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मनोरंजन

दुर्गापूजा या कॉरपोरेट पूजा

राज्य में गरीबी है, आस पास महंगाई है, लोग भले ही इनसे परेशान हों, लेकिन पश्चिम बंगाल के सबसे बड़े त्योहार दुर्गापूजा पर इनका कोई असर नहीं नजर आ रहा है. बेहताशा खर्च कर ये उत्सव भक्ति के बजाए भव्यता की राह पर जा रहा है.

इस साल इस आयोजन का कुल खर्च पिछले साल के मुकाबले 35 फीसदी तक बढ़ गया है. एसोसिएटेड चैंबर आफ कामर्स (एसोचैम) की ओर से किए गए एक सर्वेक्षण के मुताबिक, बंगाल में दुर्गापूजा के आयोजन पर पिछले साल 25,000 करोड़ रुपये खर्च हुए थे, जो कई राज्यों के सालाना बजट से भी ज्यादा है. अगले साल तक इस उद्योग के बढ़ कर 40,000 करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान है. इस सर्वेक्षण में कहा गया है कि पूजा के लिए बनने वाले पंडालों पर वर्ष 2012 में 350 करोड़ खर्च हुए थे. लेकिन कच्चे माल की कीमतों में वृद्धि और भव्य डिजाइनों की वजह से इस साल इसके पांच सौ करोड़ का आंकड़ा पार करने का अनुमान है. लेकिन तेजी से बढ़ते बजट के बावजूद आयोजकों के चेहरों पर कहीं कोई शिकन नहीं है.

हजारों पंडाल

राज्य में हर साल 10 हजार से ज्यादा पूजा समितियां दुर्गापूजा आयोजित करती हैं. अकेले राजधानी कोलकाता में ही साढ़े तीन हजार पंडाल बनाए जाते हैं. इनमें से सौ से ज्यादा पंडाल तो ऐसे हैं जिनका बजट करोड़ों में होता है. हर साल नई थीम पर होने वाली इस पूजा के दौरान मूर्तियों, पंडालों की साज-सज्जा और बिजली की सजावट पर भारी रकम खर्च की जाती है.

लेकिन आखिर इतनी भारी भरकम रकम आती कहां से है. इस सवाल का जवाब देते हैं कालीतला की एक आयोजन समिति के सदस्य वीरेन घोष. घोष कहते हैं, "एक सप्ताह तक चलने वाला यह त्योहार विभिन्न कंपनियों के लिए अपने ब्रांडों को चमकाने का सुनहरा मौका होता है. इसलिए उन कंपनियों ने बढ़ती महंगाई को ध्यान में रखते हुए इस साल स्पॉन्सरशिप की रकम 30 फीसदी बढ़ा दी है." संतोष मित्रा स्क्वायर पूजा समिति के अध्यक्ष प्रदीप घोष कहते हैं, "हमारे बजट का 80 फीसदी हिस्सा कॉरपोरेट घरानों से आता है."

साज-सज्जा पर खर्च बढ़ा

कच्चे माल की कीमतों और मजदूरी में वृद्धि की वजह से इस बार पंडालों के निर्माण और उनकी साज-सज्जा का खर्च पिछले साल के मुकाबले 30 फीसदी बढ़ गया है. आयोजन समितियां जनवरी से ही थीम की तलाश में जुट जाती हैं. हर साल देश-विदेश में घटी महत्वपूर्ण घटनाओं का पंडालों में चित्रण किया जाता है. पूजा समितियों में बेहतर साज-सज्जा, पंडालों, बिजली की सजावट और प्रतिमा के लिए विभिन्न संगठनों की ओर से दिए जाने वाले पुरस्कारों के लिए भी होड़ लगी रहती है.

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जिस समिति को जितने पुरस्कार मिलेंगे, उसकी पूजा में उतनी ज्यादा भीड़ जुटेगी. यह भीड़ ही अगले साल उनको प्रायोजकों से मोटी रकम दिलाती है. दक्षिण कोलकाता स्थित नाकतला उदयन संघ ने पत्थर की एक शिला पर ही दुर्गा की प्रतिमा गढ़वाई है. इस पर 10 लाख रुपये खर्च हुए हैं.

बजट बढ़ा

सिघी पार्क पूजा समिति ने इस साल अपना बजट 20 फीसदी बढ़ा दिया है. समिति के सचिव भास्कर नंदी कहते हैं, "प्रायोजकों ने बजट बढ़ा दिया है, इसलिए पैसों की कोई परेशानी नहीं है." इस पूजा को सौ से ज्यादा प्रायोजक मिले हैं. एक और पूजा समिति के कोषाध्याक्ष पीके दे कहते हैं, "अगर आप अपने आयोजन को एक ब्रांड बना कर भीड़ जुटा सकें तो प्रायोजकों की कोई कमी नहीं होगी. तमाम कंपनियां अपनी ब्रांडिंग पर काफी जोर दे रही हैं."

कोलकाता स्थित सौंदर्य प्रसाधन व खाद्य सामग्री बनाने वाली कंपनी इमामी ने सौ से ज्यादा पूजा समितियों के साथ करार किया है. वहां भोग (खिचड़ी) कंपनी में बने तेल में पकेगा और पैकेट पर उसका ब्रांड नाम भी नजर आएगा. निदेशक आदित्य अग्रवाल कहते हैं, "इससे कंपनी एक लाख से ज्यादा घरों तक पहुंच सकेगी और ब्रांड को लोकप्रिय बनाने में सहायता मिलेगी." कंपनी ने अपने प्रचार का बजट 30 फीसदी बढ़ा दिया है. इसी तरह एक अन्य कंपनी डाबर भी पूजा पंडालों में अपने जूस के छोटे पैकेट वितरित करेगी. टाइटन की तनिष्क भी पूजा में ब्रांडिग के लिए मैदान में है. यहां श्रीभूमि स्पोर्टिंग क्लब में मूर्तियां लगभग पांच करोड़ रुपये के तनिष्क के गहनों से सजाई जाएंगी.

पूजा समितियों और बड़े व्यावसिक घरानों से जुड़े लोगों का कहना है कि पूजा अपने ब्रांड के प्रचार का सबसे बड़ा मौका है. इसलिए इसमें धन की कभी कोई कमी नहीं होगी.

रिपोर्ट: प्रभाकर, कोलकाता

संपादन: ओंकार सिंह जनौटी

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