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विज्ञान

दुर्लभ राइनो को बचाने की मुहिम

वैज्ञानिक और संरक्षणकर्मी मिलकर उत्तरी केन्या में पाए जाने वाले गैंडों की एक दुर्लभ किस्म को विलुप्त होने से बचाने की कोशिश कर रहे हैं. पूरी पृथ्वी पर केवल पांच 'नॉर्दर्न व्हाइट' गैंडे बचे हैं.

इन पांच दुर्लभ गैंडों में से तीन सेंट्रल केन्या की ओल पेजेटा कंजर्वेंसी में रहते हैं, जबकि बाकी दो चेक रिपब्लिक और अमेरिका के चिड़ियाघर में. ओल पेजेटा के प्रमुख रिचर्ड विग्ने बताते हैं, "अब चुनौती ये है कि हमारे पास बचे इतने कम वक्त में ही हम इन्हें बचाने का सबसे कारगर वैज्ञानिक तरीका निकालें."

नॉर्दर्न व्हाइट राइनो पारंपरिक रूप से सेंट्रल अफ्रीकी देशों जैसे केन्या, चाड, दक्षिण सूडान और डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कॉन्गो के कुछ हिस्सों में रहा करते थे. बीते कई दशकों से ये इलाके विवादों, अव्यवस्था और संघर्षों का अड्डा बने हुए हैं. फॉना एंड फ्लोरा इंटरनेशनल नामके एक संरक्षण समूह के निदेशक रॉब ब्रेट बताते हैं, "ये क्षेत्र किसी भी तरह के वास्तविक नियंत्रण से बाहर हैं. कई बार किसी भी तरह का संरक्षण कर पाना संभव नहीं होता."

शिकारी इतने सालों से गैंडों को उनके सींगों के लिए मारते रहे. सींग का इस्तेमाल काफी पुराने जमाने से ही यमन जैसे देशों में खंजर के हत्था बनाने में होता आया है. इसके अलावा बीते कुछ सालों में कई एशियाई देशों में भी सींग का चूरा बनाकर उसके पाउडर का इस्तेमाल खास तरह की दवाओं में हो रहा है. कालाबाजारी होने के कारण गैंडों के सींग की कीमत धातु सोना या फिर कोकेन से भी ज्यादा होती है. सींग 65,000 डॉलर प्रति किलो के भाव पर बेचे जाते हैं.

जो गिने चुने नॉर्दर्न व्हाइट राइनो बचे गए हैं वे काफी बूढ़े हो चुके हैं. उनकी प्राकृतिक रूप से प्रजनन की क्षमता जा चुकी है. अंतिम नॉर्दर्न व्हाइट राइनो 15 साल पैदा हुआ था. यही कारण है कि अब कृत्रिम तरीकों से उनकी संख्या बढ़ाने की कोशिश करना ही एकमात्र उपाय है. वैज्ञानिक इन-विट्रो निषेचन करा के "टेस्ट ट्यूब राइनो" बनान चाहते हैं. ऐसा भ्रूण फिर किसी सरोगेट मां के गर्भ में प्रत्यारोपित किया जाएगा. यह सरोगेट मां दक्षिणी व्हाइट राइनो हो सकती है जो कि नॉर्दर्न व्हाइट राइनो से काफी मिलती जुलती किस्म है.

नॉर्दर्न व्हाइट राइनो में कृत्रिम वीर्यारोपण के कई प्रयास असफल हो चुके हैं और सरोगेसी के सफल होने के भी कोई प्रमाण नहीं हैं. शुक्राणुओं या अंडों को जमा कर रखा जाए तो कृत्रिम तरीके से शायद इन्हें पुनर्जीवित किया जा सके. अब हम ऐसी स्थिति में आ चुके हैं जब इन्हें बचा पाना शायद संभव ही नहीं. विग्ने कहते हैं, "विज्ञान अभी इससे आगे नहीं पहुंचा है."

आरआर/ओएसजे (एएफपी)

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