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ब्लॉग

दो जगह से उम्मीदवारी पड़ सकती है महंगी

भारतीय राजनीतिक व्यवस्था में कई ऐसे प्रावधान हैं जिनका कारण या आधार कोई तर्क नहीं, बल्कि कुछ लोगों की सहूलियत है. इन्हीं में शामिल है दो जगह से चुनाव लड़ने का अधिकार. मोदी दो जगह से लड़ रहे हैं.

भारत में 16 वीं लोकसभा के लिए हो रहे चुनाव की सरगर्मियों के बीच दो जगह से उम्मीदवारी के अधिकार को तर्क की कसौटी पर कसने की कवायद शुरु हो गई है. देश की सर्वोच्च अदालत में जनहित याचिका के माध्यम से एक से अधिक सीट से चुनाव लड़ने के अधिकार को चुनौती दी गई है. अदालत ने याचिका को सुनवाई के लिए स्वीकार कर लिया है और सरकार और चुनाव आयोग से इस बावत जवाब तलब किया है.

डबल उम्मीदवारी

निर्वाचन नियमों से जुड़ा जनप्रतिनिधित्व कानून किसी भी नागरिक को एक से अधिक निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव लड़ने का अधिकार देता है, जबकि इसी अधिनियम की धारा 70 एक से अधिक क्षेत्र से चुने गए व्यक्ति को सिर्फ एक सीट रखने का दायित्व देती है. याचिका में अधिकार और दायित्व से जुड़े इन दोनों प्रावधानों को अनावश्यक और अतार्किक बताते हुए कानून से हटाने की मांग की गई है.

चुनाव आयोग में पंजीकृत वोटर्स पार्टी की याचिका पेश करते हुए वकील एचके नाइक ने दलील दी है कि यह प्रावधान सिर्फ कुछ खास नेताओं की सहूलियत के लिए कानून में शामिल किए गए हैं. सामान्य उम्मीदवारों ने कभी इस अधिकार का प्रयोग नहीं किया. नाइक ने कहा कि अगर इन प्रावधानों को हटा दिया जाए तो न तो नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन होगा और ना ही ऐसा होने से संवैधानिक संकट की स्थिति उत्पन्न होगी.

याचिकाकर्ता की दूसरी मजबूत दलील यह थी कि दो जगह से जीते उम्मीदवार द्वारा एक सीट खाली करने पर उस सीट पर तुरंत दोबारा चुनाव कराना पड़ता है और इससे न सिर्फ सरकारी खजाने पर बल्कि अन्य दलों और उम्मीदवारों पर अतिरिक्त खर्च का बोझ आ पड़ता है जो पूरी तरह से गैरजरुरी और नाजायज है.

मुख्य न्यायाधीश पी सदाशिवम और न्यायमूर्ति एनवी रमन्ना की खंडपीठ ने इन दलीलों को सारवान मानते हुए केन्द्र सरकार और चुनाव आयोग से पूछा है कि क्यों न इन दोनों प्रावधानों को कानून से हटा दिया जाए. साथ ही अदालत ने सरकार और आयोग को इनके अब तक के इस्तेमाल को देखते हुए इनकी उपयोगिता भी साबित करने को कहा है.

तात्कालिक असर

अगर सरकार और आयोग याचिकाकर्ता की दलीलों का ठोस जवाब नहीं दे पाए तो इसका तात्कालिक असर भाजपा के प्रधानमंत्री पद के दावेदार नरेन्द्र मोदी और तीसरे मोर्चे के सहारे प्रधानमंत्री बनने के सपने देख रहे मुलायम सिंह यादव पर पड़ सकता है. मोदी और मुलायम इस चुनाव में दो सीटों से किस्मत आजमा रहे हैं. मुलायम सिंह पिछले चार चुनाव में हर बार दो सीट से चुनाव लड़े हैं और हर बार उन्होंने अपनी दूसरी सीट खाली कर अपने बहू बेटों को संसद में दाखिल कराया है. सही मायने में इसे बैक डोर एंट्री ही कहा जाएगा. इसी तरह मोदी जैसे नेता हार के आसन्न खतरे को भांप कर इससे पार पाने के लिए इन प्रावधानों का इस्तेमाल करते हैं.

चुनाव सुधारों के लिए सक्रिय संगठन एडीआर के प्रोफेसर संजय कुमार का सुझाव है कि अगर सरकार इन प्रावधानों को हटाने की इच्छुक नहीं है तो उसे जनहित में इनमें संशोधन करना चाहिए. संशोधित प्रावधान में जोड़ना चाहिए कि दोबारा चुनाव का पूरा खर्च दूसरी सीट छोड़ने वाले उम्मीदवार से ही वसूला जाएगा. वह कहते हैं कि आखिर जनता इस गैरजरुरी खर्च का वहन क्यों करे.

हर कानून को व्यावहारिकता की कसौटी पर कसने का एकमात्र यंत्र संविधान होता है. चुनाव सुधार से लेकर अन्य व्यवस्थागत खामियों को दूर कर रहे सुप्रीम कोर्ट से इस मामले की भी संवैधानिकता को बरकरार रखते हुए यथाशीघ्र फैसला सुनाने की उम्मीद करना लाजिमी है. जिससे चुनाव प्रक्रिया कुछ खास लोगों की कठपुतली बनने के बजाय जनसामान्य से जुड़ सके.

ब्लॉग: निर्मल यादव

संपादन: महेश झा

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