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विज्ञान

धूमकेतु की ओर चला रोजेटा

यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी ईएसए अंतरिक्ष विज्ञान के इतिहास में सबसे बड़ा कदम रखने जा रही है. पहली बार किसी धूमकेतु पर रोवर उतारा जाएगा. 31 महीने तक सोए रहने के बाद अंतरिक्ष यान रोजेटा ने सिग्नल भेज दिया है.

रोजेटा को एक दशक पहले ही अंतरिक्ष में भेज दिया गया था. 2004 में जब इसे लॉन्च किया गया तब इसने अलग अलग कक्षाओं में धरती के तीन चक्कर लगाए, मंगल ग्रह का एक और फिर सूरज के इर्द गिर्द भी पांच बार घूमा. 2011 में यह सूरज से 80 करोड़ किलोमीटर दूर पहुंच चुका था. इतनी दूरी से रोजेटा के लिए सूरज एक बिंदु मात्र ही बचा. इसके बाद 31 महीने के लिए इसे ऊर्जा बचाने के लिए सुला दिया गया. ढाई साल तक एनर्जी सेविंग मोड में रहने के बाद अब रोजेटा को एक बार फिर जगाया गया है.

यूरोपीय समय से सुबह दस बजे रोजेटा को जगाया गया पर ईएसए को संकेत मिलने में कुछ घंटे लगे. ईएसए ने सुबह में बताया कि अंतरिक्ष यान को गर्म होने में कम से कम सात घंटे का वक्त लगेगा. इसके बाद वह अपने ट्रांसमिटर शुरू करेगा और धरती पर सिग्नल भेजने लगेगा. रोजेटा इस समय जुपिटर की कक्षा के करीब है. ये रेडियो सिग्नल अगर रोशनी की गति से भी धरती की ओर बढ़ें तो कम से कम 45 मिनट का समय लग जाएगा. शाम में ईएसए ने ट्वीट किया हेलो वर्ल्ड. यही रोजेटा का सिग्नल था.

दोबारा गति में आ जाने के बाद अंतरिक्ष यान रोजेटा के इस साल अगस्त से नवंबर के बीच में धूमकेतु 67पी चुरियूमोव गेरासिमेंको पर पहुंचने की उम्मीद है. वहां वह अपना रोबोट लैंडर फिले उतारेगा जिसका वजन सौ किलोग्राम है.

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प्रोजेक्ट पर एक अरब यूरो का खर्च

इस प्रोजेक्ट का मकसद है सौर मंडल की रचना को समझना. धूमकेतु धूल मिट्टी और बर्फ के गोले होते हैं और कई हजारों साल तक ब्रह्मांड में रहते हैं. वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि इन्हें बेहतर रूप से समझा जाए तो यह गुत्थी सुलझ सकेगी कि सौर मंडल की शुरुआत कैसे हुई. इसीलिए इन्हें 'टाइम कैप्सूल' का नाम दिया गया है. ईएसए के मार्क मेक कौघरीएन ने बताया, "इन टाइम कैप्सूलों का ताला खोलना, यह समझना कि वे किस तरह की गैस, मिट्टी और खास तौर से कैसी बर्फ से बने हैं, यह हमें इस बात का संकेत दे सकते हैं कि सौर मंडल की उत्पत्ति कैसे हुई, यहां तक कि जीवन की शुरुआत कैसे हुई." मार्क मेक कौघरीएन ने कहा कि यह टाइम कैप्सूल 4.6 अरब सालों से बंद पड़ा है, "अब वक्त आ गया है कि इस खजाने को खोल दिया जाए."

यूरोप ने इस प्रोजेक्ट पर एक अरब यूरो खर्च किए हैं. रोजेटा को बनाने वाले इंजीनियरों का कहना है कि उसे बनाते समय वे नहीं जानते थे कि अंतरिक्ष यान किस तरह की सतह पर उतरेगा. इसलिए वे भी धूमकेतु से आने वाली जानकारी का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं.

आईबी/एमजे (डीपीए,एएफपी)

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