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मनोरंजन

धरती की जिंदगी प्रभावित करता अंतरिक्ष

खगोलशास्त्र यानी तारों का विज्ञान लेकिन तारे हमसे बहुत दूर होते हैं. अंतरिक्ष 100 किलोमीटर की ऊंचाई से ही शुरू हो जाती है और हमारा जीवन भी सृष्टि के इस फैलाव का हिस्सा है.

जर्मन अंतरिक्षयात्री अलेक्जांडर गैर्स्ट लगभग 50 दिन से अंतरराष्ट्रीय स्पेस स्टेशन आईएसएस में हैं. इन दिनों में उन्होंने सूरज को 800 बार उगते देखा. 24 घंटे के एक दिन में 16 बार. 400 किलोमीटर की ऊंचाई पर वह हर 90 मिनट में पृथ्वी का एक बार चक्कर काटते हैं. पृथ्वी के अलग अलग देशों को आसमान से देखते हुए अलेक्स ट्वीट भी करते हैं. अंतरिक्ष में उनका जीवन करीब करीब धरती जैसी आम जिंदगी का रूप लेने लगा है.

21 जुलाई 1969 को जब इंसान पहली बार चांद पर पहुंचा, तो दुनिया भर के लोग टीवी के सामने बैठे रहे. आज हर वेबसाइट पर अंतरिक्ष को लेकर खबरें होती हैं.

खगोलशास्त्र की पढ़ाई अब रोजमर्रा और आम जीवन की पढ़ाई के और करीब आ रही है. पूर्वी जर्मन शहर येना के खगोलशास्त्री फ्लोरियान फ्राइश्टेटर लिखते हैं कि हाइड्रोजन और हीलियम जैसे तत्व तारों में बनते हैं और वह सोना भी जो जौहरी के दुकान में मिलता है. किसी झरने के फव्वारे को देखते हुए हम यह नहीं सोचते कि पृथ्वी में पानी का ज्यादातर हिस्सा उल्कापिंडों से आता है.

Alexander Gerst Ankunft auf der ISS 29.05.2014

आलेक्सांडर गैर्स्ट

फ्राइश्टेटर कहते हैं, "हम अंतरिक्ष से अलग नहीं रह रहे, बल्कि हम अंतरिक्ष के बीचों बीच रह रहे हैं." हमारे सरों से 100 किलोमीटर की ऊंचाई पर अंतरिक्ष शुरू होता है. हमारी पृथ्वी एक ग्रह है जो अपने तारे, यानी सूरज के चक्कर काटती है. हर दिन अंतरिक्ष से 400 टन धूल पृथ्वी पर बरसता है. और यह धूल कभी कार पार्किंग या फुटपाथ पर जम जाता है.

जरा आंखे खोल कर देखें तो याद आएगा कि धूप के बिना कोई जीवन नहीं और इसलिए खगोलशास्त्र हम सब के लिए विकल्प ही नहीं, बल्कि एक जरूरत है.

आईएसएस स्टेशन पर बैठे अलेक्स ट्विटर पर सुंदर नजारों का बखान करते हैं, "दक्षिण से आ रही रोशनी, सूर्योदय से पहले, अपने को बचाती हुई." इंटरनेट पर वह ब्राजील में विश्व कप के फुटबॉल मैच देखते हैं तो राष्ट्रीय चैनल में समाचारों को कभी मिस नहीं करते. लेकिन इस सब के बावजूद एस्ट्रोनॉट होना और अंतरिक्ष में जाना अब काफी सामान्य हो गया है.

एमजी/एमजे(ईपीडी)

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