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मनोरंजन

नई कामयाबी के लिए पुराने फॉर्मूले का सहारा

बॉलीवुड में किसी एक फिल्म की सफलता के बाद वैसे ही कहानी पर आधारित फिल्मों की बाढ़ आ जाती है. फिलहाल हिंदी फिल्म उद्योग में 1970 या 1980 के दशक पर आधारित फिल्में या फिर उनके रीमेक बनाना फायदे का सौदा समझा जा रहा है.

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बॉलीवुड के निर्देशक साजिद खान का कहना है, "1970 और 1980 के दशकों को भारतीय फिल्म उद्योग में सबसे सफल माना जाता है. हमें नई पीढ़ी को पुराने संगीत और फिल्मों का स्वाद चखाना जरूरी है." साजिद खान की फिल्म हे बेबी बॉक्स ऑफिस पर सफल साबित हुई और हाउसफुल ने भी ठीक ठाक कारोबार किया. हाउसफुल फिल्म में 1981 की सफल फिल्म लावारिस के उस गाने के रिमीक्स का भी सहारा लिया गया जिसे अमिताभ बच्चन पर फिल्माया गया था.

इंडियन एक्सप्रेस अखबार में फिल्म आलोचक शुभ्रा गुप्ता का मानना है कि बॉलीवुड अपनी जड़ों को तलाश रहा है. "अपने अतीत की ओर देखना भविष्य की ओर देखने जैसा ही होता है लेकिन तब नहीं जब इसके जरिए आसान रास्ता तलाशने की कोशिश हो रही हो." बॉलीवुड निर्देशक मिलन लूथरिया की फिल्म वन्स अपोन ए टाइम इन मुंबई की पृष्ठभूमि 1970 के दशक की है जिसमें दो गैंगस्टरों के बीच ताकत के लिए संघर्ष को दर्शाया गया है.

Filmszene aus Billu Barber

इसमें कलाकारों की वेशभूषा जिस तरह की है वह बिलकुल पुराने दिनों की याद दिलाता है. किरदारों के बाल बड़े हैं और बड़ी मूंछे हैं. बड़े कॉलर वाली कमीजें पहनी गई हैं और निर्देशक का दावा है कि यह दर्शकों को पसंद आया. बॉक्स ऑफिस पर इस फिल्म ने 58 करोड़ रुपये की कमाई की.

दीवाली के मौके पर रिलीज हुई फिल्म गोलमाल-3 भी 1970 के दशक में रिलीज हुई फिल्म खट्टा मीठा पर आधारित थी. 1970 के दशक पर आधारित अक्षय कुमार और ऐश्वर्या राय की एक्शन रीप्ले भी आई लेकिन फिल्म बॉक्स ऑफिस पर पिट गई.

बॉलीवुड बादशाह शाह रुख खान 2006 में डॉन फिल्म के रीमेक पर काम कर चुके हैं और हाल ही में उन्होंने दूसरे पार्ट डॉन : द चेज बिगन्स अगेन की शूटिंग पूरी की है. 1980 में अमिताभ बच्चन की सत्ते पर सत्ता को फिर से बनाने की तैयारी है जिसमें संजय दत्त प्रमुख भूमिका में होंगे.

वैसे हाल के कुछ सालों में बॉलीवुड में नए निर्देशकों की खेप आई है जिसने समकालीन समाज के अहम मुद्दों पर फिल्में बनाने की कोशिश की है. चरमपंथ, कॉल सेंटर कर्मचारियों, रॉक बैंड, शहरों में रहने वाले प्रेमियों के रिश्तों में आती दरारों, बीमारी और वित्तीय संकट जैसी समस्याओं को फिल्मों के जरिए उठाया गया है. लेकिन इन चुनिंदा फिल्मों को छोड़ दे तो अधिकतर निर्देशक आसान रास्ते का सहारा लेते हैं और घिसे पिटे फार्मूले पर आधारित फिल्म बनाते हैं.

रिपोर्ट: एजेंसियां/एस गौड़

संपादन: ए कुमार

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