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दो दलितों में राष्ट्रपति चुनाव से दलितों को कितनी उम्मीद

भारत में पहली बार दो दलित उम्मीदवारों के बीच राष्ट्रपति चुनाव हो रहा है. दलित बनाम दलित की इस लड़ाई के बारे में दलित क्या सोचते हैं. क्या चुनाव के बाद बनने वाले दलित राष्ट्रपति से दलितों को कोई उम्मीद है?

देश भर के सांसद और विधायक वकील से राजनेता बने रामनाथ कोविंद तथा पूर्व राजनयिक और पांच बार की सांसद रहीं मीरा कुमार में से किसी एक को भारत का अगला राष्ट्रपति चुन रहे हैं. आंकड़े रामनाथ कोविंद के पक्ष में हैं. वे केआर नारायणन के बाद भारत के दूसरे दलित राष्ट्रपति हो सकते हैं. दोनों उम्मीदवार देश के दलित वर्ग से आते हैं और ऐसे में इसे दो दलितों की लड़ाई के रूप में पेश करने की कोशिश हो रही है. मीडिया का एक हिस्सा इसे समतावादी समाज की दिशा में भारत के एक बड़े कदम के रुप में दिखा रहा है लेकिन राजधानी दिल्ली से ज्यादा दूर गए बगैर भी हाल की कुछ घटनाओँ से ये समझा जा सकता है कि भारतीय समाज से ये समता अभी कितनी दूर है. 

नयी दिल्ली से महज 170 किलोमीटर की दूरी पर मौजूद उत्तर प्रदेश के शब्बीरपुर ने हाल ही में दो समुदायों के बीच हिंसा झेली है. जातीय समुदायों के बीच हुई झड़पों में दो लोगों की जान गई, दर्जनों लोग घायल हुए और करीब 50 घरों को जला दिया गया. इसी साल मई में दलित वर्ग के जाटव समुदाय के लोगों ने अगड़ी जाति के ठाकुरों की एक रैली पर आपत्ति की थी. ये रैली महाराणा प्रताप के सम्मान में निकाली गई थी. जाटव समाज इसलिए नाराज था कि अधिकारियों ने उन्हें उनके दलित नेताओं का सम्मान करने से रोक दिया था.

आधे जले घर, बिखरी छतें, टूटे टेलिविजन सेट और जली हुई मोटरसाइकिलें अब भी नजर आती हैं. 61 साल के शिवराज का घर भी इस हंगामे की भेंट चढ़ गया. वो कहते हैं, "देश को 70 साल पहले आजादी मिल गई लेकिन दलित आज भी आजाद नहीं हैं. भेदभाव, अलगाव, धमकी और हमले हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा हैं. हमें ना तो हिंदू माना जाता है, ना दूसरों के जैसा यहां तक कि इंसान भी नहीं." तो शिवराज दो दलितों के बीच सर्वोच्च पद के लिए होने जा रहे इस अप्रत्यक्ष चुनाव के बारे में क्या सोचते हैं? जवाब में उन्होंने कहा, "हमने सुना है दो दलितों के मुकाबले के बारे में लेकिन इससे हम पर कोई फर्क नहीं पड़ता. पार्टियां बस दलितों को उनके वोट के लिए लुभाने की कोशिश में हैं." शिवराज पूछते हैं, "क्या नये राष्ट्रपति के पास दलितों के खिलाफ अत्याचार रोकने का अधिकार भी होगा?"

भारत की वर्ण व्यवस्था ने पहले लोगों को उनके काम के आधार पर अलग कर दिया उसके बाद उनके वंश के आधार पर. सामाजिक वर्गीकरण का ये करीब दुनिया में सबसे पुराना तंत्र है जो करीब 3 हजार साल पहले शुरू हुआ. इस क्रम में ब्राह्मण शीर्ष पर और दलित सबसे नीचे हैं. भारत की 125 करोड़ की आबादी में करीब 20 करोड़ दलित हैं लेकिन इनमें बहुत कम ऐसे हैं जिनके पास पैसा, ताकत और रसूख है. कई दशकों से दलितों का जीवनस्तर सुधारने, उनके बचाव के लिए नीतियां और कानून होने के बावजूद आज भी ज्यादातर दलित भूमिहीन मजदूर, सफाईकर्मी और कूड़ा बीनने वालों के रूप में ही नजर आते हैं. वो जाति के कारण भेदभाव और हिंसा झेलते हैं खासतौर से ग्रामीण इलाकों में. मानवाधिकार संस्था ह्यूमन राइट्स वॉच के मुताबिक दलितों को अक्सर घरों, स्कूलों और सार्वजनिक सेवाओं में छूआछूत का भी सामना करना पड़ता है.

