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ब्लॉग

दूरगामी संकेत देगा बिहार चुनाव

बिहार विधानसभा के लिए आखिरी दौर का मतदान समाप्त हो गया है. इस चुनाव के दौरान प्रमुख नेताओं के विवादित बयानों ने सुर्खियां बटोरीं. चुनावों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की साख की परीक्षा होगी.

बिहार के इस चुनाव को कई मायनों में ऐतिहासिक कहा जा सकता है. यह पहला मौका है जब किसी प्रधानमंत्री ने किसी राज्य के विधानसभा चुनावों के दौरान 40 से ज्यादा रैलियों को संबोधित की हो. इससे साफ है कि बीजेपी की अगुवाई वाले एनडीए गठबंधन के लिए यह चुनाव कितना अहम है. बीते साल मई में केंद्र की सत्ता में आने के बाद मोदी सरकार अब तक कई तरह के आरोपों से जूझती रही है. उस पर विकास के एजेंडे पर कोई काम नहीं करने और प्रधानमंत्री के विदेश यात्राओं में मशगूल रहने समेत तमाम आरोप लग चुके हैं.

बिहार की चुनावी जीत इन तमाम आरोपों को हाशिए पर धकेल सकती है. कम से कम बीजेपी का तो यही मानना है. इसके अलावा अगले साल ही पड़ोसी पश्चिम बंगाल में भी विधानसभा चुनाव होने हैं. बिहार की चुनावी जीत का बंगाल पर असर पड़ना लाजिमी है. बिहार में जीत का संदेश पूर्वोत्तर का प्रवेशद्वार कहे जाने वाले असम और सुदूर दक्षिण स्थित केरल तक पहुंच सकता है. बंगाल के साथ इन दोनों राज्यों में भी अगले साल ही चुनाव होने हैं. बिहार की चुनावी जीत से बीजेपी उस धब्बे को भी धोना चाहती है जो सत्ता में आने के तुरंत बाद दिल्ली के चुनावों में आम आदमी पार्टी के हाथों हुई करारी हार से लगा था.

बिहार चुनावों को कई मायनों में यादगार कहा जा सकता है. वैसे, तो राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों पर निजी हमले अब किसी भी चुनाव का ट्रेडमार्क बन चुके हैं, लेकिन इस बार बिहार में तो तमाम हदें पार हो गईं. चुनाव प्रचार से पहले ही प्रधानमंत्री ने जो चार रैलियां की थी उसमें जंगल राज और डीएनए का मुद्दा उठाकर लालू-नीतीश को घेरा था. डीएनए वाला प्रधानमंत्री का बयान पूरे चुनाव में छाया रहा. लालू-नीतीश ने इसे बिहार के सम्मान से जोड़कर हमला किया. अपने बड़बोलेपन के लिए मशहूर लालू प्रसाद यादव ने तो इसे पिछड़े और अगड़े तबके के बीच का चुनाव करार दिया. बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने पार्टी कार्यकर्ताओं की एक बैठक में लालू यादव को ‘चारा चोर' करार दिया तो लालू ने जवाबी हमला करते हुए उनको ‘नरभक्षी' करार दिया. राबड़ी देवी ने तो शाह को ‘जल्लाद' कह दिया.

अपने चुनाव अभियान के दौरान अल्पसंख्यक आरक्षण के मुद्दे को उठाकर प्रधानमंत्री ने लालू व नीतीश को घेरने की कोशिश की थी. लेकिन अमित शाह इससे कहीं आगे पहुंच गए. उन्होंने कह दिया कि बिहार में बीजेपी हारी तो पटाखे पाकिस्तान में फूटेंगे. इसके जवाब में लालू ने कहा कि शाह ने बिहारियों को पाकिस्तानी कहा है. प्रचार के आखिरी दिन लालू ने तमाम हदें तोड़ते हुए कहा कि पीएम को छठी का दूध याद दिला देंगे. लालू के गोमांस वाले बयान ने भी काफी सुर्खियां बटोरीं. इस दौरान विभिन्न राजनीतिक दलों की ओर से चुनाव आयोग को शिकायतों का पुलिंदा भेजा गया. उस आधार पर आयोग ने कई नेताओं को कारण बताओ नोटिस भी जारी की.

चुनावों के आखिरी दौर के बाद अब तमाम निगाहें आठ नवंबर को होने वाली वोटों की गिनती पर टिकी हैं. इतनी बेसब्री से किसी विधानसभा चुनाव के नतीजों का इंतजार अब तक तो नहीं ही देखा गया है. लेकिन एक के बाद एक मिसालें कायम करने वाले इस चुनाव का क्लाईमेक्स तो अभी बाकी है. उन नतीजों से ही पता चलेगा कि मोदी और नीतीश में लोग किसे चुनते हैं और किसे खारिज करते हैं. इसी से तय होगा कि बिहार की जनता पर किसका जादू चला है और लोगों ने तमाम नेताओं के विवादस्पद बयानों पर कैसा रुख अपनाया है. वैसे, ज्यादातर राजनीतिक पंडित अबकी एनडीए गठबंधन की जीत की भविष्यवाणी करने में जुटे हैं. लेकिन वोटरों के मन को बूझना बेहद मुश्किल है. अब सबको आठ नवंबर की सुबह का इंतजार है. वह सुबह किसके लिए खुशियों का संदेश लेकर आएगी और किसे झटका देगी, यह तो ईवीएम से निकलने वाले नतीजे ही बताएंगे. फिलहाल तो तमाम दल भारी आशंकाओं के बीच अपनी-अपनी जीत के दावे करने में जुटे हैं.

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