्ट्रपति मुगाबे के गठवंधन सहयोगी प्रधानमंत्री मॉर्गन स्वांगिराई और उनकी एमजीसी पार्टी भी नए संविधान के साथ है. 2008 में चुनाव के बाद हुई हिंसा में दोनों ही पार्टियों के सहयोगी शामिल थे. इसके बाद अंतरराष्ट्रीय दबाव के चलते मुगाबे और स्वांगिराई ने गठबंधन कर लिया. अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के दबाव में ही अब नए संविधान का मसौदा तय किया गया है.

हालांकि कुछ नागरिक अधिकार संगठन इसका विरोध भी कर रहे हैं और उन्होंने लोगों से इसके पक्ष में वोट न देने की मांग की है. लेकिन वे स्वीकार करते हैं कि उनके पास इस पर बड़ी मुहिम छेड़ने के पैसे नहीं है. नए संविधान का विरोध करने वालों में से एक नेशनल कॉंस्टिट्यूशनल एसेम्बली भी है. इसके प्रमुख लवमोर मढुकू कहते हैं, "संविधान का मसौदा मौजूदा संविधान से जरा भी बेहतर नहीं है.

आम लोगों में संविधान में संशोधन को लेकर कोई खास उत्साह दिखाई नहीं दे रहा है. यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाले मार्क कसीमो कहते हैं, "मैने मसौदा पढ़ा नहीं है. मुझे लगता है राजनीतिक पार्टियां चाहती हैं कि हम इसके पक्ष में वोट दें. मुझे नहीं लगता मैं ऐसा करूंगा. हो सकता है मैं मतदान में हिस्सा ही न लूं." निर्वाचन अधिकारियों का कहना है कि वे इस चुनाव प्रक्रिया में बारह लाख में से सिर्फ पांच लाख लोगों के ही हिस्सा लेने की उम्मीद कर रहे हैं.

महिलाओं को ज्यादा अधिकार

जिम्बाब्वे को नया संविधान तैयार करने में तीन साल का समय लगा. लोगों को चुनाव से पहले ही इसे पढ़ने और समझने का समय देने के लिए 115 पन्नों के इस दस्तावेज को फरवरी के शुरु में रिलीज कर दिया गया था. यूनिवर्सिटी स्नातक इवोन माशायामोम्बे ने डॉयचे वेले से कहा, "महिलाओं को इस संविधान से ज्यादा फायदे होंगे, इसलिए मैं इसके पक्ष में वोट करूंगी." उन्होंने बताया कि एक जेंडर कमीशन भी होगा जिसकी वजह से महिलाओं का हर स्तर पर प्रतिनिधित्व होगा. नए संविधान के अनुसार संसद की 150 में से 60 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी.

संभावनाएं

नए संविधान में राष्ट्रपति के अधिकारों में कटौती की जाएगी. देश की खुफिया एजेंसियों और सेना पर भी राष्ट्रपति का प्रभाव कम हो जाएगा. राष्ट्रपति का कार्यकाल भविष्य में पांच साल के दो कार्यकालों तक सीमित रहेगा. लेकिन इस संशोधन का 89 वर्षीय राष्ट्रपति मुगाबे पर कोई असर नहीं पड़ेगा, क्योंकि यह अतीत के लिए लागू नहीं होगा.

जनमत संग्रह औऱ आगामी चुनाव में पश्चिमी देशों के चुनाव पर्यवेक्षकों की भागीदारी पर जिम्बाब्वे सरकार ने रोक लगा दी है. हालांकि मानवाधिकार संगठन नहीं चाहते कि लोग जनमत संग्रह में हिस्सा लें लेकिन जानकारों का मानना है कि लोग इसके समर्थन में वोट देंगे. जिस बात पर ज्यादा संदेह है वह है राष्ट्रपति मुगाबे का भविष्य.

हैम्बर्ग के गीगा इंस्टीट्यूट में अफ्रीका एक्सपर्ट क्रिस्टियान फॉन सोएस्ट का मानना है कि वह खुद ही रिटायरमेंट ले लेंगे. सवाल यह उठता है कि ऐसी कौन सी परिस्थिति होगी जिसमें राष्ट्रपति सम्मान के साथ पद छोड़ सकें. जुलाई में देश में प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव होने हैं. सोलह मार्च के मतदान के बाद ही देश के भविष्य की दिशा निर्धारित होगी.

एसएफ/एमजे (डीपीए, एएफपी)

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