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मंथन

धरती बेजान हो गई तो क्या करोगे

उर्वरा जमीन इंसान की जिंदगी का आधार है. लेकिन मिट्टी की क्वालिटी और उर्वराशक्ति लगातार गिर रही है. दुनिया भर में एक तिहाई जमीन बंजर होने के खतरे में है. यह इंसानी सभ्यता के लिए बड़ा खतरा है.

खेत, चरागाहों और जंगलों का नष्ट होना, 3 अरब लोगों के पोषण को खतरे में डाल रहा है. सालाना 300 अरब डॉलर का नुकसान हो रहा है. बॉन यूनिवर्सिटी की कृषि विज्ञानी प्रोफेसर योआखिम फॉन ब्राउन के मुताबिक, "दुनिया भर में जमीन की स्थिति खराब है और लगातार और खराब होती जा रही है. उसकी उर्वरा शक्ति कम हो रही है क्योंकि किसानों को जमीन से सावधानी से पेश आने के लिए पर्याप्त बढ़ावा नहीं मिल रहा है. शहर और संरचनाएं जमीन को निगल रहे हैं. जमीन खराब हो जाए तो सभ्यताएं खत्म हो जाती हैं, ये इतिहास का सबक है."

वैज्ञानिकों की चेतावनी

बॉन यूनिवर्सिटी के विकास शोध केंद्र के वैज्ञानिक खतरे की घंटी बजा रहे हैं. मिट्टी की क्वालिटी बचाने के लिए यदि फौरन कुछ नहीं किया गया तो भविष्य में उसे ठीक करने की लागत मौजूदा खर्च के मुकाबले बहुत ही ज्यादा होगी. ये विश्वव्यापी समस्या है. जमीन विश्व के तीन बड़े इलाकों में खासकर खराब है. दक्षिणवर्ती अफ्रीका, दक्षिण पूर्व एशिया और दक्षिणवर्ती लैटिन अमेरिका में. हालांकि ये इलाके क्षेत्रीय तौर पर महत्वपूर्ण हैं. सिर्फ दक्षिण के इलाके ही प्रभावित नहीं हैं, यह दुनिया भर की समस्या है. उत्तरी अमेरिका, रूस, उत्तरी चीन और स्पने जैसे यूरोप के कुछ हिस्से भी प्रभावित हैं.

कृषिविज्ञानी धरती की उर्वराशक्ति के क्षय होने की वजह गहन खेती को मानते हैं. मसलन छोटी जमीन पर बहुत ज्यादा पशुओं को पाला जाता है, जंगल काटे जा रहे हैं और चरागाहों को नुकसानदेह तरीकों से रखा जा रहा है. अंत में पानी या हवा मिट्टी को उड़ा ले जाते हैं.

आसान नहीं भरपाई

प्रोफेसर ब्राउन कहते हैं, "जमीन की गुणवत्ता बढ़ाई जा सकती है. लेकिन जमीन में दो तीन सेंटीमीटर की अच्छी खाल तैयार करने में कुछ दशक नहीं बल्कि सैकड़ों साल लगते हैं. यह अक्षय संसाधन नहीं है." खेत की उर्वरा क्षमता घटने का सबसे ज्यादा नुकसान गरीबों को होता है, क्योंकि वे अनाज की बढ़ती कीमतें इतनी आसानी से नहीं चुका सकते. लेकिन जमीन की क्वालिटी यदि खराब हो जाए तो उसका असर गरीब और अमीर दोनों पर ही होता है. एक तिहाई लोगों की जिंदगी इससे प्रभावित है.

प्रो. ब्राउन इसका हल सुझाते हैं, "यदि हम जमीन की गुणवत्ता को बेहतर करने के कदम उठाएं, जैसे ट्रैक्टर बगैर खेती, प्राकृतिक पटौनी, अलग अलग फसलों का चक्र और उचित खाद का इस्तेमाल, तो इसमें खर्च भी आता है लेकिन खेत के खराब होने का खर्च इसका कम से कम पांचगुना ज्यादा होता है."

किसान कर सकते हैं मदद

ये कैसे संभव है ये उज्बेकिस्तान के किसान एक प्रोजेक्ट में दिखा रहे हैं. इसमें खेतों का न्यूनतम इस्तेमाल होता है या मिश्रित फसल उगाई जाती है. नतीजा यह है कि जमीन सूखे और बर्बादी का सामना बेहतर तरीके से करने की हालत में है. इन तरीकों से न सिर्फ जमीन और ईंधन बचते हैं बल्कि काम भी कम होता है और साथ ही फसल भी बेहतर होती है. यह दुनिया में हर कहीं संभव है. किसानों को प्रोत्साहन चाहिए ताकि वे खेत का टिकाऊ इस्तेमाल करें. ये प्रोत्साहन लंबे समय के लीज या मिल्कियत के जरिए दिया जा सकता है. और उन्हें इस बात का हर्जाना भी मिलना चाहिए कि वे जैव विविधता और पर्यावरण की रक्षा कर रहे हैं तथा पानी को साफ रखने में योगदान दे रहे हैं.

जमीन ऐसा प्राकृतिक संसाधन है जिस पर बहुत कम ध्यान दिया जा रहा है. ये विश्वव्यापी लापरवाही सिर्फ महंगी नहीं बल्कि खतरनाक भी है. भूरक्षण के खिलाफ जल्द ही कदम नहीं उठाए गए तो गरीबी बढ़ेगी और पर्यावरण रक्षा भी मुश्किल हो जाएगी.

मार्टिन रीबे/एमजे

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