शब्बीरपुर में दलित, भारतीय जनता पार्टी पर ठाकुरों को समर्थन देने और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई में नाकाम रहने का आरोप लगाते हैं. अपने घर के मलबे के पास खड़े दल सिंह कहते हैं, "दिन के उजाले में हथियारबंद लोग हमारे घरों में घुस आये, हमें मारा और हमारे घरों को आग लगा दी." उनका कहना है "हमलावर खुले आम घूम रहे हैं."

स्थानीय विवाद के पीछे जटिल राजनीतिक समीकरण भी है. जाटव समाज दलितों के बीच एक प्रभावशाली तबका है और वो बीजेपी का विरोध करता है. पारंपरिक रूप से बीजेपी को हिंदू राष्ट्रवाद से शुरू हुई सवर्णों की पार्टी माना जाता है. बहुत से दलित और मुसलमान बीजेपी को अपने जीने के तौर तरीकों के लिए खतरा भी मानते हैं. लेकिन हाल के वर्षों में बीजेपी ने अपना सामाजिक दायरा बढ़ाया है. 2014 के राष्ट्रीय चुनाव में उसे दलितों का भारी समर्थन मिला. इसके अलावा हाल में हुए उत्तर प्रदेश के चुनाव में भी दलितों के एक बड़े वर्ग ने बीजेपी को वोट दिया.

2019 के आम चुनाव से पहले अपना आधार बढ़ाने में जुटी बीजेपी ने पूर्व गवर्नर रामनाथ कोविंद को राष्ट्रपति चुनाव में उम्मीदवार बनाया है. रामनाथ कोविंद उत्तर प्रदेश के दलित समुदाय से आते हैं. ये समुदाय पेशे से बुनकर है. विश्लेषकों का मानना है कि दलितों के बीच से कोरी समुदाय को अपनी ओर खींचने और जाटवों को कमजोर करने के लिए बीजेपी ने ये कदम उठाया है. आलोचक इसे बीजेपी की बांटों और राज करो की नीति बताते हैं. दलितों के लिए काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता चंद्रभान प्रसाद कहते हैं, "बीजेपी समझती है कि जाटवों से जीतने का यही एक तरीका है कि दलितों को बांट दिया जाए. रामनाथ कोविंद इतिहास में दलित समाज को बांटने वाले के रूप में याद किए जाएंगे." उधर राजनीतिक विश्लेषक सुधा पाई का कहना है कि बीजेपी 2019 से पहले हिंदुओँ को अल्पसंख्यकों के खिलाफ संगठित करने में जुटी है.

बीते दशक में बड़े शहरों में जाति की दीवार धूमिल हो गई है और दलितों को उच्च शिक्षा के साथ ही सरकारी और निजी नौकरियों में भी जगह मिलने लगी है. चुनाव से अलग हाल के महीनों में दलितों के दावों और संघर्ष के दूसरे संकेत भी दिखने लगे हैं. दलितों की पिटाई, यूनिवर्सिटी प्रशासन के कथित दुर्व्यवहार के बाद एक दलित रिसर्च स्कॉलर की आत्महत्या ने कुछ दलित युवा नेताओं को उभरने का मौका दे दिया है. पढ़े लिखे दलित युवाओं के समूह भीम आर्मी ने भेदभाव के खिलाफ कई बड़े विरोध प्रदर्शनों को आयोजन किया है. भीम आर्मी का नेतृत्व करने वाले चंद्रशेखर फिलहाल शब्बीरपुर की घटना के बाद जेल में बंद हैं. इसी दौर में कई दलित कारोबारियों का भी उभार हुआ है और उन्होंने अपने कारोबारी संगठन भी बनाए हैं. 

शब्बीरपुर में हालांकि दलितों ने आर्थिक रूप से काफी प्रगति की है लेकिन सामाजिक अत्याचारों से निबटने का संघर्ष अभी जारी है. लकड़ी के काम का कारोबार करने वाले एक दलित युवा कारोबारी ने कहा, "जैसे जैसे हम आगे बढ़ रहे हैं, अगड़ी जाति के लोगों से आंख मिला रहे हैं, ये ऐसी चीज है जिसे वो बर्दाश्त नहीं कर सकते, उनका वर्चस्व खत्म हो रहा है."

एनआर/एमजे (एएफपी)

 

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