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दुनिया

नई जिंदगी के लिए जूझते अफगान

चेहरे पर दाढ़ी के बीच गहरी उदासी लिए एक शख्स टीवी स्क्रीन से झांकता हुआ कहता है, "मेरा बेटा मेरी नहीं सुनेगा, वह अपनी मौत खरीदने के लिए पैसा उधार मांग कर लाया है."

यह तस्वीर एक विज्ञापन की है जो अफगानिस्तान में शरणार्थी मामलों का मंत्रालय युवाओं को मानव तस्करों के चंगुल से बचाने के लिए चला रहा है. जंग से तबाह देश के युवा बेहतर जिंदगी की आस में विदेश जाना चाहते हैं लेकिन इस कोशिश में मानव तस्करों के शिकार बन रहे हैं. पीड़ित परिवारों की सच्ची कहानियों सुना कर सरकारी महकमा लोगों का समझाने में जुटा है कि अवैध तरीके से देश छोड़ कर जाने पर किन मुश्किलों का सामना करना पड़ता है और मंजिल पर पहुंच कर भी कैसे जबरन वापस भेज दिए जाता है. इस विज्ञापन में दिख रहा बूढ़ा शख्स एक गरीब मोची है जो हजारा समुदाय का है और जिसके बेटे ने ऑस्ट्रेलिया जाने की कोशिश की. वो कहते हैं, "मैंने अपने बेटे को जाने से बार बार मना किया, तस्करों पर भरोसा नहीं करने को कहा लेकिन वो गया और समुद्र में डूब कर मर गया."

शरणार्थी मामलों के मंत्रालय के प्रवक्ता इस्लामुद्दीन जुरत का कहना है, "गृह युद्ध और तालिबान के शासन के पिछले अनुभव को देखते हुए बहुत से अफगान इतने दबाव में हैं कि किसी तरह से यहां से चले जाना चाहते हैं. हमारी कोशिश उन्हें यह बताने की है कि अवैध तरीकों से जाने में, जीवन को तस्करों के हाथ सौंपने में जोखिम है, असल में जान जाने का खतरा है और इस बात की उम्मीद बहुत कम है कि जहां जा रहे हैं वहां स्वीकार कर लिए जाएंगे."

Arbeitslosigkeit in Afghanistan

अफगानिस्तान में हिंसा भी, बेरोजगारी भी

वापसी का डर

दशक भर से ज्यादा समय से चली आ रही जंग के बाद अब विदेशी सेना के लौटने की घड़ी पास आने के साथ ही बहुत से अफगान देश छोड़ कर चले जाना चाहते हैं. उन्हें लग रहा है कि विदेशी दखल कमजोर पड़ेगा और स्थानीय कबीले या फिर मुस्लिम चरमपंथी एक बार फिर देश पर काबिज हो जाएंगे. देश को स्थिरता और शांति कायम करने के साथ ही पुनर्निर्माण के लिए लिए युवाओं की जरूरत है लेकिन युवाओं का पलायन बहुत तेज हो गया है क्योंकि 2014 में नाटो सेना की वापसी के बाद सहायता के लिए आ रहे पैसे की रफ्तार भी रुक जाएगा.

पिछले साल 36,600 अफगान लोगों ने औद्योगिक देशों में शरण के लिए गुहार लगाई. संयुक्त राष्ट्र के शरणार्थी मामलों के आयुक्त के मुताबिक 2011 में शरण मांगने वालों की तादाद 36,200 थी. अफगानिस्तान के लोग अक्सर ऑस्ट्रेलिया, स्वीडन, जर्मनी या नॉर्वे जाने की ताक में रहते है. अक्सर वे जमीन और समुद्र रास्तों में तस्करों की बोट के सहारे जान पर खेल कर यहां पहुंचते हैं.

