धीरे धीरे उबर रही है स्वात घाटी | दुनिया | DW | 04.01.2014
  1. Inhalt
  2. Navigation
  3. Weitere Inhalte
  4. Metanavigation
  5. Suche
  6. Choose from 30 Languages

दुनिया

धीरे धीरे उबर रही है स्वात घाटी

पाकिस्तान की खूबसूरत स्वात घाटी में तालिबान के आने के बाद खेती बाड़ी नष्ट हो गई. इलाका उस दौर की बर्बादी से धीरे धीरे उबर रहा है.

स्वात में रहने वाले 55 वर्षीय किसान अहमद नवाज को उस दिन पर रंज होता है जब कट्टरपंथी तालिबान उनके खूबसूरत वतन आए थे. स्वात घाटी को उसके मनमोहक पहाड़ों, हरी भरी वादियों और फलों के रंग बिरंगे बागानों के लिए जाना जाता है. वे बताते हैं, "धरती बांझ हो गई. हमारी कमाई परिवार का खर्च चलाने के लिए काफी होती थी, लेकिन 2007 में तालिबान के आने के बाद बाद दो वर्षों तक हम फसल नहीं उगा पाए."

स्वात खैबर पख्तुनख्वाह प्रांत में है. सैनिक कार्रवाई में भगाए जाने तक दो साल तक इलाके पर तालिबान का दबदबा रहा. लेकिन वहां के लोगों को पुरानी जिंदगी वापस पाने में समय लगा. नवाज का कहना है कि दहशतगर्दी ने खेती मुश्किल कर दिया, "तालिबान के शासन में हमारी माली हालत खराब होती गई, लेकिन अब हम फिर से पटरी पर लौट रहे हैं." स्वात घाटी में रहने वाले 10 लाख लोगों में दो तिहाई रोजी रोटी के लिए खेती बाड़ी पर निर्भर हैं.

पख्तूनख्वाह के कृषि विभाग की रिपोर्ट के अनुसार स्वात 2007 तक पाकिस्तान के फल उत्पादन के एक चौथाई हिस्से की सप्लाई करता था, लेकिन तालिबान के आने के बाद यह घटकर 10 फीसदी हो गया. तालिबान के आने के बाद इलाके में मारपीट, गोलीबारी, बम धमाके, कर्फ्यू और नाकेबंदियों का दौर शुरू हुआ, जिसके दौरान स्वात में उपजे फलों का दो तिहाई नष्ट हो जाता. किसान अपने खेतों और बागानों में काम नहीं कर पाते थे.

स्वात किसान संघ के गुल शाह कहते हैं कि इलाके से अच्छी क्वालिटी के फल मध्य पूर्व और यूरोप के देशों में बेचे जाते थे. प्रदेश के मलाकंद और स्वात इलाकों में सेब, आड़ू, खुबानी, नाशपाती, अंगूर, आलूबुखारा, प्याज, मक्का, गेहूं और चावल की फसल होती है. लेकिन उग्रवाद के कारण विकास रुक गया. तालिबान के शासन के दौरान बीज, खाद और कीटनाशक जुटाना भी मुश्किल था. गुल शाह कहते हैं, "तालिबान को भगाए जाने के बाद हम फिर से फलों और सब्जियों का निर्यात कर रहे हैं. हम उच्च क्वालिटी का फल पैदा करते हैं, जिसका अच्छा कारोबार होता है."

इस्लामी कट्टरपंथियों ने बागानों, प्रोसेसिंग उद्योग, कोल्ड स्टोरेज और गोदामों को भी नुकसान पहुंचाया. लेकिन उन्हें फिर से बना लिया गया है और ट्रांसपोर्ट तथा मार्केटिंग का ढांचा भी बनाया गया है. मलाकंद से हर रोज 2000 ट्रकों में फल भर कर देश के दूसरे हिस्सों में भेजा जाता है.

पाकिस्तान के 2012 के आर्थिक सर्वे के अनुसार उसे उग्रपंथ के चलते पिछले पांच सालों में 35 अरब रुपये की खेती का नुकसान हुआ. हालांकि स्वात में हालात सुधर रहे हैं, लेकिन फाटा कबायली इलाके की स्थिति अभी भी खराब है क्योंकि वहां तालिबान का दबदबा है. दक्षिण वजीरिस्तान के 45 वर्षीय किसान जालंधर खान कहते हैं कि उनके पास 200 एकड़ उपजाऊ जमीन है, जिस पर वे पहले तरह तरह की फसलें उगाया करते थे, लेकिन 2004 के बाद उग्रवाद की वजह से बाधा आई है. खान का कहना है कि किसान गरीब हो गए हैं. "करीब 200 परिवार हैं, जिनकी खेती से अच्छी कमाई होती थी, लेकिन तालिबान के आने के बाद से उनके पास कोई काम नहीं है."

उग्रवाद के कारण दक्षिण और उत्तरी वजीरिस्तान के अलावा खुर्रम, खैबर, बाजौर और ओरकजई इलाकों में फलों की खेती को नुकसान पहुंचा है. फाटा के कृषि अधिकारी अब्दुल गफूर कहते हैं कि फाटा की उपजाऊ जमीन पानी की कमी से सूख गई है क्योंकि कट्टरपंथी अक्सर बिजली काट देते हैं. आर्थिक सर्वे के अनुसार 1999 में सकल घरेलू उत्पाद में कृषि का हिस्सा 26 प्रतिशत था, जो 2009 में गिर कर 21 प्रतिशत रह गया. फाटा में 2000 में 35 फीसदी परिवार गरीबी रेखा के नीचे थे लेकिन 2011 में उनकी तादाद बढ़कर 66 फीसदी हो गई है.

इस्लामी कट्टरपंथ के आने से पहले खेती इलाके का मुख्य पेशा था, जिस पर दो तिहाई आबादी निर्भर थी. लेकिन सिंचाई का ढांचा खराब होने के कारण खेती को भारी नुकसान पहुंचा है. बाजौर के 62 वर्षीय किसान जमां गुल कहते हैं कि पहले किसान गेहूं, सब्जी और फलों का निर्यात करते थे लेकिन "अब अपने इस्तेमाल के लिए भी पर्याप्त उपज नहीं होती."

एमजे/एजेए (आईपीएस)

DW.COM

संबंधित सामग्री