1. Inhalt
  2. Navigation
  3. Weitere Inhalte
  4. Metanavigation
  5. Suche
  6. Choose from 30 Languages

दुनिया

दोस्ती में जान फूंकने भारत पहुंचे पुतिन

रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन आज से भारत यात्रा पर हैं. पुतिन की कोशिश भारत के साथ रिश्तों को फिर से चमकाने की होगी. वह कारोबार और हथियारों के सौदे पर बातचीत करेंगे लेकिन बातचीत तल्ख भी हो सकती है.

तीसरी बार रूस के राष्ट्रपति बने ब्लादिमीर पुतिन इस बार 7.5 अरब डॉलर के रक्षा सौदों के प्रस्ताव के साथ नई दिल्ली आए हैं. भारतीय रक्षा मंत्रालय के सूत्रों के मुताबिक रूस 42 सुखोई एसयू-30एमकेआई लड़ाकू विमान बेचना चाहता है. साथ ही लड़ाकू विमानों के 970 इंजनों की लंबे समय तक आपूर्ति की पेशकश भी रूसी राष्ट्रपति करेंगे.

रूस के डिफेंस थिंक टैंक सीएएसटी के रुसलान पुखोव कहते हैं, "उम्मीद है कि इन सौदों का एलान पुतिन के भारत दौर पर किया जाएगा. सब कुछ मिलाकर कीमत 7.5 से 8 अरब डॉलर के बीच होगी." रूसी रक्षा मंत्रालय ने पुखोव के अनुमान पर प्रतिक्रिया देने से इनकार किया है.

वैसे पुतिन की यात्रा से पहले ही भारत और रूस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल ब्रह्मोस को नया रूप देने पर सहमत हो गए हैं. दोनों देश 290 किलोमीटर तक मार करने वाली इस मिसाइल को एसयू-30एमकेआई में फिट करने की तकनीक विकसित करेंगे.

बैक फायर करते हथियार

बीते साल शुरू हुए अरब वसंत के बाद से हथियार बाजार में रूसी कंपनियों को मंदी का सामना करना पड़ रहा है. वैसे भी अब तक भारत ही रूसी हथियारों का सबसे बड़ा खरीदार रहा है. बीते कुछ सालों से अमेरिकी कंपनियां भी भारत को हथियार बेचने में दिलचस्पी ले रही हैं. नई दिल्ली के पास अब पहले से ज्यादा विकल्प हैं. भारतीय अधिकारियों का एक बड़ा वर्ग रूसी कंपनियों के व्यवहार से संतुष्ट नहीं है. बीते साल रूसी कंपनियों को नजरअंदाज कर भारत ने फ्रांस से 126 राफायल लड़ाकू विमान खरीदे. बीते महीने भारत ने अमेरिकी कंपनी बोईंग के साथ 1.4 अरब डॉलर का हैलीकॉप्टर सौदा किया.

विमानवाही युद्धपोत एडमिरल गोर्शकोव का सौदा भी दोनों देशों के बीच कड़वाहट घोल चुका है. भारत और रूस के बीच एडमिरल गोर्शकोव का सौदा 2004 में हुआ लेकिन अब तक यह जहाज भारत को नहीं मिल सका है. रूस की तरफ से हुई देरी ने युद्धपोत की कीमत बढ़ा दी. बढ़ी हुई कीमत भारत को चुकानी पड़ी. 1987 में सोवियत सेना में शामिल हुआ यह युद्धपोत नई दिल्ली ने 94.7 करोड़ डॉलर में खरीदा था, लेकिन अब तक भारत को इसके लिए 2.3 अरब डॉलर चुकाने पड़े हैं.

भारतीय नौसेना के मुताबिक समुद्र किए गए कुछ परीक्षणों में भी यह फेल हुआ है. कई खामियों को सुधारने का काम अब भी किया जा रहा है. भारत को अक्टूबर 2013 के आस पास यह विमानवाही पोत मिलेगा. उधर भारत का पड़ोसी चीन खुद अपना विमानवाही पोत बना चुका है.

भारतीय नौसेना की यह भी शिकायत है कि रूस से खरीदी गई एकमात्र परमाणु पनडुब्बी चक्र में भी खराबी आ रही है. नौसेना के मुताबिक पनडुब्बी के कुछ पुर्जे काम नहीं कर रहे हैं.

भारत की उम्मीदें

रूस और भारत के बीच शीत युद्ध के जमाने से बढ़िया दोस्ती रही हैं, लेकिन बीते एक दशक में यह दोस्ती ढलान की तरफ जाती दिख रही है. दोनों देशों के बीच समय समय पर मतभेद उभर रहे हैं.

रविवार को पुतिन की यात्रा से ठीक पहले दोनों देशों के संबंधों में एक कांटा और चुभा. रूस ने भारत की सरकारी तेलर और गैस कंपनी ओएनजीसी की ईकाई को टैक्स में रियायत देने से इनकार कर दिया है. साइबेरिया में ओएनजीसी की फर्म इंपीरियल एनर्जी काम कर रही है. बर्फीली दुश्वारियों के बीच कंपनी को तेल निकालने में बहुत ज्यादा मुश्किलें हो रही हैं. उस पर टैक्स भी बहुत ज्यादा है. भारत सरकार रूस पर दबाव बना रही थी कि वह टैक्स में छूट दे.

उम्मीद है कि भारत और रूस के 13वें द्विपक्षीय सम्मेलन के दौरान यह विवाद सुलझाया जाएगा. ओएनजीसी विदेश लिमिटेड ने 2009 में 2.1 अरब डॉलर में इंपीरियल एनर्जी को खरीदा. अब भारतीय कंपनी कह रही है कि तेल की कीमत 90-100 डॉलर प्रति बैरल होने के बावजूद उसे हर बैरल में 19-20 डॉलर ही मिल रहे हैं. ओएनजीसी साइबेरिया की दुश्वारियों के झेलते हुए हर दिन 13,803 बैरल तेल निकाल रही है. इसे 5,000 किलोमीटर की पाइप लाइन से दूसरी जगह भेजा जा रहा है. भारतीय कंपनी के मुताबिक इतना ही करने में उसका दम फूल रहा है, जबकि बीते तीन साल में रूस सरकार को ओएनजीसी से करीब आधे अरब डॉलर की कमाई हो चुकी है.

पुतिन भारत के साथ कारोबार भी बढ़ाना चाहते हैं. उनकी कोशिश होंगी की दोनों देशों के द्विपक्षीय कारोबार को बढ़ाया जाए. विज्ञान, शिक्षा और दूसरे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाया जाए. भारतीय अर्थव्यवस्था के पास बेहताशा खर्च करने की क्षमता है, अन्य देशों की तरह रूस भी इसका फायदा उठाना चाहता है. पुरानी दोस्ती की वजह से मॉस्को का दावा ज्यादा मजबूत भी है लेकिन अब भारत भी 'एक हाथ दे, एक हाथ ले' की स्थिति में है. ऐसे में रूसी राष्ट्रपति को नई दिल्ली की बातें पहले की तुलना में ज्यादा संजीदगी से सुननी पड़ेंगी.

ओएसजे/एनआर (रॉयटर्स, एएफपी)

DW.COM

WWW-Links

संबंधित सामग्री