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दुनिया

धर्म के सहारे गंगा को बचाने की कोशिश

गंगा और डॉल्फिनों को बचाने के लिए डब्ल्यूडब्ल्यूएफ अब धर्म का सहारा ले रहा है. लोग इस नदी और इसके जीवों को नुकसान न पहुंचाएं, इसके लिए अब लोगों का धार्मिक विश्वास ही उसकी आखिरी उम्मीद है.

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दिल्ली से करीब 300 किलोमीटर दूर नरोरा के एक गांव में शाम का वक्त है और ड्रामे की पोशाक में कुछ कलाकार लोगों के सामने नाटक कर रहे हैं. अस्थायी रूप से बने स्टेज के चारो करीब डेढ़ सौ स्थानीय लोग जमे हुए हैं. भगवान की वेशभूषा में एक कलाकार लोगों से कहता है इंसान गंगा को गंदा कर रहे हैं. पास ही में विश्व वन्य कोष (डब्ल्यूडब्ल्यूएफ) का एक पोस्टर भी लगा है जिस पर डॉल्फिन दिवस के बारे में जानकारी दी गई है. पोस्टर पर यह भी लिखा है, "हमारी गंगा मां की जिंदगी खतरे में है उसे बचाइए." यह कवायद डब्ल्यूडब्ल्यूएफ की उस मुहिम का हिस्सा है जिसमें लोगों को गंगा का ख्याल रखने के बारे में बताने के लिए धर्म का सहारा लिया जा रहा है.

Indien Bad im Ganges

हिमालय पर गंगा के ऊपरी सिरे ऋषिकेश से लेकर मध्यप्रदेश में रामघाट तक गंगा का धार्मिक महत्व बहुत ज्यादा है. गंगा के किनारे किनारे एक पूरी संस्कृति और जीवनशैली बसती है जो लोगों की आस्था के साथ साथ पेट की भूख भी मिटाती है. डब्ल्यूडब्ल्यूएफ इसी आस्था का सहारा लेकर गंगा को बचाने की मुहिम में जुटा है. डब्ल्यूडब्ल्यूएफ भारत के प्रोजेक्ट लीडर संदीप बहेड़ा ने बताया, "लोगों की धार्मिक भावनाओं को नदी बचाने के काम से जोड़ा जा रहा है."

नरोरा में नदी किनारे बने एक मंदिर के बाहर खड़े संदीप कहते हैं "अगर मैं किसी से यह कहता हूं कि नदी को बचाने के लिए काम करो तो वो मुझसे पूछता है कि फिर शाम को मैं खाउंगा क्या. ऐसे में धार्मिक आस्था ही एक ऐसा माध्यम है जिसके जरिए लोग हमारे साथ आ सकें. इस काम में कुछ धार्मिक नेताओं की भी मदद ली जा रही है."

मुहिम चलाना इसलिए जरूरी है कि हर दिन गुजरने के साथ गंगा में कचरे की मात्रा बढ़ती जा रही है. जो पानी कई कई सालों तक खराब नहीं होता था

Indien Sadhu Ganges Allahabad

अब कुछ जगहों पर उसमें कीड़े पैदा होने की खबरें आ रही हैं. उद्योगों और लोगों के घरों से निकला गंदा पानी और कचरा बड़ी मात्रा में गंगा में गिर रहा है. हालत इतनी खराब हो गई है कि उसकी गोद में खेलने वाली डॉल्फिन मछलियों की तादाद भी अब तेजी से घट रही है. 1982 में भारत, नेपाल और बांग्लादेश में 4,500 डॉल्फिन थीं अब उनकी तादाद घट कर आधी रह गई है.

डब्ल्यूडब्ल्यूएफ की मुहिम से लोग जुड़ रहे हैं और धर्म अपना असर दिखा रहा है. हिंदू पुजारी विवेक कुमार लोगों को नदी और उसके जीवों की रक्षा करने का पाठ पढ़ाते हैं. इसका असर यह हुआ है कि स्थानीय मछुआरों ने डॉल्फिन का शिकार न करने के शपथ पत्र पर दस्तखत किए हैं. 165 किलोमीटर लंबे इस इलाके में रहने वाली डॉल्फिन की संख्या पिछले पंद्रह सालों में तीन गुनी होकर 56 तक पहुंच गई है. भारत सरकार ने भी डॉल्फिन को भारत का राष्ट्रीय जलीय जीव घोषित किया है. इसके अलावा गंगा में बिना सफाई के सीवेज का पानी और उद्योगों से निकले जहरीला पानी डालने पर भी 2020 तक पूरी तरह से रोक दी जाएगी. संदीप बेहड़ा मानते हैं कि एक दो हफ्ते या महीने में सब कुछ नहीं बदल जाएगा. यह एक लंबी प्रक्रिया है जिसमें सालों लगेंगे.

रिपोर्टः एजेंसियां/एन रंजन

संपादनः ए कुमार

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