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मनोरंजन

नए मिशन पर हैं नंदिता

फायर जैसी बोल्ड और विवादास्पद फिल्म से अपने करियर की शुरूआत करने के बाद ज्वलंत सामाजिक मुद्दों को उठाने वाली फिल्मों में अर्थपूर्ण भूमिकाएं निभा कर अपनी एक अलग पहचान बनाने वाली अभिनेत्री नंदिता दास अब एक नए मिशन पर हैं.

वह मिशन है स्टेज के जरिए समाज में व्याप्त लैंगिक असमानता के संवेदनशील मुद्दे को उठाने का. अपनी थिएटर कंपनी छोटी प्रोडक्शन कंपनी के पहले नाटक विटवीन द लाइंस के जरिए नंदिता पहली बार नाटक के निर्देशन के क्षेत्र में उतर रही हैं. उन्होंने अपने पति सुबोध मस्करा के साथ मिल कर इस नाटक में अभिनय भी किया है. नंदिता कहती हैं कि निर्देशन भी लोगों तक अपनी बात पहुंचाने का एक सशक्त जरिया है. उनका यह नाटक लैंगिक असमानताओं के उलझाव को सामने रखता है. नाटक के मंचन के लिए कोलकाता पहुंची नंदिता ने इस नाटक और अपने करियर के बारे में डायचे वेले से बातचीत की.

नाटक के निर्देशन का ख्याल कैसे आया?

रंगमंच अपनी बात कहने का एक सशक्त माध्यम है. इसलिए मैंने अपनी कंपनी के बैनर तले यह पहला नाटक खुद दिव्या के साथ मिल कर लिखा. बाद में इसमें अभिनय का भी फैसला किया. मेरे पति भी इसमें मुख्य किरदार निभा रहे हैं. निर्देशन की सबसे बड़ी खासियत यह है कि आप अपने तरीके से विचारों को मंच पर मूर्त रूप दे सकते हैं. दूसरे के निर्देशन में आप चीजों को उस परिप्रेक्ष्य में पेश नहीं कर पाते, जैसा चाहते हैं. इसलिए मैंने खुद ही इसके निर्देशन का फैसला किया.

Filmfestival in Cannes 2005 Jury Eröffnung

कान महोत्सव में खावियर बारदेम के साथ

लेकिन फिराक के निर्देशन के बाद आपने कहा था कि यह काम अभिनय से ज्यादा कठिन है. फिर भी आप नाटक का निर्देशन कर रही हैं?

हां, यह बात काफी हद तक सही है. फिर भी मुझे यह काम दिलचस्प और चुनौतीपूर्ण लगता है. मैंने पहले भी नुक्कड़ नाटकों में काम किया है. उनमें अभिनय करते हुए अक्सर महसूस किया था कि अगर कहानी मैं अपने तरीके से कहूं तो बेहतर तरीके से कह सकती हूं और मजा भी ज्यादा आएगा.

इस नाटक की थीम क्या है?

‘बिटवीन द लाइंस' एक समसामायिक नाटक है. इसकी कहानी शहरी लोगों के बीच व्याप्त असमानता पर आधारित है. समाज के ऊंचे तबके के लोगों को इस बात का अंदाजा नहीं है कि हमारे समाज में लैंगिक असमानता जैसी बुराई अब भी मौजूद है. इस नाटक के केंद्र में एक दंपति है जो खुद को आधुनिकता और परंपराओं के बीच उलझा हुआ पाता है. नाटक अंग्रेजी में है क्योंकि जिन लोगों को ध्यान में रख कर इसे लिखा गया है, उनके लिए अंग्रेजी ही समुचित भाषा है. नाटक में मैंने और सुबोध ने उस दंपति की भूमिका निभाई है.

फिल्मों में कैसे आईं. क्या पहले से ही सोच रखा था कि अभिनय के क्षेत्र में जाना है?

