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दुनिया

दो अरब अभी भी कुपोषित

पिछले 25 साल में जहां दुनिया में भुखमरी का आंकड़ा कम हुआ है वहीं ताजा रिपोर्ट के मुताबिक आज भी दो अरब लोग ऐसे हैं जो कुपोषण का शिकार हैं.

पहली नजर में ग्लोबल हंगर इंडेक्स रिपोर्ट में कुछ अच्छी खबर है. इसमें कहा गया है कि 1990 से अभी तक भुखमरी 39 फीसदी कम हो गई है. भारत, बांग्लादेश, कंबोडिया और इंडोनेशिया के साथ 26 देशों ने 1990 से अब तक स्थिति को बेहतर किया और "खतरनाक" श्रेणी से बाहर आकर "गंभीर" की कैटेगरी में पहुंच गए. वहीं चीन, थाईलैंड, मंगोलिया और वियतनाम जैसे देश कम होकर सामान्य की श्रेणी में आ गए हैं. यह रिपोर्ट ऐसे समय आई है जब संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि विभाग ने बताया कि दुनिया भर में मांस को छोड़कर खाद्यान्न की कीमतें चार साल में सबसे कम स्तर पर पहुंच गई है. दालों का उत्पादन 15 साल में सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गया है. लेकिन इससे पहले कि हम दुनिया की सरकारों और राहत संगठनों की तारीफ शुरू करें, रिपोर्ट के अन्य पहलुओं पर ध्यान देना जरूरी है.

पहली बात, रिपोर्ट में कुछ ऐसी बुरी खबरें है जो चौंकाती नहीं. भूख का धार्मिक, सांप्रदायिक संघर्षों और युद्ध के साथ निकट संबंध बना हुआ है. दक्षिणी सूडान, सीरिया और इराक में जारी संघर्ष के कारण शरणार्थियों की संख्या बढ़ रही है और इन देशों में पहले से स्थिति और बुरी हो रही है. इराक में कुपोषित लोगों की संख्या 1990 की तुलना में दुगनी हो गई है. विशेषज्ञों ने साफ चेतावनी दी है कि पश्चिम अफ्रीका में जारी इबोला के प्रकोप के कारण आने वाले दिनों में प्रभावित इलाकों में खाद्यान्न की कमी हो जाएगी. ये तो स्पष्ट है कि बीमारी का इन देशों पर दूरगामी असर हमारी कल्पना से कहीं ज्यादा होगा. पीड़ितों को आज और आने वाले महीनों में हमारी एकजुटता की जरूरत है.

संकटग्रस्त इलाकों में भूख की समस्या आसानी से हल नहीं की जा सकती. सहायता और राहत संगठन अक्सर गृहयुद्ध के पीड़ितों तक नहीं पहुंच पाते. संयुक्त राष्ट्र में काम कर रहे लोगों को भारी खतरा रहता है- सीरिया और इराक में इस्लामिक स्टेट के मामले में देखा गया, चरमपंथियों के हाथ आते ही उनकी हत्या कर दी गई. मीडिया में ये खबरें लगातार जारी हैं लेकिन फिर भी हम मासूम पीड़ितों की प्रताड़ना को पूरी तरह से नहीं देख पाते. रिपोर्ट एक साफ संकेत है कि उन्हें संघर्ष खत्म करने की कोशिशें दुगनी करनी होंगी और वह भी शांतिपूर्ण तरीके से. राष्ट्रीय हितों को लेकर सीमित सोच को परे हटाना होगा.

रिपोर्ट में एक और मुद्दा काफी व्यापक तौर पर रखा गया है. यह मुद्दा विकसित देशों के लोगों के लिए आश्चर्य हो सकता है, जिनके लिए कुपोषण कभी कोई मुद्दा नहीं था और शायद कभी होगा भी नहीं. रिपोर्ट में इसे हिडन हंगर यानि छिपी हुई भूख कहा गया है, जो अक्सर नजरों से ओझल हो जाती है. इसके कई कारण हैं, जो विकासशील और गरीब देशों में दो अरब लोगों का रोजमर्रा हैं: असंतुलित आहार, बीमारी या बचपन में गर्भावती होने की वजह से जरूरी पोषण की कमी. इसमें से 80,50,00,000 लोग ऐसे हैं जिनके पास रोज पर्याप्त खाना उपलब्ध नहीं है. इसलिए लाखों लोगों के लिए सिर्फ खाना होना ही अहम नहीं है, बल्कि सही तरह का खाना होना भी जरूरी है.

विशेषज्ञ इसके कारण कुपोषण, आहार में कमी और मोटापे जैसी परेशानियों की चेतावनी देते हैं. इनके कारण हर साल दुनिया भर में 31 लाख बच्चों में से 10 लाख बच्चों की मौत हो जाती है. इतना ही नहीं, हर साल करीब 1,80,00,000 बच्चे मस्तिष्क में क्षति के साथ पैदा होते हैं, जिसका अहम कारण आयोडीन की कमी है. रिपोर्ट दिखाती है कि कैसे ये समस्या अतिरिक्त आहार से हल की जा सकती है. हालांकि इसके लिए खाद्य निर्माताओं में साझेदारी की जरूरत होगी ताकि वह खाने में विटामिन, आयरन, जिंक और आयोडीन की मात्रा बढ़ाएं. ऐसा होने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सहयोग की जरूरत होगी.

ग्लोबल हंगर इंडेक्स को बनाने में मदद करने वाले सहायता संगठनों ने इन मुश्किलों को हल करने के लिए ज्यादा अंतरराष्ट्रीय साझेदारी और एकजुटता की मांग की है. तभी लाखों लोगों का जीवन बेहतर हो सकता है. वे सही भी हैं. विकसित देशों में रहने वाले लोगों के सहयोग की जरूरत है, ऐसे लोग जो संतुलित आहार के बारे में तभी सोचते हैं जब उन्हें वजन कम करना होता है.

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