ऑस्ट्रेलिया में सितंबर के चुनावों के बाद सत्ता में आई नई सरकार ने ऐसे लोगों को देश की सीमा से दूर रखने के लिए नौसेना को तैनात करने का फैसला किया है. काबुल में ऑस्ट्रेलियाई दूतावास ने सख्त चेतावनी जारी की है कि वहां प्रवासियों का स्वागत नहीं होगा. कुछ लोग जो हिंद महासागर में ऑस्ट्रेलियाई क्रिस्चियन द्वीप तक किसी तरह पहुंच गए हैं उन्हें अविकसित पापुआ न्यू गिनी में रखा जा रहा है.

लोगों तक इस तरह की कहानियों के जरिए सच्चाई पहुंचे, मंत्रालय का यही मकसद है. टीवी और रेडियो पर प्रसारित करने के साथ ही अखबारों में और पोस्टर बनवाकर भी गांव गांव तक संदेश पहुंचाने की कोशिश हो रही है. हालांकि इसके बाद भी लोगों को समझाना इतना आसान नहीं. 20 साल के साबिर रेजायी बेरोजगार हैं और यूरोप जाने की दो कोशिशों में नाकाम हो चुके हैं. साबिर का कहना है, "मैं वहां जाना या रास्ते में मर जाना पसंद करूंगा बजाय इसके कि यहां रहूं और तालिबान के हाथों या बम धमाके में मारा जाऊं." साबिर के रिश्तेदार स्वीडन में रहते हैं और वहां तक पहुंचने की कोशिश में वह पहली बार ईरान से तो दूसरी बार तुर्की से वापस अपने देश भेज दिए गए.

Italien Flüchtlingsdrama Lampedusa Flüchtlingsboot

इस तरह जान जोखिम में डालकर होती है यात्रा

यह लोग तस्करों को करीब 20 हजार डॉलर तक की रकम देते हैं जिसके बदले इन्हें अफगानिस्तान से सड़क मार्ग से निकाल कर अवैध तरीके से वीजा हासिल कर विमान में बिठा दिया जाता है. ऑस्ट्रेलिया जाने वाले कई लोग पहले मलेशिया जाते हैं और फिर वहां से समुद्र के रास्ते इंडोनेशिया या फिर मछुआरों की भीड़ भरी नाव में बैठ कर क्रिस्चियन द्वीप पहुंचते हैं.

श्रीलंका और दूसरे देशों के 600 से ज्यादा शरणार्थी माना जाता है कि इसी तरह की कोशिशों में डूब कर मर गए. यह आंकड़े 2006 से अब तक के हैं हालांकि इनका सही सही ब्योरा मौजूद नहीं है. एक तस्कर ने नाम जाहिर किए बगैर समाचार एएफपी से कहा, "हम उन्हें भागने में मदद करते हैं. ज्यादातर हम उन्हें तुर्की ले जाते हैं जहां से दूसरे लोग उन्हें यूरोप और ऑस्ट्रेलिया ले जाते हैं. वो जानते हैं कि खतरा है लेकिन हमारे लिए यह अच्छा कारोबार है."

बेरोजगार तो बेरोजगार ठहरे लेकिन सरकारी नौकरी करने वाले भी अफगानिस्तान में रुकने से डर रहे हैं. 36 साल के एक शख्स ने बताया कि ताजिकिस्तान और रूस के रास्ते जर्मनी जाने की उसकी कोशिश नाकाम हो गई. फहीम नाम का यह शख्स पहले सरकारी नौकरी में था और पूरा नाम बताने पर राजमंद नहीं हुआ लेकिन उसने कहा, "मैं 2014 के बाद अफगानिस्तान में रहने की कल्पना नहीं कर सकता. मुझे पहले ही धमकियां मिल रही हैं. मैं और मेरी बीवी जितने उदार हैं उसमें अच्छा मुस्लिम नहीं हुआ जा सकता. मैं जल्दी ही अपना मकान बेच दूंगा और किसी भी कीमत पर देश से निकल जाउंगा."

एनआर/ओएसजे (एएफपी)

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