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मनोरंजन

दो लाख यूरो में जीडीआर की कश्ती

एंटीक चीजें जमा करने वाले लोगों के लिए एक अच्छी खबर है, चौबीस साल पहले खत्म हो गए कम्युनिस्ट जीडीआर का सरकारी यॉट बिकने जा रहा है. पर यह जेब पर काफी भारी पड़ेगा.

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विनेटा

एक बड़ी आलीशान कश्ती पर धूमधाम वाली पार्टी. अक्सर हॉलीवुड फिल्मों में ऐसा देखने को मिलता है. कुछ निजी कंपनियां खुद के यॉट रखती हैं, तो सरकारों के पास भी औपचारिक यॉट होते हैं, जहां वीआईपी पार्टियां की जाती हैं. कम्युनिस्ट पूर्वी जर्मनी जीडीआर का ऐसा ही यॉट 'विनेटा' पिछले 25 साल से खरीदार का इंतजार कर रहा है. कीमत है दो लाख यूरो.

50 लोगों के साथ पार्टी

करीब 25 साल पहले यूरोप में कम्युनिस्टों का पतन शुरू हुआ. जीडीआर भी इसी का हिस्सा था. तब से अब तक उस दौर की कई चीजों को या तो खत्म कर दिया गया है या फिर संग्रहालयों में उनके लिए जगह बना दी गई है. सरकारी नेताओं के लिए इस्तेमाल होने वाले विमान तो जर्मन सरकार के इस्तेमाल में आ गए लेकिन इतने सालों में यह तय नहीं हो पाया कि विनेटा के साथ क्या करना है.

विनेटा में एक आलीशान केबिन है, जिसमें 50 लोग बैठ सकते हैं और कॉन्फ्रेंस कर सकते हैं. अच्छे मौसम में इसके डेक पर पार्टी की जा सकती है. लेकिन इसमें सोने की कोई जगह नहीं. यानि अगर नया मालिक कुछ दिनों के लिए कश्ती के साथ समुद्र या नदी में निकालना चाहे, तो वह मुमकिन नहीं.

जीडीआर के दौर में कई नेताओं को यहां आमंत्रित किया जाता था. 1985 में जीडीआर के राष्ट्रपति एरिष होनेकर के बुलावे पर निकारागुआ के राष्ट्रपति डानिएल ऑर्टेगा भी यहां पहुंचे थे.

Helmut Schmidt und Erich Honecker

एरिष होनेकर और हेल्मुट श्मिट

कश्ती या कबाड़

विनेटा का असली नाम 'ए कोएबीस' था. 1974 में जब इसे बनाया गया तो उसका नाम पहले विश्व युद्ध के हीरो ए कोएबीस के नाम पर रखा गया. यह कश्ती जब भी बर्लिन की झीलों और नदियों में घूमने निकली, साथ में सुरक्षा का एक बड़ा सा जत्था साथ होता. सोशलिस्ट यूनिटी पार्टी (एसईडी) के बड़े नेता इस पर सवार होते और राजनैतिक मुद्दों पर चर्चा करते.

लेकिन अब विनेटा बाल्टिक महासागर के एक डॉक में खड़ी है. न ही इसे इस्तेमाल किया जा रहा है और ना ही मरम्मत हो पा रही है. ऐसे में कुछ लोग इसे 'बदसूरत लोहे का डिब्बा' कहने लगे हैं. कुछ लोग इसे कबाड़ बता रहे हैं और कह रहे हैं कि इसे खरीदना पैसे की बर्बादी होगी क्योंकि कोई गारंटी नहीं कि कश्ती पहले की ही तरह चल पाएगी. वहीं इसे बेचने वाले इसके खूबसूरत अतीत का गुणगान कर रहे हैं और इस बात की पैरवी कर रहे हैं कि विनेटा को खरीदना गर्व की बात होगी.

उस जमाने की याद

जीडीआर के खात्मे के बाद इसे कई बार खरीदा गया और नाम भी बदले गए. पहले स्वीडन की एक कंपनी 'एमएएन' ने इसे खरीदा और जर्मनी के राष्ट्रपति निवास के नाम पर इसका नाम 'बेलेव्यू' रख दिया. बाद में इसका नाम 'प्रोएसेन' यानि प्रशिया पड़ा. फिलहाल जिस शिप कंपनी के पास यह कश्ती है, वह दिवालिया घोषित हो चुकी है और इसीलिए इसे बेच कर कुछ पैसे जुटाने की कोशिश कर रही है.

कुछ वक्त पहले कश्ती को बचाने के लिए बर्लिन की झीलों में इसके साथ 'पॉश चार्टर ट्रिप' की योजना बनी. पर यह सपना सपना ही रह गया. विनेटा में आज भी उस जमाने का इंटीरियर है. अब देखना है कि इस कश्ती का नया मालिक खुद को खुशनसीब समझेगा या बदनसीब.

आईबी/एमजे (डीपीए)