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मनोरंजन

नए खून के नए फॉर्मूलों से बनता नया बॉलीवुड

दो किसिंग सीन, चार कार रेस, छह गाने और आठ फाइट सीन. इनके इर्द गिर्द एक प्रेम कहानी बुनकर फिल्म का नाम दे देने वाला बॉलीवुड क्यों पीपली लाइव, तेरे बिन लादेन और दाएं या बाएं जैसी फिल्में बना रहा है?

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बदलता बॉलीवुड

बॉलीवुड का फॉर्मूला बदल रहा है. नया फॉर्मूला है कुछ अलग. और यह कुछ अलग करने वाले नए निर्देशक इस बदलाव का पूरा श्रेय भारतीय दर्शक को देते हैं. उनका कहना है कि भारत के दर्शक का टेस्ट अब बदल चुका है.

ताजा हवा

हाल के कुछ सालों में और खासतौर पर पिछले साल कई ऐसी फिल्में आईं और हिट हुईं जिनमें बॉलीवुड के चलताऊ फॉर्मूला नहीं थे. फंस गया रे ओबामा, दो दूनी चार, तेरे बिन लादेन और उड़ान जैसी फिल्में एक ताजा बयार की तरह आईं और बॉलीवुड की फिजा को बदल कर चली गईं. नई कहानी और उसे कहने का नया अंदाज नए खून की रवानी से निकला है. और बॉलीवुड के उस 'इलीट' को चुनौती दे रहा है जो आज भी अपनी पुरानी हिट फिल्मों के सीक्वल या रीमेक बनाकर पैसा कमाने में लगा है.

Flash-Galerie Supermacht Indien - 60 Jahre demokratische Verfassung

चमक दमक से अब फिल्म असल जिंदगी में लौट रही हैं

पिछले साल हिट होकर चौंका देने वाली फिल्म फंस गया रे ओबामा के निर्देशक सुभाष कपूर कहते हैं, "ऐसी बहुत सारी कहानियां हैं जो कही जानी चाहिए. हिंदी फिल्मों में तो एक अच्छी स्क्रिप्ट तैयार करने पर वक्त खर्च ही नहीं किया जाता."

नई फिल्म टर्निंग 30 की डायरेक्टर अलंकृता श्रीवास्तव कहती हैं कि हिंदी फिल्मों में स्क्रिप्टिंग को तो अहमियत ही नहीं दी जाती. वह कहती हैं, "विदेशों में स्क्रिप्ट को सबसे ज्यादा अहमियत दी जाती है. एक बेहतर फिल्म बनाने के लिए कागज पर ज्यादा मेहनत करना जरूरी है."

सीक्वल का साल

अपनी स्क्रिप्ट की रिसर्च पर एक साल बिताने वाले कपूर को लगता है कि साल 2011 नए आइडिया के लिए उम्मीदों का साल हो सकता है. वह कहते हैं, "इस साल कई सीक्वल और रीमेक बनने हैं, तो उन लोगों के पास एक अच्छा मौका है जो कुछ अलग, कुछ नया कहना चाहते हैं. नए लेखकों में उत्साह है, ताजगी है."

2011 में जो बड़ी फिल्में आने वाले हैं उनमें रेस-2, धूम-3, वॉन्टेड-2, पार्टनर-2 और डॉन-2 शामिल हैं. इसके अलावा 1990 की अमिताभ बच्चन की हिट फिल्म अग्निपथ को दोबारा बनाया जा रहा है और में रितिक रोशन मुख्य भूमिका निभा रहे हैं. सलमान खान और जॉन अब्राहम भी दक्षिण भारतीय फिल्मों के रीमेक में काम करते नजर आएंगे. लेकिन पुरानी फिल्मों को नई चाशनी में डुबोकर परोसना नए निर्देशकों को ज्यादा पसंद नहीं है.

बदलती फिल्में, बदलेंगी सोच

ऋषि कपूर और नीतू के साथ फिल्म दो दूनी चार बनाने वाले डायरेक्टर हबीब फैसल कहते हैं, "एक अच्छी और मनोरंजन कहानी जो दर्शकों को जोड़ सकती है, वह तो सफल जरूर होगी." फैसल की फिल्म दिल्ली के मध्यमवर्गीय परिवार की कहानी है जिसका मुखिया स्कूल टीचर है. उनके किरदार रोजमर्रा की दिक्कतों से जूझते

Plakat zum Film Ram Balram (1980) aus dem Band The Art of Bollywood vom Taschen-Verlag

अस्सी के दशक में एक्शन फिल्मों था जमाना

नजर आते हैं तो दर्शकों को अपने आसपास के लगते हैं. फैसल की ही लिखी एक और फिल्म बैंड बाजा बारात ने भी खूब चर्चा बटोरी. यह भी दिल्ली की मध्यमवर्गीय पतली सी गलियों की कहानी थी. फैसले कहते हैं, "पहले लोग कहते थे कि सिनेमा में फिल्म देखने जाने वाले लोग अपनी परेशानियों को पर्दे पर नहीं देखना चाहते. लेकिन अब ऐसा नहीं है. अब लोग अपने जैसे किरदार देखना चाहते हैं, अपनी कहानियां सुनना चाहते हैं."

यह सोच बॉलीवुड का चेहरा बदल सकती है. उसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान दिला सकती है. जर्मनी में रहने वाले ईरानी मूल के एक व्यापारी काफी भारतीय फिल्में देखते हैं. वह कहते हैं, "मैंने बॉलीवुड की कई फिल्में देखीं. सबके किरदार और कहानियां बिल्कुल एक जैसी हैं. बस एक्टर अलग अलग होते हैं. क्या हिंदुस्तान में अलग अलग कहानियां नहीं हैं कहने को?"

बॉलीवुड का नया चेहरा उनके सवाल का जवाब देने की तैयारी कर रहा है.

रिपोर्टः एजेंसियां/वी कुमार

संपादनः ए कुमार

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