मैंने कभी फिल्मों में काम करने के बारे में सोचा भी नहीं था. मैंने तो एमए पास करने के बाद कुछ दिनों तक एक स्कूल में पढ़ाया. फिर सोचा कि लोगों के बीच काम करना चाहिए. मैं एक गैर-सरकारी संगठन के साथ काम कर रही थी. फिल्मों में आना तो महज एक इत्तफाक था. संगठन में औरतों के विषय पर बहुत काम करती थी. मैंने एक छोटी सी फिल्म की थी 'एक थी गुंजा'. वह फिल्म एक आदिवासी औरत की सच्ची कहानी पर आधारित थी. उसकी चर्चा दीपा मेहता तक पहुंची और उन्होंने मुझे फायर में काम करने का प्रस्ताव दे दिया. बाद में लगा कि अभिनय भी अपनी बात को कहने का एक जरिया है.

Shabana Azmi

फायर की सहअभिनेत्री शबाना आजमी

फायर जैसी बोल्ड फिल्म से करियर की शुरूआत करने की वजह से कैसी मुश्किलों का सामना करना पड़ा?

वह एक अछूता विषय था. उसके बारे में जानते तो सब थे. लेकिन खुल कर कोई चर्चा नहीं करना चाहता था. काफी उदार विचारधारा के होने के बावजूद मेरे घरवाले भी कभी समलैंगिकता पर चर्चा नहीं करते थे. उस समय के लिहाज से फिल्म की थीम काफी बोल्ड थी. मेरे घरवालों ने इस पर कोई आपत्ति नहीं जताई. वह मानते थे कि सबको अपने तरीके से जीने का अधिकार है. मुझे भी लगा था कि ऐसी फिल्म करने पर मुश्किलों का सामना जरूर करना होगा. लेकिन इस कदर विवाद होगा, इसका अनुमान तक नहीं था.

आपने अपने करियर में व्यावसायिक सिनेमा से हमेशा एक दूरी बनाए रखी है. इसकी कोई खास वजह?

कोई खास वजह नहीं है. शायद परवरिश की वजह से ऐसा है. मैंने बचपन से ऐसी फिल्में नहीं देखी. मेरे माता-पिता ऐसी फिल्में नहीं देखते थे. शायद यह भी एक वजह रही होगी. इसलिए शुरू से ही व्यावसायिक फिल्मों के प्रति मेरा झुकाव नहीं रहा. दरअसल, मैं वही फिल्में करना चाहती हूं जिनसे खुद को जोड़ सकूं. जहां तक फिल्मों के थीम की बात है तो मेरी राय में हर इंसान के अंदर कई चीजें छिपी होती हैं.

क्या सामाजिक सक्रियता का आपके अभिनय पर भी असर पड़ा है?

ऐसा होना तो स्वाभाविक ही है. मैं पूरी तरह सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता तो नहीं हूं. लेकिन मैंने सामाजिक मुद्दों पर काम किया है और ऐसे लोगों से जुड़ी रही हूं. जाहिर है संगत का असर तो पड़ेगा ही. भूमिकाओं के चयन में भी कहीं न कहीं अवचेतन मन में यह बात रहती है. मैंने औरतों के मुद्दों पर ज्यादा काम किया है इसलिए मुझे ऐसी भूमिकाएं आकर्षित करती हैं.

थिएटर और फिल्मों में क्या अंतर है?

थिएटर में अच्छा बुरा तुरंत दिख जाता है. लेकिन फिल्मों में रीटेक के जरिए उसे सुधार सकते हैं. थिएटर में आप कुछ लोगों तक ही पहुंच सकते है, जबकि फिल्म के जरिए आप एक ही साथ करोड़ों लोगों तक पहुंचने में कामयाब हो जाते हैं. कई ऐसी बातें है जो आप कहना चाहते हैं, बांटना चाहते हैं और इसके लिए सिनेमा बेहद सशक्त माध्यम है.

इंटरव्यू: प्रभाकर, कोलकाता

संपादन: महेश झा

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